यूपी में गुमशुदा लोगों पर हाईकोर्ट सख्त: दो साल में 1.08 लाख लापता, सिर्फ 9,700 का ही चला पता
उत्तर प्रदेश में दो साल में 1.08 लाख से अधिक लोग लापता हो गए, जिनमें से अब तक केवल 9,700 लोगों का ही पता लगाया जा सका है। इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया है।
उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रही गुमशुदा लोगों की संख्या को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गंभीर रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस पूरे मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया है। कोर्ट के सामने आए आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया है। बीते लगभग दो वर्षों में प्रदेश से 1,08,300 लोग लापता हुए, लेकिन पुलिस अब तक केवल 9,700 लोगों का ही पता लगा सकी है। अदालत ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक और गंभीर बताया है। मामले की अगली सुनवाई 5 फरवरी को हुई।
जनहित याचिका के रूप में दर्ज हुआ मामला
यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने दिया। न्यायालय ने इस प्रकरण को “प्रदेश में गुमशुदा व्यक्तियों के संबंध में” शीर्षक से जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया है। कोर्ट का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों का लापता होना कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
एक पिता की याचिका से हुआ खुलासा
यह पूरा मामला लखनऊ के चिनहट क्षेत्र निवासी विक्रमा प्रसाद की याचिका से सामने आया। याची ने कोर्ट को बताया कि उसका बेटा जुलाई 2024 में अचानक लापता हो गया था। इस संबंध में उसने चिनहट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसी लापरवाही को देखते हुए न्यायालय ने इस व्यक्तिगत मामले को पूरे प्रदेश के मुद्दे से जोड़कर देखा।
मुख्य सचिव के शपथपत्र में सामने आए आंकड़े
न्यायालय के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव (गृह) की ओर से शपथपत्र दाखिल किया गया। शपथपत्र में बताया गया कि 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच उत्तर प्रदेश में कुल 1,08,300 लोगों की गुमशुदगी दर्ज हुई है। इनमें से केवल 9,700 लोगों को ही खोजा जा सका है, जबकि शेष का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
अधिकारियों के काम पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इन आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा कि यह स्थिति दर्शाती है कि गुमशुदा व्यक्तियों के मामलों में संबंधित अधिकारियों का कार्य संतोषजनक नहीं है। अदालत ने माना कि इस तरह की लापरवाही आम जनता की सुरक्षा और भरोसे को कमजोर करती है। कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि आगे इस मामले में और सख्त निर्देश दिए जा सकते हैं।
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