शादी का झांसा देकर रेप के मामलों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी, जानिए कानून क्या कहता है
अदालतों ने स्पष्ट किया है कि हर असफल रिश्ता या टूटा हुआ वैवाहिक वादा बलात्कार नहीं होता। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम मत जानिए।
शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाने और बाद में रेप का मामला दर्ज कराने से जुड़े केस देश की अदालतों में लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में नोएडा से जुड़ा एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने रेप के आरोप को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि हर टूटे रिश्ते को रेप की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस तरह के मामलों में साफ कहा गया है कि आरोप भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर आधारित होने चाहिए।
नोएडा केस में कोर्ट ने क्या कहा
नोएडा की एक युवती ने जोधपुर में LLM की पढ़ाई के दौरान बने रिश्ते को लेकर फरवरी 2024 में रेप की एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए। आरोपी युवक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की और बताया कि दोनों की सगाई हो चुकी थी, शादी की तारीख तय थी, होटल और कार्ड तक बुक हो चुके थे। लेकिन आपसी विवाद के कारण रिश्ता टूट गया। कोर्ट ने कहा कि अगर शुरू से ही शादी की मंशा थी, तो इसे शादी का झांसा नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर धारा 69 के तहत दर्ज एफआईआर रद्द कर दी गई, जबकि धमकी और मारपीट के आरोपों की जांच जारी रखने को कहा गया।
आपसी सहमति और रेप का फर्क
कोर्ट ने साफ किया कि रेप का अपराध तभी बनता है, जब पुरुष ने शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न रखा हो और झूठे वादे के आधार पर संबंध बनाए हों। अगर दोनों बालिग हैं और सहमति से रिश्ता बना है, तो बाद में रिश्ता टूटने को रेप नहीं कहा जा सकता। नोएडा के एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि पढ़ी-लिखी और बालिग लड़की नैतिकता समझने में सक्षम होती है और हर स्थिति में पुरुष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का रुख भी साफ
सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों में स्पष्ट कहा है कि लंबे समय तक चले आपसी रिश्ते को फुसलाकर बनाया गया संबंध नहीं माना जा सकता। हाल ही में एक वकील के खिलाफ दर्ज रेप केस को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि तीन साल तक चले रिश्ते को केवल झांसे का नतीजा नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि कुछ मामलों में महिलाओं के साथ धोखा होता है, लेकिन हर आरोप को सबूतों के आधार पर परखना जरूरी है।
कानून विशेषज्ञों की राय
कानून के जानकारों का कहना है कि कई मामलों में रेप की धाराओं का दुरुपयोग भी होता है। अगर महिला बालिग है और समझदारी से फैसला ले सकती है, तो हर टूटे रिश्ते को अपराध नहीं कहा जा सकता। कोर्ट के फैसले इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश करते हैं, ताकि असली पीड़ितों को न्याय मिले और कानून का गलत इस्तेमाल न हो।
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