दुनिया का नक्शा बदलेगा तो भारत को क्या आपत्ति? UN के नए Map पर बोला भारत- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख ऐसे ही दिखने चाहिए
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के नक्शे को वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी है। भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत अपने पूरे क्षेत्र को आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुसार दिखाने की बात साफ कर दी। आखिर मर्केटर मैप में क्या कमी थी, नया नक्शा अफ्रीका को बड़ा और यूरोप को छोटा क्यों दिखाएगा और भारत की सीमाओं पर इसका क्या असर होगा?
दुनिया को नक्शे पर देखने का तरीका बदलने की तैयारी के बीच भारत ने अपनी सीमाओं को लेकर साफ रुख सामने रखा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाने वाले नक्शे के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत अपने पूरे क्षेत्र को आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुसार दिखाने की बात स्पष्ट कर दी। भारत ने कहा है कि देश की सीमाएं अटल हैं और इनके साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत के क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाया जाना भी मंजूर नहीं होगा।
UN के प्रस्ताव पर भारत ने वोट दिया, फिर आपत्ति क्यों जताई?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को दुनिया के नक्शे को ज्यादा वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात में दिखाने से जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस प्रस्ताव का मकसद देशों की सीमाओं को बदलना नहीं, बल्कि पृथ्वी को नक्शे पर दिखाने के तरीके में सुधार करना है। भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया है। लेकिन विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि इसके पक्ष में वोट देने का मतलब किसी खास नक्शे, प्रोजेक्शन या उसमें दिखाई गई सीमाओं को स्वीकार करना नहीं है। भारत की आपत्ति उस स्थिति को लेकर है, जिसमें उसके क्षेत्र को गलत तरीके से दिखाया जा सकता है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत का पूरा संप्रभु क्षेत्र आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए।
भारत की जमीन नहीं बदलेगी, सिर्फ नक्शे पर दिखने का तरीका बदलेगा
UN के प्रस्ताव का सबसे अहम पहलू यह है कि इससे किसी देश का वास्तविक क्षेत्रफल या सीमा नहीं बदलने वाली। बदलाव सिर्फ इतना है कि दुनिया को सपाट नक्शे पर दिखाते समय देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब नजर आएगा। भारत का क्षेत्रफल पहले जितना है, उतना ही रहेगा। उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि नए प्रोजेक्शन में भारत की आकृति पहले इस्तेमाल किए जाने वाले नक्शे की तुलना में कुछ अलग दिखाई दे सकती है। दूसरे शब्दों में समझें तो बदलाव जमीन पर नहीं, सिर्फ नक्शे पर दिखाई देगा।
आखिर पुराने मर्केटर नक्शे में क्या दिक्कत थी?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले नक्शों में मर्केटर प्रोजेक्शन प्रमुख रहा है। इसे जेरार्डस मर्केटर ने वर्ष 1569 में तैयार किया था। उस दौर में इसका सबसे बड़ा फायदा समुद्री यात्रा में था। इस नक्शे पर दिशा और समुद्री रास्तों को समझना आसान था। लेकिन इसकी एक बड़ी कमी भी थी। जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से दूर होता जाता है, वह नक्शे पर वास्तविक आकार से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई देश और क्षेत्र नक्शे पर अपने वास्तविक आकार से काफी बड़े नजर आते हैं।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण सबसे ज्यादा चौंकाता है
मर्केटर नक्शे की समस्या समझने के लिए ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण सबसे ज्यादा चर्चित है। मर्केटर प्रोजेक्शन में ग्रीनलैंड का आकार अफ्रीका के काफी करीब नजर आता है। लेकिन वास्तविकता में दोनों के क्षेत्रफल में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है। नक्शे पर दोनों के आकार को देखने पर यह अंतर उतना स्पष्ट नहीं दिखाई देता। इसी विकृति को कम करने के लिए अब ऐसे प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है, जिसमें क्षेत्रफल का अनुपात ज्यादा सही रहे।
नया नक्शा अफ्रीका को बड़ा और यूरोप को छोटा दिखाएगा
नए इक्वल एरिया प्रोजेक्शन में देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात में दिखाने पर जोर दिया गया है। इसमें अफ्रीका पहले की तुलना में काफी बड़ा नजर आएगा। दूसरी ओर यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार मर्केटर नक्शे की तुलना में छोटा दिखाई दे सकता है। एशिया के कुछ हिस्सों की आकृति और आकार में भी अंतर नजर आ सकता है। भारत के मामले में बदलाव बहुत बड़ा नहीं होगा, क्योंकि भारत भूमध्य रेखा से उतना दूर नहीं है जितने उत्तरी ध्रुव के करीब स्थित देश हैं। हालांकि जब भारत की तुलना यूरोप, रूस या कनाडा जैसे उत्तरी क्षेत्रों से की जाएगी तो क्षेत्रफल का अंतर ज्यादा वास्तविक दिखाई दे सकता है।
भारत के लिए नए नक्शे का मतलब क्या है?
