काशी-मथुरा-संभल पर नहीं बनी बात! दोनों पक्षों ने ठुकराई सुप्रीम कोर्ट की पहल, अब अदालत में ही होगा मंदिर-मस्जिद विवादों का फैसला
ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल जामा मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुलह का रास्ता सुझाया था, लेकिन दोनों पक्ष पीछे हट गए। आखिर क्यों नहीं बनी मध्यस्थता पर सहमति? अब इन तीनों बड़े विवादों में आगे की कानूनी लड़ाई कैसी होगी और किसके सामने होगी अगली चुनौती?
देश के सबसे चर्चित मंदिर-मस्जिद विवादों में शामिल वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद मामले में फिलहाल बातचीत का रास्ता बंद हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से शांतिपूर्ण समाधान के लिए मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। दोनों पक्षों का कहना है कि वे अब अदालत में ही अपनी दलीलें और सबूत पेश करेंगे और न्यायिक प्रक्रिया के जरिए फैसला चाहते हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट परिसर में 21 से 23 अगस्त तक ‘समाधान समारोह 2026’ के तहत विशेष लोक अदालत आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य लंबित मामलों को बातचीत के जरिए सुलझाना है। इसी पहल के तहत इन तीनों धार्मिक विवादों में शामिल पक्षों से भी मध्यस्थता के लिए सहमति मांगी गई थी। हालांकि, दोनों पक्षों की ओर से सहमति नहीं मिलने के बाद अब इन मामलों में सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ेगी।
ज्ञानवापी विवाद
वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद लंबे समय से चल रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगजेब ने यहां मौजूद प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को आंशिक रूप से ध्वस्त कर मस्जिद का निर्माण कराया था। हिंदू पक्ष की ओर से मांग की गई है कि ज्ञानवापी परिसर को प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर घोषित किया जाए और परिसर में नियमित पूजा की अनुमति दी जाए। साथ ही सर्वे के दौरान मिले धार्मिक अवशेषों को मंदिर से जुड़ा हिस्सा माना जाए।
वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी एक मस्जिद है और इसे मस्जिद के रूप में ही बरकरार रखा जाना चाहिए। मुस्लिम पक्ष पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए नए दावों को खारिज करने की मांग करता रहा है। फिलहाल ज्ञानवापी मामले में वाराणसी जिला अदालत, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग पहलुओं पर सुनवाई जारी है। इनमें ASI सर्वे, पूजा के अधिकार और वजूखाना क्षेत्र से जुड़े मामले शामिल हैं।
मथुरा विवाद
मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद भी लंबे समय से अदालतों में है। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद उस स्थान पर बनी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान मंदिर मौजूद था और उसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई। हिंदू पक्ष शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने और पूरी भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को सौंपने की मांग कर रहा है। इसके साथ ही वहां मंदिर निर्माण की मांग भी की गई है।
दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि शाही ईदगाह एक वैध धार्मिक स्थल है और 1968 के समझौते तथा पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में जमीन के स्वामित्व, सर्वे और पुराने समझौते की वैधता को लेकर कई याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
संभल जामा मस्जिद विवाद
उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर भी विवाद अदालत तक पहुंच चुका है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद प्राचीन हरिहर मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हिंदू पक्ष मस्जिद का पुरातात्विक सर्वे कराने और अगर मंदिर के अवशेष मिलते हैं तो वहां पूजा का अधिकार देने की मांग कर रहा है।
वहीं मुस्लिम पक्ष शाही जामा मस्जिद को ऐतिहासिक और वैध मस्जिद बताता है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि नए मुकदमों और सर्वे की प्रक्रिया पर रोक लगनी चाहिए और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 लागू किया जाना चाहिए। इस मामले में चंदौसी सिविल कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग कानूनी पहलुओं पर सुनवाई जारी है।
मध्यस्थता से इनकार के बाद अब क्या होगा?
तीनों मामलों में अब बातचीत के जरिए समाधान की संभावना फिलहाल खत्म हो गई है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे, दस्तावेज और सबूत अदालत के सामने रखेंगे। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मामलों में फैसला कई स्तरों की सुनवाई के बाद आता है। निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लंबी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय सामने आएगा।
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