झीरम घाटी केस में 10 दोषियों को फांसी, 13 साल बाद आया फैसला, फिर भी कई सवाल बाकी, पूरी साजिश का मास्टरमाइंड कौन?
झीरम घाटी नक्सली हमले के 13 साल बाद जगदलपुर NIA कोर्ट ने 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। हमले में कांग्रेस के बड़े नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी। 101 गवाहों की गवाही के बाद आए फैसले के बावजूद मास्टर प्लान, फरार आरोपियों, इंटेलिजेंस फेलियर और 4,184 पन्नों की जांच रिपोर्ट से जुड़े सवाल चर्चा में हैं।
13 साल पहले बस्तर की झीरम घाटी में गोलियों की गूंज ने छत्तीसगढ़ की राजनीति की पूरी तस्वीर बदल दी थी। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए माओवादी हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 29 लोगों की मौत हुई थी। अब इस मामले में जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। यह फैसला 13 साल लंबी सुनवाई, 101 गवाहों के बयान और बड़ी संख्या में दस्तावेजी व फॉरेंसिक साक्ष्यों के बाद आया है। लेकिन झीरम की कहानी यहां खत्म होती दिख नहीं रही। अदालत के फैसले ने एक बड़े आपराधिक मामले में दोष तय कर दिया है, मगर इसके साथ ही कुछ पुराने सवाल फिर सामने आ गए हैं। क्या हमले की पूरी साजिश का खुलासा हो चुका है? क्या सिर्फ ट्रायल का सामना करने वाले 10 लोग ही इस हमले की पूरी योजना के जिम्मेदार थे? हमले की जानकारी माओवादियों तक कैसे पहुंची? इतने बड़े राजनीतिक काफिले की सुरक्षा में चूक कहां हुई? और वे बाकी आरोपी कहां हैं, जिनके नाम जांच में सामने आए थे? यही सवाल झीरम घाटी के इस फैसले को सिर्फ एक अदालती फैसला नहीं रहने देते।
25 मई 2013 को आखिर हुआ क्या था?
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से लौट रही थी। काफिला बस्तर की झीरम घाटी से गुजर रहा था। इसी दौरान माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। हमले में आईईडी और हथियारों का इस्तेमाल किया गया। काफिले का रास्ता बाधित किया गया और जंगल की तरफ से गोलीबारी शुरू हुई। हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेता, पार्टी कार्यकर्ता और सुरक्षा कर्मी मारे गए। मृतकों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार जैसे नाम शामिल थे। विभिन्न रिपोर्टों में मृतकों की संख्या को लेकर अंतर मिलता है, लेकिन NIA ट्रायल से जुड़ी हालिया रिपोर्टों में 29 मृतकों का आंकड़ा दर्ज है। महेंद्र कर्मा को हमले का प्रमुख निशाना माना गया था। वह माओवाद विरोधी अभियान सलवा जुडूम के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे थे।
13 साल की सुनवाई, 101 गवाह और फिर 10 दोषी
झीरम मामले की सुनवाई करीब 13 साल तक चली। अभियोजन पक्ष ने अदालत में 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए और दस्तावेजी व फॉरेंसिक साक्ष्य पेश किए। मामले में 11 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल चला था, जिनमें से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। इसके बाद 10 आरोपियों पर मुकदमा चला और सितंबर 2026 में अदालत ने सभी को दोषी ठहराया। 16 सितंबर 2026 को अदालत ने इन सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। हालांकि मौत की सजा के मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी बाकी है। दोषियों के पास ऊपरी अदालत में अपील का रास्ता है और सजा का अंतिम क्रियान्वयन संबंधित उच्च न्यायिक प्रक्रिया के अधीन रहेगा। दोषी ठहराए गए लोगों में प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा पुनेम, मोडियम मुक्का, मंडवी कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयाता मरकाम, मड़ाकामी देवा, जोगा मड़ाकामी, बंजामी सन्ना उर्फ चामरू उर्फ डेंगा और महादेव नाग शामिल हैं।
अब कौन से उठ रहे सवाल ?
अदालत ने जिन 10 लोगों को दोषी ठहराया है, वे वही आरोपी हैं जिनके खिलाफ इस ट्रायल में अभियोजन पक्ष ने मामला चलाया। लेकिन NIA की चार्जशीट में नामजद आरोपियों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक NIA ने 2014 में 9 गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की थी। 2015 में दाखिल सप्लीमेंट्री चार्जशीट में 35 और नाम जोड़े गए। रिकॉर्ड में 33 नामजद आरोपियों के फरार होने की बात सामने आई थी। यहीं से झीरम केस का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। क्या हमले की पूरी योजना और उसे अंजाम देने वाला पूरा नेटवर्क अदालत के सामने आया है या ट्रायल में मौजूद 10 दोषियों तक ही कानूनी जिम्मेदारी तय हुई है?
मास्टर प्लान किस स्तर पर बना था?
