जिस केस की वजह से राजीव गांधी हारे चुनाव, 40 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने किया बंद, जानिए बोफोर्स घोटाले की पूरी कहानी
करीब चार दशक तक भारतीय राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में चर्चा का विषय रहे बोफोर्स घोटाले पर आखिरकार पूर्ण विराम लग गया। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। जानिए कैसे यह मामला राजीव गांधी सरकार से लेकर कारगिल युद्ध तक देश की राजनीति और रक्षा इतिहास का हिस्सा बन गया।
नई दिल्ली। करीब 40 साल तक भारतीय राजनीति, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों के बीच चर्चा का विषय रहे बोफोर्स घोटाले का अध्याय अब पूरी तरह बंद हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले से जुड़ी आखिरी लंबित याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही 1986 की तोप खरीद डील से शुरू हुआ देश का सबसे चर्चित रक्षा सौदा विवाद कानूनी रूप से समाप्त हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि अब इस मामले में आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील भी सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को राहत दी गई थी। यह मामला उस दौर का सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद बना, जिसने न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को घेरा, बल्कि 1989 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी बदल दी।
1986 की तोप खरीद से शुरू हुआ पूरा विवाद
मार्च 1986 में भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के साथ 155 मिमी हॉवित्जर तोपों की खरीद का करीब 1,437 करोड़ रुपये का समझौता किया था। यह सौदा भारतीय सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था। करीब एक साल बाद 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट ने दावा किया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए कथित रूप से करोड़ों रुपये का कमीशन दिया गया। इसके बाद मामला राजनीतिक विवाद में बदल गया और विपक्ष ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत में क्यों नहीं टिक पाया मामला?
बोफोर्स केस की जांच कई वर्षों तक चली, लेकिन अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 के फैसले में कहा था कि जांच एजेंसी पर्याप्त और भरोसेमंद साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। जांच के दौरान स्वीडन से प्राप्त कई दस्तावेजों का विधिवत सत्यापन नहीं हो सका। अदालत ने माना कि अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं माना जा सकता। इसके अलावा कथित कमीशन की राशि और आरोपित व्यक्तियों के बीच प्रत्यक्ष संबंध भी स्थापित नहीं किया जा सका। लंबे समय तक चली जांच के दौरान कई गवाह उपलब्ध नहीं रहे और समय बीतने के साथ कई महत्वपूर्ण साक्ष्य भी कमजोर पड़ गए।
फैसला आने तक CBI करती रही नई कड़ियां तलाशने की कोशिश
मामले को बंद होने से पहले तक केंद्रीय जांच ब्यूरो नई जानकारियां जुटाने का प्रयास करता रहा। एजेंसी ने अमेरिकी जांचकर्ता माइकल हर्शमैन से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड हासिल करने की कोशिश की। हर्शमैन ने वर्ष 2017 में दावा किया था कि बोफोर्स मामले की जांच को उस समय की सरकार ने प्रभावित किया था और वह इस संबंध में सहयोग करना चाहते थे। हालांकि CBI को उनसे जुड़े दस्तावेज नहीं मिल सके। एजेंसी ने इंटरपोल और अमेरिकी अधिकारियों से भी कई बार संपर्क किया, लेकिन कोई ठोस जानकारी हाथ नहीं लगी। इसके बाद 2025 में अदालत के माध्यम से लेटर रोगेटरी भेजकर अमेरिका से आधिकारिक सहयोग मांगा गया। अदालत ने भी माना था कि हर्शमैन के दावों की जांच के लिए विदेशी सहयोग आवश्यक है।
जांच एजेंसी की कार्यशैली पर भी उठे सवाल
बोफोर्स मामले में CBI की जांच भी लगातार सवालों के घेरे में रही। जांच पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद एजेंसी अदालत में मजबूत साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में टिप्पणी की थी कि CBI ने अपील दाखिल करने में करीब 12 वर्ष यानी 4522 दिनों की देरी की और इसका संतोषजनक कारण भी प्रस्तुत नहीं किया। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा था कि अधूरे और अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर मुकदमा चलाने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और आरोपियों के अधिकारों पर भी असर पड़ता है।
बोफोर्स विवाद ने बदल दी थी देश की राजनीति
1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने रिकॉर्ड 404 सीटें जीती थीं। लेकिन बोफोर्स विवाद सामने आने के बाद सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर रही। वरिष्ठ पत्रकार देबाशीष मुखर्जी ने अपनी पुस्तक द डिसरप्टर: हाउ वीपी सिंह शूक इंडिया में उल्लेख किया है कि बोफोर्स विवाद के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह ने 12 अप्रैल 1987 को इस्तीफा दे दिया था। चार दिन बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो ने कथित रिश्वतखोरी का खुलासा किया। इसके बाद स्वीडिश मीडिया ने दावा किया कि एबी बोफोर्स ने भारतीय नेताओं और रक्षा अधिकारियों तक कथित तौर पर लगभग 60 करोड़ रुपये की रिश्वत पहुंचाई। मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि इटली के कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोची ने इस सौदे में कथित बिचौलिये की भूमिका निभाई थी। हालांकि यह मामला अदालत में आरोप सिद्ध होने तक नहीं पहुंच सका। इन आरोपों के बीच हुए 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और यह मामला भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया।
कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोप बनी भारतीय सेना की ताकत
जिस बोफोर्स तोप की खरीद पर वर्षों तक विवाद चलता रहा, उसी तोप ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना को सामरिक बढ़त दिलाई। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में छिपे पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक और लगातार गोलाबारी में बोफोर्स की लंबी रेंज और ऊंचाई से फायर करने की क्षमता बेहद प्रभावी साबित हुई। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार इस तोप ने दुश्मन की सप्लाई लाइन बाधित करने और कई अहम चोटियों को वापस हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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