चीनी 3 महीने में 19 रुपए महंगी, खड़गे ने पूछा- ये कैसा आत्मनिर्भर भारत, सरकार बोली- एथेनॉल जिम्मेदार नहीं
देश के कई शहरों में चीनी 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है और पिछले 3 महीनों में इसके दाम करीब 19 रुपए यानी 40% तक बढ़ गए हैं। त्योहारों से पहले बढ़ती कीमतों को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार से सवाल किए हैं और 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री चीनी आयात को आत्मनिर्भर भारत से जोड़कर निशाना साधा है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि एथेनॉल नहीं, बल्कि उत्पादन में कमी, जमाखोरी, सट्टेबाजी और बाजार की परिस्थितियां कीमत बढ़ने की बड़ी वजह हैं। आखिर भारत को चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी, मिलों के पास स्टॉक कितना घटा और सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए?
नई दिल्ली। त्योहारों के मौसम से पहले रसोई से लेकर मिठाई की दुकानों तक चीनी की बढ़ती कीमतों ने असर दिखाना शुरू कर दिया है। देश के कई शहरों में चीनी का भाव 70 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है। पिछले तीन महीनों में इसकी कीमत करीब 19 रुपए प्रति किलो बढ़ी है, यानी लगभग 40% की तेजी दर्ज की गई है। इसी बढ़ती कीमत को लेकर अब राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया है कि जब भारत दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है, तो आखिर 10 लाख टन चीनी विदेश से आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। सरकार ने बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी-फ्री आयात को मंजूरी दी है। वहीं, सरकार का कहना है कि देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और कीमतों में तेजी के पीछे एथेनॉल नहीं, बल्कि जमाखोरी, सट्टेबाजी, मिलों की ओर से कीमतें बढ़ाना और अन्य बाजार परिस्थितियां जिम्मेदार हैं।
खड़गे ने सरकार से पूछे 3 सवाल
मल्लिकार्जुन खड़गे ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए चीनी की बढ़ती कीमतों और स्टॉक की स्थिति को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि त्योहारों से पहले मोदी सरकार की नीतियों की कड़वाहट चीनी की मिठास में घुल गई है। खड़गे ने सरकार से पूछा कि भारत जैसे बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देश में चीनी का स्टॉक 9 साल के निचले स्तर तक कैसे पहुंच गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आखिर 10 लाख टन चीनी को ड्यूटी-फ्री आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी। कांग्रेस अध्यक्ष ने एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी सरकार को घेरा। उनका सवाल था कि यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है, जहां एक तरफ विदेशों से चीनी आयात करनी पड़ रही है और दूसरी तरफ गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जा रहा है।
मिठाई की दुकानों पर भी दिखने लगा असर
चीनी की बढ़ती कीमतों का असर सिर्फ घरों की रसोई तक सीमित नहीं है। राजस्थान के भीलवाड़ा में मिठाई दुकानदारों का कहना है कि रक्षाबंधन से पहले चीनी महंगी होने से बिक्री पर असर पड़ा है। दुकानदारों के मुताबिक, मिठाई बनाने की लागत बढ़ गई है। त्योहारों के दौरान जहां ग्राहक संख्या बढ़ने की उम्मीद रहती है, वहां बढ़ती कीमतों का असर खरीदारी पर दिखाई दे रहा है। चीनी के साथ-साथ रोजमर्रा की कई दूसरी चीजों के दाम में भी तेजी आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक गुड़ करीब 24%, चावल 16% और मक्के का आटा लगभग 11% तक महंगा हुआ है।
मिलों के पास बचा स्टॉक घटा
चीनी की कीमतों में तेजी की एक बड़ी वजह मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक में कमी को भी माना जा रहा है। पिछले सीजन में नई पेराई शुरू होने से पहले चीनी मिलों के पास करीब 47 लाख टन शुगर मौजूद थी। इस बार यह स्टॉक घटकर लगभग 32 लाख टन रह गया है। यानी नए पेराई सीजन से पहले मिलों के पास पिछले साल की तुलना में करीब 15 लाख टन कम चीनी बची है। इसी वजह से बाजार में उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी। हालांकि, इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ISMA का कहना है कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है। संगठन के मुताबिक कीमतों में तेजी की एक वजह बाजार में सट्टेबाजी और ज्यादा मात्रा में चीनी खरीदकर स्टॉक करने की कोशिश भी हो सकती है।
सवाल एथेनॉल का भी, लेकिन सरकार ने जिम्मेदारी से किया इनकार
चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी बहस तेज हो गई है। कारोबारियों का एक वर्ग मानता है कि गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एथेनॉल के लिए इस्तेमाल बढ़ने से चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। लेकिन सरकार ने इस तर्क को खारिज कर दिया है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के मुताबिक देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और हाल के दिनों में कीमतों में तेजी के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि कीमतें बढ़ने के पीछे मिलों की ओर से दाम बढ़ाना, जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसी वजहें प्रमुख हैं। सरकार ने घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई के दबाव को भी कीमत बढ़ने की वजह बताया है।
अब एथेनॉल में चीनी की हिस्सेदारी भी कम
खाद्य सचिव के अनुसार देश में बनने वाले कुल एथेनॉल में अब चीनी से बनने वाले एथेनॉल की हिस्सेदारी करीब एक-चौथाई रह गई है। बाकी एथेनॉल मुख्य रूप से मक्का और दूसरे अनाजों से तैयार किया जा रहा है। एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी भी पिछले कुछ वर्षों में घटी है। 2022-23 में एथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 12% चीनी डायवर्ट की गई थी। 2025-26 में यह घटकर करीब 9% रह गई है। मौजूदा सीजन में एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 28 लाख टन चीनी डायवर्ट की गई है। सरकार का तर्क है कि जब एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हुआ है, तो केवल इसी वजह से कीमतों में बढ़ोतरी को नहीं जोड़ा जा सकता।
उत्पादन अनुमान 343 से घटकर 306 लाख टन
इस सीजन में चीनी उत्पादन को लेकर भी अनुमान बदले हैं। शुरुआत में देश में करीब 343 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था। लेकिन अब यह घटकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। उत्पादन में गिरावट के पीछे गन्ने की फसल पर रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का असर बताया गया है। इसके अलावा ज्यादा बारिश के कारण कई इलाकों में खेतों में पानी भर गया, जिससे फसल प्रभावित हुई।हालांकि, खाद्य मंत्रालय का दावा है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बढ़ी कीमत
भारत में चीनी के दाम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर भी पड़ रहा है। 2026-27 में दुनिया भर में चीनी की कमी करीब 33 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतें बढ़ी हैं। 30 जून को अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गई। यानी दो महीने से भी कम समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत 16% से ज्यादा बढ़ गई। ऐसे में घरेलू बाजार में भी कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना बनी हुई है।
जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने लगाई स्टॉक लिमिट
बढ़ती कीमतों और कृत्रिम कमी की आशंका के बीच सरकार ने डीलर्स के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट 30 नवंबर तक लागू कर दी है। वहीं, थोक उपभोक्ताओं के लिए 1 सितंबर से 15 दिन की स्टॉक सीमा लागू होगी। केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में जाकर स्टॉक का भौतिक सत्यापन भी कर रही हैं, ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी की स्थिति को रोका जा सके। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री चीनी आयात, स्टॉक लिमिट और सरकारी निगरानी के बाद क्या बाजार में चीनी की कीमतों पर लगाम लगेगी या त्योहारों के मौसम में बढ़ती मांग आम लोगों और मिठाई कारोबारियों की चिंता और बढ़ाएगी।
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