नागराज का वो मंदिर, जिसे तोड़ने पहुंचा औरंगजेब डर से हुआ बेहोश, कंकड़ लाने से घर में नहीं निकलते हैं सांप, जानिए उस मंदिर की पूरी कहानी
प्रयागराज के दारागंज में स्थित नागवासुकी मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार औरंगजेब मंदिर को तोड़ने पहुंचा था, लेकिन तलवार चलाने से पहले ही एक चौंकाने वाली घटना हुई। जानिए समुद्र मंथन, नागराज वासुकी के तीन वरदान और इस प्राचीन मंदिर से जुड़ी पूरी कहानी।
प्रयागराज। संगम नगरी में गंगा किनारे कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं और कथाएं सदियों से लोगों को अपनी ओर खींचती रही हैं। इन्हीं में से एक है दारागंज में स्थित प्राचीन नागवासुकी मंदिर। मान्यता है कि यहां नागों के राजा वासुकी विराजमान हैं और प्रयागराज की धार्मिक यात्रा नागवासुकी के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। सावन के महीने में इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ जाती है। नागपंचमी पर तो यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर में रुद्राभिषेक, महाभिषेक और कालसर्प दोष की शांति के लिए विशेष पूजा-अनुष्ठान भी किए जाते हैं। लेकिन इस मंदिर की कहानी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध स्थानीय कथा मुगल शासक औरंगजेब से भी जुड़ी है। पुजारियों और स्थानीय परंपरा के अनुसार, औरंगजेब ने मंदिर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन उसके साथ ऐसा घटनाक्रम हुआ कि उसे वापस लौटना पड़ा।
संगम से उत्तर दिशा में मौजूद है प्राचीन मंदिर
नागवासुकी मंदिर प्रयागराज के दारागंज में गंगा तट के पास स्थित है। संगम से उत्तर दिशा की ओर जाने पर यह प्राचीन मंदिर दिखाई देता है। मंदिर को प्रयाग के प्रमुख तीर्थों में शामिल माना जाता है और यह त्रिकोणीय तथा पंचकोसी परिक्रमा क्षेत्र का भी हिस्सा है। मान्यता है कि प्रयाग की परिक्रमा नागवासुकी के दर्शन के बिना पूरी नहीं होती। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रयागराज पहुंचने वाले श्रद्धालु संगम स्नान के साथ नागवासुकी मंदिर में भी दर्शन करते हैं।
मंदिर में नागराज वासुकी और शेषनाग की मूर्तियां
मंदिर के गर्भगृह में नागराज वासुकी की पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ शेषनाग से जुड़ी प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां पूजा-अर्चना करने से सर्पदोष और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। श्रावण मास में मंदिर में विशेष अनुष्ठान होते हैं। नागपंचमी के दिन यहां विशेष पूजा और मेले का आयोजन होता है। श्रद्धालु नागवासुकी को दूध अर्पित कर विधि-विधान से पूजा करते हैं।
औरंगजेब मंदिर तोड़ने पहुंचा था, फिर क्या हुआ?
नागवासुकी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित कथा औरंगजेब के समय की बताई जाती है। मंदिर के पुजारी पंडित श्याम बिहारी मिश्र के अनुसार, मुगलकाल में औरंगजेब प्रयागराज आया था। उस दौरान उसने यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। पुजारी के अनुसार, नागवासुकी मंदिर भी उसके निशाने पर था। वह मंदिर में पहुंचा और मूर्ति पर वार करने के लिए तलवार निकाली। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, जैसे ही उसने तलवार चलाने का प्रयास किया, नागवासुकी का दिव्य और विकराल स्वरूप दिखाई दिया। कहा जाता है कि यह दृश्य देखकर औरंगजेब घबरा गया और बेहोश होकर गिर पड़ा। इसके बाद उसकी सेना को वापस लौटना पड़ा। मंदिर से जुड़ी इसी कथा के कारण आज भी स्थानीय स्तर पर यह बात कही जाती है कि यहां औरंगजेब की तलवार नहीं चल सकी। हालांकि, यह घटना स्थानीय धार्मिक परंपरा और मंदिर से जुड़ी मान्यता के रूप में कही जाती है, इसके ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय हैं।
समुद्र मंथन से जुड़ी है नागवासुकी की कहानी
नागवासुकी मंदिर की पौराणिक कथा समुद्र मंथन से भी जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया तो नागराज वासुकी को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। मंथन के दौरान उनके शरीर पर काफी दबाव और घर्षण हुआ। इसके बाद उनके शरीर में जलन होने लगी। पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने अपनी पीड़ा भगवान विष्णु को बताई। इसके बाद उन्हें प्रयाग जाने की सलाह दी गई। मान्यता है कि प्रयाग में सरस्वती के अमृत समान जल का सेवन और विश्राम करने के बाद नागवासुकी की पीड़ा समाप्त हुई। इसी वजह से प्रयागराज में जिस स्थान पर उन्होंने विश्राम किया, उसे नागवासुकी से जोड़कर देखा जाता है।
भगवान विष्णु से मिले तीन वरदान की भी मान्यता
मंदिर के पुजारी के अनुसार, नागवासुकी को भगवान विष्णु से तीन वरदान प्राप्त होने की मान्यता है।
- पहला वरदान यह माना जाता है कि प्रयाग में संगम स्नान के बाद नागवासुकी के दर्शन किए बिना तीर्थ यात्रा पूरी नहीं मानी जाएगी।
- दूसरी मान्यता कालसर्प दोष से जुड़ी है। कहा जाता है कि नागवासुकी के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है।
- तीसरे वरदान के संबंध में मान्यता है कि प्रयाग के नगर देवता बेनी माधव हर वर्ष नागवासुकी की पूजा करने आते हैं।
इन्हीं मान्यताओं के चलते नागपंचमी और सावन के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
मंदिर के कंकड़ों को लेकर भी है खास मान्यता
नागवासुकी मंदिर से जुड़े लोगों के बीच मंदिर परिसर के कंकड़ों को लेकर भी एक पुरानी मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि मंदिर से कंकड़ घर ले जाकर चारों ओर रखने से सर्पों का भय नहीं रहता और सर्पदोष से भी मुक्ति मिलती है। हालांकि यह भी धार्मिक आस्था और लोकमान्यता का हिस्सा है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
नागपंचमी पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
नागवासुकी मंदिर में पूरे साल श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन सावन और नागपंचमी के दौरान यहां विशेष रौनक रहती है। नागपंचमी पर हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालु नागराज वासुकी को दूध अर्पित करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि इस दिन नागवासुकी की पूजा करने से पापों का नाश होता है और सर्पदोष से मुक्ति मिलती है।
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