- क्षेत्रफल: भारत का वास्तविक क्षेत्रफल बिल्कुल नहीं बदलेगा।
- सीमाएं: भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
- आकृति: नए प्रोजेक्शन में भारत की आकृति थोड़ी अलग दिखाई दे सकती है।
- तुलना: कुछ उत्तरी देशों की तुलना में भारत का आकार ज्यादा वास्तविक अनुपात में नजर आएगा।
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख: भारत चाहता है कि इन क्षेत्रों समेत पूरा भारतीय क्षेत्र आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाए।
यही वह बिंदु है, जहां भारत ने UN के नक्शे के तरीके और भारत की सीमाओं के चित्रण के बीच अंतर साफ किया है।
अफ्रीकी देशों ने नक्शा बदलने की मांग क्यों उठाई?
नक्शे को बदलने की मांग सिर्फ तकनीकी वजहों से नहीं उठी। अफ्रीकी देशों का तर्क है कि लंबे समय तक दुनिया को एक ऐसे नक्शे के जरिए देखने से लोगों की धारणा भी प्रभावित होती है, जिसमें अफ्रीका अपने वास्तविक आकार से छोटा नजर आता है। UN में रखे गए प्रस्ताव में अफ्रीका के साथ लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी उल्लेख किया गया। तर्क दिया गया कि इन क्षेत्रों को नक्शे पर वास्तविक आकार से छोटा देखने से उनके विकास, संसाधनों और आर्थिक क्षमता को लेकर गलत धारणा बन सकती है। यह प्रस्ताव टोगो की ओर से रखा गया था और इसे अफ्रीकी संघ का समर्थन मिला। टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने नक्शों को केवल भौगोलिक जानकारी का माध्यम न मानते हुए शिक्षा और लोगों की सोच पर उनके प्रभाव की बात कही थी।
फ्रांस भी मर्केटर नक्शे से आगे बढ़ने की तैयारी में
UN में मतदान से पहले फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। फ्रांस ने मर्केटर प्रोजेक्शन की जगह ऐसे नक्शों के इस्तेमाल की बात कही, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही तरीके से दिखाई दे। फ्रांस की ओर से एकर्ट IV प्रोजेक्शन का इस्तेमाल करने की बात कही गई है। इसे जर्मन कार्टोग्राफर मैक्स एकर्ट-ग्राइफेंडॉर्फ ने 1906 में तैयार किया था। एकर्ट ने दुनिया के नक्शे के छह अलग-अलग डिजाइन तैयार किए थे, जिनमें चौथा प्रोजेक्शन क्षेत्रफल के लिहाज से ज्यादा सटीक माना जाता है।
एकर्ट IV के बाद इक्वल अर्थ की जरूरत क्यों पड़ी?
एकर्ट IV में क्षेत्रफल को सही अनुपात में दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन इसमें भी दुनिया के कई हिस्सों की आकृति में विकृति दिखाई देती है। इसी समस्या को कम करने के लिए इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन को विकसित किया गया। इसका उद्देश्य सिर्फ क्षेत्रफल को सही दिखाना नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया को अपेक्षाकृत संतुलित रूप में प्रस्तुत करना भी था। यानी नक्शा बदलने की पूरी बहस सिर्फ यह नहीं है कि कौन सा देश बड़ा या छोटा दिखता है। असली मुद्दा यह है कि गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर किस तरह दिखाया जाए ताकि क्षेत्रफल और आकार की गलत धारणा कम से कम हो।
क्या UN के फैसले के बाद मर्केटर नक्शा खत्म हो जाएगा?
ऐसा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब यह है कि दुनिया के देश, स्कूल, किताबों के प्रकाशक या टेक कंपनियां मर्केटर नक्शे को तुरंत हटाने के लिए बाध्य नहीं हैं। मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल आगे भी कुछ क्षेत्रों में जारी रह सकता है, खासकर समुद्री और हवाई नेविगेशन में, जहां दिशा और रास्ते को सही तरीके से दिखाने की इसकी खासियत उपयोगी है। नए प्रस्ताव का उद्देश्य मुख्य रूप से ऐसे नक्शों को बढ़ावा देना है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही अनुपात में दिखाई दे।
मैप, नक्शा और मानचित्र में भी है दिलचस्प अंतर
दुनिया के नक्शे पर चल रही इस बहस के बीच मैप, नक्शा और मानचित्र शब्द भी अपने-अपने इतिहास के साथ जुड़े हैं। मैप अंग्रेजी का शब्द है और इसकी जड़ लैटिन के माप्पा शब्द में मानी जाती है, जिसका अर्थ कपड़ा या चादर था। बाद में इसी से मानचित्र के लिए मैप शब्द का इस्तेमाल होने लगा। नक्शा अरबी मूल का शब्द माना जाता है। अरबी में नक्श का संबंध चित्र या नक्काशी से है। इसी से आगे चलकर किसी स्थान के चित्र या मानचित्र के अर्थ में नक्शा शब्द प्रचलित हुआ। मानचित्र संस्कृत मूल का शब्द है, जिसे मान और चित्र से मिलकर बना माना जाता है। इसका अर्थ किसी स्थान को माप या अनुपात के साथ चित्र के रूप में दिखाना है। दुनिया का नक्शा बदलने की यह पूरी कवायद असल में देशों की जमीन बदलने की नहीं, बल्कि दुनिया को देखने के तरीके को ज्यादा वास्तविक बनाने की कोशिश है। भारत ने भी इसी अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा है कि नक्शे का प्रोजेक्शन बदल सकता है, लेकिन उसकी सीमाएं नहीं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के संप्रभु क्षेत्र का चित्रण उसके आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही होना चाहिए। भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी सीमाओं को लेकर कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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