यश की टॉक्सिक में स्टाइल का ओवरडोज, यश के दमदार एक्शन ने जीता दर्शकों का दिल, 3 घंटे से ज्यादा की कहानी में दर्शकों को क्यों हुआ सिरदर्द

यश की टॉक्सिक बड़े बजट, जबरदस्त एक्शन और शानदार विजुअल्स के साथ सिनेमाघरों में आई है। 1940 के दशक के गोवा की गैंगस्टर दुनिया पर बनी इस फिल्म में यश का स्वैग और स्क्रीन प्रेजेंस दमदार है, लेकिन 3 घंटे 14 मिनट के लंबे रनटाइम में कहानी कई किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ जाती है। पढ़ें टॉक्सिक का पूरा मूवी रिव्यू और जानें कैसी है यश की यह बड़ी फिल्म।

Aug 26, 2026 - 13:56
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यश की टॉक्सिक में स्टाइल का ओवरडोज,  यश के दमदार एक्शन ने जीता दर्शकों का दिल, 3 घंटे से ज्यादा की कहानी में दर्शकों को क्यों हुआ सिरदर्द

यश की नई फिल्म टॉक्सिक बड़े पर्दे पर अपने विशाल स्केल, गैंगस्टर की दुनिया और जबरदस्त एक्शन के साथ आती है। फिल्म में ड्रग्स का कारोबार है, पारिवारिक धोखा है, बदला है और सत्ता के लिए खूनी जंग भी। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यश का स्टारडम और इसका विजुअल ट्रीटमेंट है। लेकिन कहानी इतनी तेजी से किरदारों और घटनाओं के बीच घूमती है कि कुछ समय बाद दर्शक के लिए कहानी को पकड़कर रखना मुश्किल होने लगता है। 3 घंटे 14 मिनट की यह फिल्म आंखों को तो लगातार व्यस्त रखती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कहानी के स्तर पर भी उतना ही असर छोड़ती है?

1940 के दशक के गोवा में ड्रग्स और गैंगवार की कहानी
फिल्म की कहानी 1940 के दशक के गोवा में शुरू होती है। यहां ड्रग्स के कारोबार पर अलग-अलग गैंग्स का कब्जा है और सत्ता हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष चल रहा है। यश राया के किरदार में नजर आते हैं, जो इस गैंगस्टर दुनिया का एक बड़ा नाम है। परिवार के भीतर हुए धोखे और पुराने विवादों के बाद कहानी आगे बढ़ती है और फिर राया के बेटे टिकट तक पहुंचती है। इसके बाद फिल्म बदला, पारिवारिक रिश्तों और गैंगवार के बीच घूमने लगती है। कहानी का आधार दिलचस्प है, लेकिन स्क्रीनप्ले में एक साथ इतने किरदार और घटनाएं शामिल कर दी गई हैं कि कई जगह यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसके साथ है और किसकी लड़ाई किससे चल रही है।

यश फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
टॉक्सिक में यश की स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को संभालने का काम करती है। राया के किरदार में उनका स्वैग, बॉडी लैंग्वेज और एक्शन स्क्रीन पर असर छोड़ता है। फिल्म के कई दृश्य सिर्फ उनकी मौजूदगी की वजह से मजबूत नजर आते हैं। टिकट के किरदार में भी यश ने अलग अंदाज दिखाने की कोशिश की है। कुछ भावनात्मक दृश्यों में उनकी एक्टिंग प्रभाव छोड़ती है। हालांकि, फिल्म की लंबाई इतनी ज्यादा है कि कई जगह सिर्फ यश का स्टारडम भी कहानी को लगातार बांधे रखने में सफल नहीं हो पाता।

