बेटे-बहू को घर से निकाल सकते हैं बुजुर्ग माता-पिता, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा, कहा- बढ़ती उम्र अपमान और असुरक्षा में जीने का नाम नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता की संपत्ति और सुरक्षा को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर बेटे-बहू को घर से बेदखल किया जा सकता है। जानिए लखनऊ के मामले में क्या हुआ, हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा और 2007 का कानून बुजुर्गों को क्या अधिकार देता है।
क्या बुजुर्ग माता-पिता अपने ही घर में बेटे और बहू के रहते असुरक्षित महसूस करें तो उन्हें घर खाली कराने का अधिकार है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर बेटे या बहू का घर में रहना बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण, सम्मान या सुरक्षा में बाधा बन रहा है, तो उन्हें घर से बेदखल करने का आदेश दिया जा सकता है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा के साथ रहना नहीं है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मान और सुरक्षा का व्यवहार करता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लखनऊ के विकास नगर से जुड़े मामले में आया है। कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता के घर से बेटे और बहू को बेदखल करने के SDM और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश रद्द कर दिए गए थे।
लखनऊ के घर से शुरू हुआ विवाद, वृद्धाश्रम पहुंचीं 81 साल की मां
मामला लखनऊ के विकास नगर स्थित एक मकान से जुड़ा है। रवि कांत गुप्ता की 81 साल की मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा था। आरोप था कि गुप्ता के पोते के व्यवहार के कारण वह घर में सुरक्षित तरीके से नहीं रह पा रही थीं। मामला प्रशासन तक पहुंचा तो SDM ने 15 नवंबर 2022 को बेटे को मकान से निकालने का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को SDM के आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया। यहीं से मामला कानूनी लड़ाई में बदल गया। बेटे और बहू ने प्रशासन के दोनों आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा था- ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का अधिकार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बने ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं है। इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों माना बेदखली का अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2007 के कानून का उद्देश्य सिर्फ बुजुर्गों को आर्थिक सहायता दिलाना नहीं है। इसमें उनके भरण-पोषण के साथ उनकी सुरक्षा और सम्मान भी शामिल हैं। कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी बुजुर्ग की संपत्ति में रहने वाले बेटे या बहू की वजह से उनका जीवन असुरक्षित हो रहा है या उनके भरण-पोषण और सुरक्षा में बाधा पैदा हो रही है, तो ऐसी स्थिति में ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश जारी कर सकता है। यानी कानून का इस्तेमाल केवल कागजी भरण-पोषण तक सीमित नहीं किया जा सकता। जरूरत पड़ने पर बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संपत्ति खाली कराने का आदेश भी दिया जा सकता है।
ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां
सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के कानून की धाराओं का भी विस्तार से उल्लेख किया। कोर्ट ने बताया कि धारा 7 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जबकि धारा 8 के तहत उन्हें कुछ मामलों में सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। वहीं धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के उद्देश्य को प्रभावी तरीके से पूरा करने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरी और सहायक आदेश जारी कर सकता है। इसका मतलब यह है कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए सिर्फ भरण-पोषण का आदेश ही एकमात्र उपाय नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार ट्रिब्यूनल दूसरे जरूरी कदम भी उठा सकता है।
2021 के फैसले से भी स्पष्ट हुई कानूनी स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर के 2021 के फैसले का भी हवाला दिया। उस मामले में कोर्ट ने माना था कि वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यही कानूनी स्थिति बाद के समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर मामलों में भी दोहराई गई थी। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों के आधार पर यह स्पष्ट कर दिया कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बेदखली का आदेश परिस्थितियों के अनुसार दिया जा सकता है।
क्या है 2007 का कानून?
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 का उद्देश्य 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण और सुरक्षा उपलब्ध कराना है। कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर होने की स्थिति में उपेक्षा, असुरक्षा या दुर्व्यवहार का सामना न करना पड़े। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक बात साफ हो गई है कि बुजुर्ग माता-पिता की संपत्ति में बच्चों का रहना केवल पारिवारिक रिश्ता होने से सुरक्षित अधिकार नहीं बन जाता। अगर उनका रहना ही माता-पिता के सम्मान, भरण-पोषण या सुरक्षा के लिए परेशानी बन जाए, तो कानून के तहत उन्हें घर खाली करने का आदेश दिया जा सकता है। लखनऊ के इस मामले में 81 साल की बुजुर्ग महिला का घर छोड़कर वृद्धाश्रम पहुंचना इसी विवाद का अहम हिस्सा था। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ऐसे मामलों में बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर कानूनी स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है।
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