अंतरधार्मिक शादी के बाद जान का खतरा, पुलिस पर मदद न करने का आरोप, अब जीवन और आजादी से जुड़े मामलों में SOP तैयार करेगा सुप्रीम कोर्ट
अगर किसी की जान और आजादी खतरे में हो, पुलिस भी मदद न करे और अदालत तक पहुंचना मुश्किल हो जाए तो क्या होगा? अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले ने सुप्रीम कोर्ट को बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। अब अदालत जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कोर्ट टाइम के बाद भी तत्काल सुनवाई के लिए SOP तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। जानिए पूरा मामला और इसके पीछे की वजह।
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत तक तत्काल पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम बढ़ाया है। शीर्ष अदालत ने संकेत दिए हैं कि ऐसे मामलों के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किया जाएगा, ताकि यदि किसी व्यक्ति की जान या आजादी पर तत्काल खतरा हो तो अदालत के नियमित समय के बाद भी उसकी याचिका पर शीघ्र सुनवाई संभव हो सके। इस पहल की पृष्ठभूमि में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें अंतरधार्मिक विवाह करने वाले एक दंपति ने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस से मदद मांगी थी। आरोप है कि सुरक्षा देने के बजाय पुलिस युवती को उसके परिजनों के हवाले कर गई। इसके बाद युवक ने अपने वकील के माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन तत्काल सुनवाई नहीं हो सकी। इस घटना का उल्लेख बाद में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान किया गया।
PIL में उठाया गया तत्काल सुनवाई का मुद्दा
अधिवक्ता मेहराविश रेन की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया कि जब किसी व्यक्ति की जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा हो, तब संवैधानिक अदालतों तक तत्काल पहुंचने का कोई स्पष्ट और प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया कि कई मामलों में स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब पुलिस पर भी पीड़ित की मदद न करने या उत्पीड़न करने वालों का साथ देने के आरोप लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने माना- व्यवस्था है, लेकिन प्रक्रिया और प्रभावी बनाने की जरूरत
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट में जीवन और आजादी से जुड़े मामलों की तत्काल सुनवाई के लिए व्यवस्था पहले से मौजूद है। हालांकि, समस्या उस स्तर पर आती है जहां याचिका दाखिल की जाती है और उसे तत्काल सूचीबद्ध कराने की प्रक्रिया में कठिनाई होती है।
'अदालतों को अस्पतालों की तरह 24x7 तैयार रहना चाहिए'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आम नागरिक की तत्काल परेशानियों के समाधान के लिए अदालतों को भी अस्पतालों की तरह 24 घंटे और सातों दिन काम करने की सोच विकसित करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कई बार रजिस्ट्री को याचिकाओं की प्रारंभिक जांच करनी पड़ती है, क्योंकि कई अर्जियां आवश्यक तथ्यों और स्पष्ट विवरण के बिना दाखिल की जाती हैं।
सिर्फ जीवन और आजादी से जुड़े मामलों तक सीमित रहेगा SOP
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि प्रस्तावित SOP केवल उन्हीं मामलों पर लागू होनी चाहिए, जिनमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन का वास्तविक खतरा हो। उन्होंने कहा कि यदि दायरा बढ़ाया गया तो अन्य प्रकार के मुकदमे भी स्वयं को 'अत्यावश्यक' बताकर तत्काल सुनवाई की मांग करने लगेंगे। पीठ ने इस सुझाव से सहमति जताई और कहा कि तत्काल सुनवाई की व्यवस्था केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों तक सीमित रखने पर विचार किया जाएगा।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्रियों से मांगे जाएंगे सुझाव
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि SOP तैयार करने से पहले सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट की रजिस्ट्रियों से सुझाव लिए जाएंगे। यदि अदालत के समय के बाद भी आपातकालीन मामलों की सुनवाई की व्यवस्था हाई कोर्ट में लागू की जाती है, तो उसी तरह की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट में भी लागू की जानी चाहिए।
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