इतने बड़े राजनीतिक काफिले पर हमला अचानक हुआ फैसला नहीं हो सकता था। काफिले के रास्ते, नेताओं की मौजूदगी और हमले की तैयारी को लेकर जांच एजेंसियों ने अलग-अलग पहलुओं की जांच की थी। अब सवाल यह है कि हमले का मास्टर प्लान किस स्तर पर तैयार हुआ था? किसने नेताओं को निशाना बनाने का फैसला लिया? काफिले की जानकारी माओवादियों तक कैसे पहुंची? इतने बड़े हमले के लिए हथियार, विस्फोटक और लोगों की तैनाती कैसे हुई? NIA की जांच में CPI माओवादी से जुड़े कई कैडर और कमांड स्तर के लोगों की भूमिका सामने रखी गई थी। लेकिन मौजूदा अदालत का फैसला उन 10 आरोपियों के खिलाफ है, जिनका ट्रायल हुआ और जिन पर दोष सिद्ध हुआ। इसलिए हमले से जुड़े व्यापक नेटवर्क की भूमिका को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।
इंटेलिजेंस फेलियर का सवाल भी बरकरार
झीरम घाटी बस्तर का बेहद संवेदनशील इलाका था। ऐसे क्षेत्र में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का बड़ा काफिला गुजर रहा था। माओवादियों ने इतने बड़े स्तर पर हमला किया और लंबे समय तक काफिले को निशाना बनाया। इसलिए सुरक्षा और इंटेलिजेंस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। क्या सुरक्षा एजेंसियों के पास पहले से कोई इनपुट था? अगर था तो उसे काफिले की सुरक्षा में किस तरह इस्तेमाल किया गया? अगर कोई इनपुट नहीं था तो इतने बड़े हमले की भनक क्यों नहीं लगी? अदालत के मौजूदा फैसले का केंद्र आपराधिक आरोपों पर दोषसिद्धि है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित चूक या प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल अपने आप में अलग जांच और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
भूपेश बघेल लंबे समय से साजिश की बात कहते रहे हैं
झीरम मामले में राजनीतिक साजिश का मुद्दा भी लंबे समय से उठता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने कई मौकों पर हमले के पीछे बड़ी साजिश की बात कही है और कहा है कि मामले की पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। 2021 में भी उन्होंने झीरम हमले की साजिश की तह तक जाने की बात कही थी। हालांकि किसी राजनीतिक नेता का यह दावा अपने आप में न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। झीरम मामले में साजिश के व्यापक पहलू को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दावे और जांच से जुड़े सवाल सामने आते रहे हैं। इसी वजह से मौजूदा फैसला आने के बाद भी यह चर्चा बनी हुई है कि क्या अदालत के सामने आए साक्ष्यों ने हमले की पूरी तस्वीर सामने रख दी है या जांच के कुछ हिस्से अभी भी बाकी हैं।
4,184 पन्नों की रिपोर्ट, जिसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं
झीरम मामले की एक दूसरी जांच न्यायिक आयोग के जरिए भी हुई थी। 2013 में तत्कालीन सरकार ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था। कई वर्षों की कार्यवाही के बाद आयोग की रिपोर्ट 2021 में राज्यपाल को सौंपी गई। रिपोर्ट 10 खंडों में थी और कुल 4,184 पन्नों की थी। रिपोर्ट सौंपे जाने के तरीके को लेकर उस समय विवाद हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रिपोर्ट को अधूरा बताते हुए इसे सार्वजनिक किए जाने पर सवाल उठाए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने आयोग को नए अध्यक्ष और नए सदस्यों के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की और जांच का दायरा भी बढ़ाया गया। लेकिन इस पुनर्गठित आयोग की कार्यवाही को मई 2022 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रोक दिया था।
अब भी सवालों के घेरे में 33 आरोपी
झीरम मामले में ट्रायल का सामना करने वाले 10 आरोपियों को अब मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन NIA रिकॉर्ड में नामजद अन्य आरोपियों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। हालिया रिपोर्टों में 33 नामजद आरोपियों के फरार होने का उल्लेख है। इनमें कुछ ऐसे नाम भी हैं जिनकी भूमिका जांच एजेंसी ने हमले की योजना और माओवादी संगठन की कमान से जोड़कर बताई थी। जांच रिकॉर्ड में बारसे सुक्का उर्फ देवा का नाम भी सामने आया था। रिपोर्टों के मुताबिक वह दरभा डिविजन कमेटी से जुड़ा रहा और बाद में माओवादी बटालियन का कमांडर बना। उसने जनवरी 2026 में तेलंगाना में सरेंडर किया। इसी तरह थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी का नाम भी मामले से जुड़ा रहा है। इन बड़े नामों और अन्य फरार आरोपियों की भूमिका को लेकर सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि झीरम हमला सिर्फ एक स्थानीय वारदात नहीं था, बल्कि कांग्रेस के शीर्ष राज्य नेतृत्व को निशाना बनाने वाला बड़ा माओवादी हमला था।
अब झीरम केस में आगे क्या?
13 साल बाद 10 दोषियों को फांसी की सजा मिलना मामले की न्यायिक प्रक्रिया में एक बड़ा पड़ाव है। लेकिन मौत की सजा के बाद भी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं होती। दोषियों को ऊपरी अदालत में अपील का अधिकार है और सजा की पुष्टि की प्रक्रिया भी होगी। इसके साथ ही झीरम की व्यापक कहानी में कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अदालत के इस फैसले से अलग स्तर पर तलाशा जाना बाकी है। हमले की पूरी साजिश किसने रची? काफिले की जानकारी माओवादियों तक कैसे पहुंची? सुरक्षा और इंटेलिजेंस में कहां चूक हुई? फरार आरोपियों की भूमिका क्या थी? और 4,184 पन्नों की न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में आखिर क्या निष्कर्ष निकाले गए थे? यही वजह है कि झीरम घाटी का यह फैसला 13 साल पुराने एक मामले में सजा सुनाए जाने से आगे की कहानी भी बन गया है। 10 लोगों पर अदालत ने दोष तय कर दिया है, लेकिन झीरम हमले से जुड़े बाकी सवालों के जवाब आने वाले समय में जांच, अपील और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से ही पूरी तरह स्पष्ट होंगे।
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