क्या अगली पीढ़ी सिर्फ किताबों में देखेगी नाचता मोर? राष्ट्रीय पक्षी पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, पंखों के लालच में हो रहा अवैध शिकार

सावन में नाचता मोर हमारी संस्कृति और प्रकृति की पहचान है, लेकिन क्या आने वाले समय में यह सिर्फ तस्वीरों तक सिमट जाएगा? मेनका गांधी ने मोर पंखों के अवैध व्यापार और बढ़ते शिकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जानिए कैसे कानून की एक छूट का फायदा उठाकर शिकारी राष्ट्रीय पक्षी को निशाना बना रहे हैं।

Jul 3, 2026 - 15:06
Jul 3, 2026 - 15:06
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क्या अगली पीढ़ी सिर्फ किताबों में देखेगी नाचता मोर? राष्ट्रीय पक्षी पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, पंखों के लालच में हो रहा अवैध शिकार

सावन का मौसम आते ही खेतों, जंगलों और गांवों में पंख फैलाकर नाचते मोर का दृश्य हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आता है। यही मोर भारत की संस्कृति, लोकगीतों और धार्मिक आस्था का भी अहम हिस्सा है। लेकिन अब इसी राष्ट्रीय पक्षी को लेकर एक ऐसी चिंता सामने आई है, जिसने पर्यावरण प्रेमियों से लेकर आम लोगों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह है कि क्या मुनाफे की अंधी दौड़ में हम अपनी राष्ट्रीय धरोहर को खोते जा रहे हैं? पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकारों की मुखर आवाज़ मेनका गांधी ने मोर पंखों के बढ़ते अवैध कारोबार को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बाजार में बढ़ती मांग ने अवैध शिकारियों को इतना सक्रिय कर दिया है कि अब मोरों को केवल उनके खूबसूरत पंखों के लिए मारा जा रहा है। अगर समय रहते इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां शायद सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही नाचता मोर देख पाएंगी।

पंखों का कारोबार बना मौत की वजह
मेनका गांधी का दावा है कि बाजार में बिकने वाले अधिकांश मोर पंख प्राकृतिक रूप से गिरे हुए नहीं होते, बल्कि उन्हें पाने के लिए मोरों की हत्या की जाती है। उनका कहना है कि वर्षों पहले दिगंबर जैन साधुओं की धार्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक रूप से गिरे हुए मोर पंखों के सीमित व्यापार की अनुमति दी गई थी। लेकिन समय के साथ इसी छूट का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग शुरू हो गया। आज स्थिति यह है कि कई शिकारी मोरों को मारकर उनके पंख निकालते हैं और फिर दावा करते हैं कि ये पंख स्वाभाविक रूप से झड़े हुए हैं। जांच करना कठिन होने के कारण यह अवैध कारोबार लगातार फैलता जा रहा है।

शिकारियों के तरीके सुनकर सिहर जाएंगे
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के मुताबिक, शिकारी अब पहले से कहीं अधिक संगठित और शातिर हो चुके हैं। कई मामलों में वे जंगलों और खेतों के आसपास मौजूद पानी के स्रोतों में जहरीले कीटनाशक मिला देते हैं। जैसे ही मोर वह पानी पीते हैं, उनकी मौत हो जाती है। इसके बाद उनके चमचमाते पंख निकालकर अवैध बाजार में ऊंची कीमत पर बेच दिए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका न सिर्फ मोरों के लिए बल्कि पूरे वन्यजीव तंत्र के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

लूपहोल का फायदा उठा रहे तस्कर
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मोर को अनुसूची-1 (Schedule I) में शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि बाघ, हाथी और गैंडे की तरह ही मोर को भी सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। मोर का शिकार करना, उसे नुकसान पहुंचाना या मारना पूरी तरह प्रतिबंधित है और ऐसा करने वालों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। हालांकि कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है। प्राकृतिक रूप से झड़े हुए मोर पंखों के घरेलू उपयोग और व्यापार की अनुमति दी गई है। यही छूट अब अवैध कारोबारियों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गई है। वे मारे गए मोरों के पंखों को भी प्राकृतिक रूप से गिरे हुए बताकर बाजार में बेच देते हैं।

क्यों इतनी ज्यादा है मोर पंखों की मांग?
मोर पंख केवल सजावट की वस्तु नहीं हैं। इनका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट, मंदिरों की सजावट, पूजा सामग्री, पारंपरिक पंखे, हस्तशिल्प और कई सजावटी उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसी वजह से इनकी बाजार में लगातार मांग बनी रहती है। वन्यजीव कार्यकर्ताओं का दावा है कि भारत से मोर पंखों की अवैध तस्करी म्यांमार समेत कई पड़ोसी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चुकी है। इससे इस अवैध कारोबार का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

क्या सचमुच मोर अपने पंख खुद गिराता है?
बहुत से लोग यह नहीं जानते कि प्रजनन काल समाप्त होने के बाद नर मोर स्वाभाविक रूप से अपने लंबे और रंग-बिरंगे पंख गिरा देता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया मानसून के बाद शुरू होती है। एक परिपक्व मोर कुछ दिनों के भीतर अधिकांश पंख छोड़ देता है, जबकि कुछ मोरों में यह प्रक्रिया सितंबर तक चल सकती है। यही प्राकृतिक प्रक्रिया अवैध कारोबारियों के लिए सबसे बड़ी ढाल बन गई है, क्योंकि वे इसी बहाने अवैध रूप से हासिल किए गए पंखों को भी वैध बताने की कोशिश करते हैं।

क्या घट रही है मोरों की संख्या?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि निवास स्थान लगातार कम होने, कृषि क्षेत्रों के विस्तार, रासायनिक प्रदूषण और अवैध शिकार जैसी वजहों से कई इलाकों में मोरों की संख्या पहले के मुकाबले कम होती दिखाई दे रही है। हालांकि पूरे देश के लिए ताजा आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि मौजूदा हालात जारी रहे तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

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Sushant Pratap Singh Sushant Pratap Singh is an Indian content creator, video producer, and media professional known for creating political explainer videos, digital journalism content, and social media campaigns. He has worked with UP News Network and specializes in video production, content writing, and social media management. Sushant Pratap Singh began his media career as a content creator and video producer associated with UP News Network. During his professional journey, he worked on political and social explainer content, digital journalism, and social media engagement. He has experience in producing and editing news videos, writing articles for digital platforms, and managing online audience engagement through social media strategies. His work also includes anchoring, on-camera presentation, and graphic design for digital media content. Skills-: Content Writing and Article Writing | Social Media Management | Anchoring and Presentation | Video Editing using Adobe Premiere Pro | Video Production | Graphic Design using Canva | Political and Social Explainer Content