नेपाल में तबाही के बाद भारत पर भी GLOF का खतरा, हिमाचल की 88 ग्लेशियर झीलें खतरनाक, अचानक कैसे फटती हैं ये झीलें?
नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ के बाद भारत में ग्लेशियर झीलों के खतरे को लेकर चिंता बढ़ गई है। हिमाचल प्रदेश में 669 ग्लेशियर झीलों में से 88 को जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। आखिर ग्लेशियर झील क्या होती है, यह अचानक कैसे फटती है और GLOF से भारत के किन इलाकों को खतरा हो सकता है?
नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के खतरे को फिर चर्चा में ला दिया है। शुरुआती आकलन में तबाही की वजह ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF मानी जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के हिमालयी राज्यों में भी ऐसी झीलें खतरा बन सकती हैं? हालिया रिसर्च के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या पिछले तीन दशकों में कई गुना बढ़ गई है। इनमें 88 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पहाड़ों की बदलती परिस्थितियां भविष्य में ऐसे खतरों को बढ़ा सकती हैं।
नेपाल में अचानक आई बाढ़ के बाद बढ़ी चिंता
26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में अचानक तेज बाढ़ आ गई। कुछ ही समय में नदी का जलस्तर बढ़ा और आसपास के इलाकों में भारी तबाही हुई। सड़कें, इमारतें और कई इलाके बाढ़ की चपेट में आ गए। शुरुआती आकलन में इस घटना के पीछे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की आशंका जताई गई। इससे पहले जुलाई 2025 में भी इसी हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झील टूटने की घटना सामने आई थी। हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं ने भारत के लिए भी चिंता बढ़ा दी है।
34 साल में 107 से बढ़कर 669 हुईं ग्लेशियर झीलें
IIT रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी की साझा स्टडी में हिमाचल प्रदेश की ग्लेशियर झीलों को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1990 में हिमाचल प्रदेश में 107 ग्लेशियर झीलें थीं। 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर 669 हो गई। यानी करीब 34 वर्षों में ग्लेशियर झीलों की संख्या में 525 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इन 669 झीलों में से 88 को GLOF के लिहाज से जोखिम वाली झीलों की श्रेणी में रखा गया है। इनमें 9 झीलें बेहद ज्यादा खतरनाक, 18 ज्यादा खतरनाक और 26 मध्यम खतरे वाली बताई गई हैं। वैज्ञानिकों ने ब्यास और सतलुज नदी बेसिन की दो झीलों पर विशेष मॉडलिंग भी की है।
एक सेकेंड में बह सकता है लाखों लीटर पानी
रिसर्चर्स ने ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक अन्य झील के संभावित खतरे का अध्ययन किया। मॉडलिंग के अनुसार, अगर हिमसू झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो करीब 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी नीचे की ओर बह सकता है। यह मात्रा हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी के बराबर है। वहीं, सतलुज बेसिन की दूसरी झील के टूटने की स्थिति में पानी का बहाव 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड तक पहुंच सकता है। यानी हर सेकेंड करीब 35 लाख लीटर पानी नीचे की ओर आ सकता है। इससे डैम, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और सैकड़ों इमारतों को खतरा हो सकता है।
आखिर ग्लेशियर झील होती क्या है?
हिमालय और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में मौजूद ग्लेशियर जब पिघलते हैं तो उनका पानी आसपास के निचले हिस्सों में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे पानी एक झील का रूप ले लेता है। इसे ग्लेशियर या ग्लेशियल लेक कहा जाता है। कई बार इन झीलों के चारों तरफ बर्फ, पत्थर, मिट्टी और पहाड़ों के मलबे की प्राकृतिक दीवार बन जाती है। यही दीवार झील के पानी को रोककर रखती है। लेकिन जब किसी कारण से यह प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाता है, तो झील में जमा भारी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर तेजी से बहने लगता है। इसी घटना को ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड या GLOF कहा जाता है। GLOF में पानी का बहाव सामान्य बाढ़ की तुलना में काफी तेज हो सकता है। तेज पानी अपने साथ पत्थर, मलबा और पेड़ बहाता हुआ नीचे के इलाकों तक पहुंच सकता है।
ग्लेशियर झीलें अचानक क्यों फट जाती हैं?
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें तीन प्रमुख वजहें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
1. बढ़ता तापमान और तेजी से पिघलते ग्लेशियर
ग्लोबल वार्मिंग का असर हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से दिखाई दे रहा है। ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नई झीलें बन रही हैं और पहले से मौजूद झीलों में पानी की मात्रा बढ़ रही है। जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी के अनुसार, ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों का तापमान पिछले 20 वर्षों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने और नदियों के बहाव में बड़े बदलाव की आशंका जताई गई है।
2. हिमस्खलन या चट्टान का झील में गिरना
पहाड़ी इलाकों में कई बार बड़े बर्फ के टुकड़े, चट्टानें या भूस्खलन का मलबा सीधे ग्लेशियर झील में गिर जाता है। इससे झील के अंदर पानी की बड़ी लहर बन सकती है। तेज लहर प्राकृतिक बांध के ऊपर से गुजर सकती है या उसे कमजोर कर सकती है। अगर प्राकृतिक बांध टूट जाए तो भारी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में दर्ज कई GLOF घटनाओं में हिमस्खलन को एक प्रमुख कारण माना गया है।
3. भारी बारिश और झील का ओवरफ्लो
भारी बारिश के दौरान ग्लेशियर झीलों में पानी तेजी से बढ़ सकता है। अगर झील में पानी उसकी क्षमता से अधिक हो जाए तो पानी प्राकृतिक बांध के ऊपर से बहने लगता है। लगातार दबाव के कारण बांध कमजोर होकर टूट सकता है। इसके अलावा भूकंप, भूस्खलन और पहाड़ी इलाकों में मानवीय गतिविधियों के कारण भी प्राकृतिक ढांचे की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
88 झीलों का खतरा सिर्फ हिमाचल तक सीमित नहीं
हिमालयी क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े नदी तंत्र का हिस्सा हैं। हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार इन क्षेत्रों की निगरानी पर जोर दे रहे हैं। किसी ग्लेशियर झील के टूटने पर खतरा सिर्फ उस झील के आसपास के क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। पहाड़ों से नीचे आने वाला पानी नदी के रास्ते कई किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है। इससे सड़कें, पुल, गांव, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और नदी किनारे बसे इलाके प्रभावित हो सकते हैं।
क्या GLOF की तबाही को रोका जा सकता है?
ग्लेशियर झील को पूरी तरह खत्म करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन खतरे को कम करने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और GLOF रिस्क मिटिगेशन से जुड़े कार्यक्रमों के तहत खतरनाक झीलों की लगातार निगरानी और समय पर चेतावनी को महत्वपूर्ण माना गया है। कुछ मामलों में कृत्रिम नालियां बनाकर झील का पानी नियंत्रित तरीके से कम किया जा सकता है। इससे पानी का दबाव घटता है और प्राकृतिक बांध पर अचानक पड़ने वाला भार कम हो सकता है। इसके अलावा सैटेलाइट मॉनिटरिंग, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए समय पर अलर्ट सिस्टम भी ऐसे खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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