रमजान में मुसलमान क्यों रखते हैं रोजा… सहरी, इफ्तार और तरावीह तक, जानें हर जरूरी बात
रमजान महीने की शुरुआत के साथ मुस्लिम समुदाय ने पहला रोजा रखा है। यह इस्लाम का सबसे पवित्र महीना माना जाता है, जिसमें रोजा, नमाज, कुरान की तिलावत और दान का विशेष महत्व होता है। रोजा सहरी से शुरू होकर सूर्यास्त पर इफ्तार से खोला जाता है, जबकि रात में तरावीह की नमाज पढ़ी जाती है। रमजान का संदेश सब्र, आत्म अनुशासन और अच्छे कर्म करना है, इसलिए इसे रहमत और बरकत का महीना कहा जाता है।
रमजान महीने की आज से शुरुआत हो गई है और मुस्लिम समुदाय ने पहला रोजा रखा है। इस्लामिक कैलेंडर का यह नौवां महीना सबसे खास और पवित्र माना जाता है। इस दौरान रोजा रखना, पांच वक्त की नमाज पढ़ना, कुरान शरीफ की तिलावत करना और जरूरतमंदों की मदद करना बेहद पुण्य का काम माना जाता है। मस्जिदों में नमाजियों की संख्या बढ़ गई है और घरों में भी इबादत का माहौल दिखाई दे रहा है। रमजान को सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्म अनुशासन और इंसानियत को मजबूत करने वाला महीना माना जाता है।
रमजान क्यों माना जाता है सबसे पवित्र महीना
इस्लामिक मान्यता के अनुसार इसी महीने में अल्लाह ने हजरत मुहम्मद पर कुरान शरीफ का अवतरण किया था। इसलिए रमजान का महत्व और बढ़ जाता है। रोजा रखने का मकसद सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार को भी बेहतर बनाना होता है। माना जाता है कि इस महीने में की गई इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।
सहरी से शुरू होता है रोजे का सफर
रोजेदार सुबह सूरज निकलने से पहले सहरी करते हैं। यह दिन का पहला भोजन होता है, जो फज्र की अजान से पहले तक किया जाता है। इसके बाद रोजा शुरू हो जाता है और शाम तक कुछ भी खाना-पीना नहीं होता। सहरी का उद्देश्य यह होता है कि व्यक्ति पूरे दिन ऊर्जा के साथ इबादत कर सके और रोजा सही तरीके से निभा सके।
इफ्तार: रोजा खोलने के साथ भाईचारे का एहसास
सूर्यास्त के बाद मग़रिब की अजान होते ही रोजा खोला जाता है, जिसे इफ्तार कहते हैं। परंपरा के अनुसार खजूर और पानी से रोजा खोला जाता है, फिर नमाज अदा की जाती है और भोजन किया जाता है। इफ्तार का सामाजिक महत्व भी बहुत बड़ा है, क्योंकि कई जगह लोग मिलकर सामूहिक इफ्तार करते हैं, जिससे आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़ता है।
तरावीह और रमजान का असली मकसद
रमजान में ईशा की नमाज के बाद तरावीह पढ़ी जाती है, जो सिर्फ इसी महीने में होती है। इसमें कुरान की तिलावत की जाती है और कई मस्जिदों में पूरे महीने में पूरा कुरान पढ़ा जाता है। रमजान का असली संदेश यह है कि इंसान बुरे कामों से दूर रहे, गुस्से और झूठ से बचे और ज्यादा से ज्यादा अच्छे काम करे। इसी कारण इसे रहमत, बरकत और मगफिरत यानी माफी का महीना कहा जाता है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। यूपी न्यूज इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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