बड़ी स्टारकास्ट, लेकिन किरदारों को नहीं मिली ज्यादा गहराई 
फिल्म में नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसी बड़ी अभिनेत्रियां शामिल हैं। स्टारकास्ट देखने में काफी प्रभावशाली है, लेकिन कहानी में इन किरदारों को ज्यादा विस्तार नहीं दिया गया है। ज्यादातर किरदार कहानी में आते हैं और फिर यश के किरदारों के आसपास ही घूमते नजर आते हैं। इतने बड़े नाम होने के बावजूद फिल्म खत्म होने के बाद कुछ ही किरदार याद रह जाते हैं।

स्टाइल और विजुअल्स पर ज्यादा फोकस
डायरेक्टर गीतू मोहनदास ने फिल्म को बड़े स्तर पर तैयार किया है। पुराने दौर का गोवा, शानदार सेट, कॉस्ट्यूम और रोशनी फिल्म को एक अलग लुक देते हैं। हर फ्रेम में फिल्म की भव्यता दिखाई देती है। लेकिन कहानी के मामले में फिल्म कमजोर पड़ती है। कई जगह ऐसा लगता है कि स्क्रीनप्ले को समझने से ज्यादा फिल्म को स्टाइलिश दिखाने पर ध्यान दिया गया है। एक घटना खत्म होते ही दूसरी घटना शुरू हो जाती है। किरदारों के बीच संघर्ष होता है, गोलियां चलती हैं और कहानी आगे बढ़ जाती है, लेकिन कई जगह घटनाओं के पीछे की वजह साफ नहीं हो पाती।

तेज एडिटिंग बढ़ाती है उलझन
फिल्म की एडिटिंग तेज है। खासकर एक्शन सीक्वेंस में लगातार कट्स का इस्तेमाल किया गया है। कुछ जगह यह फिल्म को तेज रफ्तार देता है, लेकिन कई दृश्यों में जरूरत से ज्यादा कट्स रोमांच के बजाय उलझन पैदा करते हैं। 3 घंटे 14 मिनट का रनटाइम भी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक बन जाता है। कहानी को अगर थोड़ा और छोटा और कसा हुआ रखा जाता तो फिल्म का असर ज्यादा हो सकता था। हालांकि फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी सबसे मजबूत कड़ी है। 1940 के दशक के गोवा को बड़े और भव्य सेट के साथ पेश किया गया है। कॉस्ट्यूम से लेकर लोकेशन और एक्शन सीक्वेंस तक फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट प्रभावित करता है। कई दृश्य ऐसे हैं, जहां साफ महसूस होता है कि फिल्म के निर्माण पर बड़े स्तर पर काम किया गया है। हालांकि, शानदार विजुअल्स एक अच्छी कहानी का विकल्प नहीं बन पाते।

म्यूजिक कई जगह जरूरत से ज्यादा भारी
फिल्म के संगीत से काफी उम्मीदें थीं। विशाल मिश्रा, रवि बसरूर और तनिष्क बागची जैसे नाम फिल्म से जुड़े हैं। लेकिन गाने ज्यादा समय तक याद नहीं रहते। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा भारी लगता है। हर बड़े दृश्य को और प्रभावशाली बनाने की कोशिश में संगीत इतना हावी हो जाता है कि कुछ दृश्यों का असर कम हो जाता है। एक्शन और तेज बैकग्राउंड म्यूजिक का लगातार इस्तेमाल कुछ समय बाद थकाने वाला महसूस हो सकता है।

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Sushant Pratap Singh Sushant Pratap Singh is an Indian content creator, video producer, and media professional known for creating political explainer videos, digital journalism content, and social media campaigns. He has worked with UP News Network and specializes in video production, content writing, and social media management. Sushant Pratap Singh began his media career as a content creator and video producer associated with UP News Network. During his professional journey, he worked on political and social explainer content, digital journalism, and social media engagement. He has experience in producing and editing news videos, writing articles for digital platforms, and managing online audience engagement through social media strategies. His work also includes anchoring, on-camera presentation, and graphic design for digital media content. Skills-: Content Writing and Article Writing | Social Media Management | Anchoring and Presentation | Video Editing using Adobe Premiere Pro | Video Production | Graphic Design using Canva | Political and Social Explainer Content