अंतरिक्ष में अमेरिका ने छिपाकर रखे हथियार, पहली बार कबूला, रूस-चीन से बढ़ी जंग की तैयारी, धरती पर भी पड़ेगा असर
अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। हथियारों की संख्या और क्षमता अभी गुप्त है। रूस और चीन से बढ़ती स्पेस रेस के बीच जानिए अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो धरती पर क्या असर पड़ेगा।
अंतरिक्ष को अब तक दुनिया ने विज्ञान, खोज और संचार का क्षेत्र माना है, लेकिन अब यही अंतरिक्ष बड़ी सैन्य ताकतों के बीच नई जंग का मैदान बनता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर माना है कि उसने अंतरिक्ष में ऐसे हथियार तैनात कर रखे हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि ऑर्बिट में कौन से हथियार मौजूद हैं, उनकी संख्या कितनी है और उन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था। इन हथियारों की असली क्षमता को भी फिलहाल गुप्त रखा गया है। अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में सैन्य ताकत बढ़ाने की होड़ लगातार तेज हो रही है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अमेरिका ने अंतरिक्ष में हथियार क्यों तैनात किए, बल्कि चिंता इस बात की भी है कि इसके बाद रूस और चीन किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।
अंतरिक्ष में हथियार क्यों जरूरी हो गए हैं?
आज की आधुनिक जंग सिर्फ जमीन, समुद्र और हवा में नहीं लड़ी जाती। किसी भी बड़ी सैन्य कार्रवाई में सैटेलाइट की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। सेनाएं सैटेलाइट के जरिए आपसी संपर्क बनाए रखती हैं, रास्ते और लोकेशन की जानकारी हासिल करती हैं, खुफिया जानकारी जुटाती हैं और मिसाइलों की गतिविधियों पर नजर रखती हैं। यानी किसी देश के लिए उसके सैटेलाइट जितने जरूरी हैं, उन्हें सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि बड़ी सैन्य ताकतें अब केवल नए सैटेलाइट बनाने तक सीमित नहीं हैं। वे ऐसी तकनीक भी विकसित कर रही हैं, जिससे अपने अंतरिक्ष सिस्टम को दूसरे देशों के हमले से बचाया जा सके और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के अंतरिक्ष सिस्टम को प्रभावित किया जा सके।
अमेरिका ने हथियार तो माने, लेकिन राज अभी भी गहरा है
अमेरिका ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि उसके पास ऑर्बिट में हथियार मौजूद हैं। लेकिन सबसे अहम जानकारी अभी भी सामने नहीं आई है। इन हथियारों का प्रकार क्या है, वे कितने हैं, उनकी मारक क्षमता कितनी है और उन्हें कब लॉन्च किया गया, इन सवालों पर अमेरिकी अधिकारियों ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। यही गोपनीयता इस पूरे मामले को और संवेदनशील बनाती है। क्योंकि अंतरिक्ष में तैनात हथियारों की जानकारी जितनी कम सार्वजनिक होगी, उतना ही दूसरे देशों के लिए अमेरिका की वास्तविक क्षमता का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा।
रूस को लेकर अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता
अमेरिका लंबे समय से रूस की अंतरिक्ष सैन्य क्षमता को लेकर चिंता जताता रहा है। अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भविष्य के युद्ध का हिस्सा मानता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने अंतरिक्ष सिस्टम की सुरक्षा की जा सके। अमेरिका को रूस की ओर से अंतरिक्ष में संभावित परमाणु हथियारों की तैयारी को लेकर भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसी क्षमता विकसित कर सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके। हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने से जुड़े अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी पीछे नहीं, तेजी से बढ़ा रहा स्पेस पावर
अमेरिका के सामने दूसरी बड़ी चुनौती चीन की बढ़ती अंतरिक्ष और सैन्य ताकत है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी अमेरिका की चिंता सामने आती रही है। ये मिसाइलें बेहद तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें ट्रैक करना और रोकना मुश्किल माना जाता है। ऐसे में अमेरिका का अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने की बात स्वीकार करना यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब अंतरिक्ष को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा मानकर तैयारी कर रहा है।
एक देश हथियार बढ़ाएगा तो दूसरा भी पीछे नहीं रहेगा
अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ का सबसे बड़ा खतरा यही है कि एक देश की तैयारी दूसरे देश को भी अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकती है। अमेरिका रूस और चीन की गतिविधियों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। रूस और चीन भी अमेरिका की नई क्षमताओं को अपने लिए खतरा बताकर नई तकनीक विकसित करने का तर्क दे सकते हैं। इस तरह एक देश का कदम दूसरे देश की तैयारी को बढ़ा सकता है और फिर तीसरा देश भी पीछे नहीं रहना चाहेगा। यही सिलसिला आगे चलकर अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को और तेज कर सकता है।
अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो सिर्फ सेना नहीं, आम लोग भी प्रभावित होंगे
अंतरिक्ष में युद्ध की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उसका असर सिर्फ सैन्य ठिकानों या सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आज आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी सैटेलाइट पर काफी हद तक निर्भर है। मोबाइल और संचार व्यवस्था, मौसम की जानकारी, नेविगेशन, विमान और जहाजों की आवाजाही से लेकर कई दूसरी सेवाओं में सैटेलाइट की भूमिका है। जीपीएस जैसी सेवाओं के जरिए विमान, जहाज और ट्रक रास्ता तय करते हैं। वित्तीय और बैंकिंग सिस्टम में भी सटीक समय और संचार से जुड़ी तकनीक की जरूरत होती है। ऐसे में अगर किसी बड़े अंतरिक्ष संघर्ष में बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब होते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है, तो उसका असर दुनिया भर में महसूस किया जा सकता है। यानी अंतरिक्ष में होने वाला युद्ध धरती से करोड़ों किलोमीटर दूर जरूर होगा, लेकिन उसका असर धरती पर रहने वाले आम लोगों की जिंदगी तक पहुंच सकता है।
1967 की संधि के बावजूद हथियारों पर पूरी रोक नहीं
अमेरिका के इस खुलासे के बाद 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है। इस संधि का उद्देश्य अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के दूसरे हथियारों की तैनाती से बचाना था। अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने 27 जनवरी 1967 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे और यह 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार और सामूहिक विनाश के दूसरे हथियार तैनात करने पर रोक है। लेकिन इसमें हर तरह के पारंपरिक हथियारों को अंतरिक्ष में रखने पर उसी तरह की स्पष्ट पाबंदी नहीं है। यही वजह है कि अंतरिक्ष में पारंपरिक सैन्य क्षमता और हथियारों की तैनाती को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस लगातार बनी हुई है।
ट्रंप के दौर में अमेरिका का स्पेस मिशन और तेज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा और मिसाइल डिफेंस से जोड़कर देखने पर ज्यादा जोर दिया गया है। अमेरिका अपनी अंतरिक्ष क्षमता बढ़ाने के साथ मिसाइल हमलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर भी काम कर रहा है। इसी दिशा में गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस योजना को भी देखा जा रहा है। ट्रॉय मिंक ने बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम तैयार करने पर तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोकने में सक्षम हो सकता है। उनके मुताबिक इस कार्यक्रम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया। हालांकि इस सिस्टम की पूरी क्षमता और उसके काम करने का तरीका अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
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