दिनदहाड़े गोलियां, बेखौफ शूटर और बेअसर रणनीति: यूपी में कानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
रामपुर और बाराबंकी में हाल ही में दिनदहाड़े हुई हत्याओं और अतीत में हुई हाई-प्रोफाइल हत्याओं ने उत्तर प्रदेश में अपराध नियंत्रण और पुलिस की प्रभावशीलता पर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
उत्तर प्रदेश में लगातार हो रही गोलीबारी और दिनदहाड़े हत्याओं की घटनाओं ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस अधिकारियों द्वारा अपराध नियंत्रण के लिए नियमित समीक्षा बैठकों के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हालात अलग दिखाई दे रहे हैं। हाल के दिनों में रामपुर और बाराबंकी में हुई हत्याओं ने पुराने मामलों की याद ताजा कर दी है। सड़क पर खुलेआम गोलियां चलाने वाले शूटर पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
हाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
11 फरवरी 2026 को रामपुर जिले के जिला पंचायत कार्यालय में अधिवक्ता फारूक अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि 13 फरवरी 2026 को बाराबंकी जिले के सफेदाबाद क्षेत्र के असेनी मोड़ पर हिस्ट्रीशीटर शोएब किदवई उर्फ बॉबी को बाइक सवार बदमाशों ने गोलियों से छलनी कर दिया। वह मुख्तार अंसारी का करीबी और आरके तिवारी हत्याकांड का मुख्य आरोपी बताया जाता था। इन दोनों घटनाओं ने प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
पुराने हाई-प्रोफाइल हत्याकांड भी बने सवाल
इससे पहले 27 अक्टूबर 2010 को लखनऊ के विकासनगर क्षेत्र में सीएमओ परिवार कल्याण डॉ. विनोद कुमार आर्या की सुबह की सैर के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसके करीब पांच महीने बाद 2 अप्रैल 2011 को सीएमओ डॉ. बीपी सिंह को विभूतिखंड क्षेत्र में निशाना बनाया गया। वहीं 2 मार्च 2011 को शिक्षा भवन के सामने सरकारी कर्मचारी सैफ हैदर उर्फ सैफी की भी ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर हत्या कर दी गई थी।
रणनीतियां बनीं, लेकिन अपराध जारी
इन बड़ी घटनाओं के बाद पुलिस अधिकारियों ने अपराधियों पर नकेल कसने के लिए कई रणनीतियां बनाई थीं। गश्त बढ़ाने और सख्ती के दावे भी किए गए, लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं दिखे। बेखौफ बदमाश वारदात को अंजाम देकर फरार हो जा रहे हैं। सवाल यही है कि आखिर अपराध पर पूरी तरह अंकुश कब लगेगा और आम जनता खुद को सुरक्षित कब महसूस करेगी।
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