काश बनारस में ही बस जाता… दालमंडी की गलियों ने ऐसा किया दीवाना कि ग़ालिब ने धर्म छोड़ने तक की कह दी बात
वाराणसी की 300 साल पुरानी दलमंडी और मिर्जा ग़ालिब के बीच के ऐतिहासिक संबंध के बारे में जानिए। जानिए ग़ालिब बनारस में कैसे रहे और उन्होंने अपनी रचनाओं में इस शहर की प्रशंसा कैसे की।
Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के वाराणसी की करीब तीन सौ साल पुरानी दालमंडी अब इतिहास का हिस्सा बनने की ओर बढ़ रही है। अदब, संगीत और तहजीब की विरासत को संजोए इस इलाके को आधुनिक बनाने की योजना ने इसके कई पुराने पहलुओं को पीछे छोड़ दिया है। दालमंडी सिर्फ एक बाजार या गली नहीं रही, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक मानी जाती रही है। इसी जगह से जुड़ी एक बड़ी ऐतिहासिक स्मृति महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की भी है, जिनका बनारस प्रवास आज भी चर्चा में रहता है। ग़ालिब का नाम आते ही उनकी मशहूर पंक्ति याद आती है, “हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयां और।”
बनारस में तीन महीने से ज्यादा रहे ग़ालिब
जानकारी के अनुसार ग़ालिब नवंबर 1827 के अंत में बनारस पहुंचे थे और फरवरी 1828 तक यहां रहे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रोफेसर अब्दुस समी बताते हैं कि माना जाता है ग़ालिब दालमंडी की घुघरानी गली के पास कहीं ठहरे थे। वर्ष 1969 में ग़ालिब शताब्दी समारोह के दौरान नज़ीर बनारसी के नेतृत्व में बनी एक समिति ने उस जगह को ‘कूचा-ए-ग़ालिब’ नाम भी दिया था, हालांकि इसके लिखित प्रमाण नहीं मिलते।
इलाहाबाद से बनारस आने की कहानी
प्रोफेसर क़ासिम के अनुसार ग़ालिब अपनी पेंशन के सिलसिले में दिल्ली से कलकत्ता जा रहे थे। इस दौरान वह पहले इलाहाबाद पहुंचे, लेकिन वहां की जलवायु उन्हें पसंद नहीं आई और वह बीमार हो गए। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाता है, तो उन्हें जन्नत भी मंजूर नहीं। इसके बाद वह बनारस आए और शहर से बेहद प्रभावित हुए।
बनारस से गहरा लगाव और पत्रों में वर्णन
ग़ालिब ने अपने एक मित्र को लिखे पत्र में बनारस की इतनी प्रशंसा की कि कहा, अगर दुश्मनों का डर न होता तो वह अपना धर्म छोड़कर तिलक लगाकर गंगा किनारे बैठ जाते। उन्होंने बनारस को दुनिया के दिल का केंद्र और जमीन पर जन्नत जैसा बताया। उन्होंने अपने अनुभवों को फारसी मसनवी “चिराग-ए-दैर” में भी लिखा, जिसका अर्थ “मंदिर का दीपक” है। इसमें 108 छंदों के माध्यम से उन्होंने बनारस को गंगा-जमुनी तहजीब का हृदय बताया और “हिंदुस्तान का काबा” तक कहा।
कहां ठहरे थे ग़ालिब, इस पर मतभेद
ग़ालिब के ठहरने की जगह को लेकर दो मत हैं। एक मत के अनुसार वह दालमंडी की घुघरानी गली में रिश्तेदार के घर रुके थे, जबकि दूसरा मत कहता है कि वह औरंगाबाद की एक सराय में ठहरे थे। हालांकि जानकारों का कहना है कि उनके रिश्तेदार मिर्ज़ा बिस्मिल्लाह दालमंडी में रहते थे, जहां ग़ालिब ने काफी समय बिताया।
लो प्रोफाइल में बिताया बनारस प्रवास
बताया जाता है कि ग़ालिब उस समय काफी लोकप्रिय हो चुके थे, लेकिन उन्होंने अपने बनारस आने की जानकारी काशी नरेश तक को नहीं दी। वह बेहद सादगी और लो प्रोफाइल में रहे और शहर को करीब से महसूस किया। बनारस छोड़ने के करीब 35 साल बाद भी उन्होंने एक मित्र को लिखा कि अगर वह जवानी में काशी आते तो शायद कभी यहां से नहीं जाते, क्योंकि इस शहर का जादू वह कभी भूल नहीं सके।
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