रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत को पड़ सकता है भारी, अमेरिका के नए टैरिफ बिल में भारत निशाने पर, जानिए क्या 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे ट्रम्प...
रूस से रिकॉर्ड तेल खरीदने के बाद भारत अब अमेरिकी सीनेट के नए टैरिफ बिल के निशाने पर है। अगर यह कानून बनता है तो भारतीय निर्यात पर 100% तक टैरिफ लग सकता है। आखिर अमेरिका ऐसा क्यों करना चाहता है, किन देशों को राहत मिलेगी और भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका अब सिर्फ रूस पर ही नहीं, बल्कि रूस के सबसे बड़े ऊर्जा ग्राहकों पर भी आर्थिक दबाव बनाने की तैयारी में है। इसी रणनीति के तहत अमेरिकी सीनेट में एक नया बिल पेश किया गया है, जिसमें भारत, चीन समेत पांच देशों से आयात होने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। अगर यह बिल कानून का रूप ले लेता है, तो यह पहली बार होगा जब अमेरिका किसी देश पर केवल इस आधार पर भारी टैरिफ लगाएगा कि वह रूस से तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। अमेरिका का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को कम करना और यूक्रेन युद्ध के लिए उसकी आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया जा रहा है।
भारत क्यों आया अमेरिकी निशाने पर?
दरअसल, भारत पिछले कई महीनों से रूस से बड़ी मात्रा में रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहा है। जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार भारत ने रूस से प्रतिदिन करीब 26.1 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4 प्रतिशत है। यानी जून महीने में भारत द्वारा आयात किए गए हर दो बैरल तेल में एक से अधिक बैरल रूस से आया। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में लगभग 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी वजह से भारत अमेरिका की नई रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रहा है।
बिल में किन देशों को बनाया गया है निशाना?
सीनेट में पेश प्रस्तावित बिल के अनुसार भारत और चीन के अलावा हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान भी उन देशों की सूची में शामिल हैं, जिन पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि बिल के शुरुआती मसौदे में 500 प्रतिशत टैरिफ का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने प्रस्तावित बिल में 15 यूरोपीय देशों को इस टैरिफ से राहत देने का प्रावधान रखा है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि ये देश रूस से 15 प्रतिशत से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने स्पष्ट कहा कि इस बिल का उद्देश्य यूरोपीय सहयोगियों को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि उन देशों पर दबाव बनाना है जो अभी भी रूस के ऊर्जा कारोबार को सबसे बड़ा आर्थिक सहारा दे रहे हैं।
सिर्फ टैरिफ नहीं, रूस की पूरी आर्थिक व्यवस्था पर निशाना
प्रस्तावित बिल केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है। इसमें रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, प्रमुख कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर नए प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान रखा गया है। अमेरिका का मानना है कि रूस की सबसे बड़ी ताकत उसका ऊर्जा निर्यात है और उसी से मिलने वाली आय यूक्रेन युद्ध को लंबे समय तक जारी रखने में मदद कर रही है।
दोनों दलों का समर्थन, इसलिए बढ़ गई अहमियत
अमेरिकी राजनीति में यह बिल इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट—दोनों दलों का समर्थन मिला है। ऐसे प्रस्तावों को अमेरिका में बाइपार्टिसन बिल कहा जाता है। आमतौर पर कई बड़े विधेयक राजनीतिक मतभेदों में फंस जाते हैं, लेकिन दोनों प्रमुख दलों के समर्थन से इस बिल के आगे बढ़ने की संभावना अधिक मानी जा रही है। हालांकि फिलहाल इसे कानून बनने के लिए सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों से पारित होना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही यह लागू हो सकेगा।
किसने पेश किया था यह बिल?
इस बिल को पहली बार अप्रैल 2025 में रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने पेश किया था। अब तक 26 सीनेटर इस प्रस्ताव का समर्थन कर चुके हैं। 11 जुलाई को लिंडसे ग्राहम का निधन हो गया। निधन से एक दिन पहले यूक्रेन दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस बिल को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। व्हाइट हाउस में ट्रम्प ने भी कहा था कि यह ग्राहम के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक था और इसके कानून बनने की अच्छी संभावना है। बाद में कैपिटल हिल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों दलों के सीनेटरों ने इस बिल को ग्राहम के प्रति श्रद्धांजलि भी बताया।
आखिर अमेरिका इतना सख्त क्यों हो रहा है?
- अमेरिका की रणनीति चार बड़े उद्देश्यों पर आधारित मानी जा रही है-
- रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई कम करना।
- यूक्रेन युद्ध के लिए रूस की आर्थिक क्षमता कमजोर करना।
- भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों पर दबाव बनाकर रूसी तेल की मांग घटाना।
- आर्थिक दबाव के जरिए रूस को यूक्रेन के साथ शांति वार्ता की दिशा में लाना।
भारत के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है?
यदि यह बिल मौजूदा स्वरूप में कानून बनता है और भविष्य में भारत पर लागू किया जाता है, तो अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। इससे दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों और भारतीय निर्यातकों पर असर पड़ने की संभावना बन सकती है। हालांकि फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। इसे लागू होने से पहले अमेरिकी सीनेट, प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
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