कांवड़ ड्यूटी का हवाला देकर नहीं बची पुलिस, 10 दिन तक अटकी रही जमानत, हाईकोर्ट ने यूपी सरकार पर लगाया ₹50 हजार का जुर्माना
क्या कांवड़ ड्यूटी किसी आरोपी की जमानत में 10 दिन की देरी की वजह बन सकती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी सवाल पर यूपी सरकार पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने SHO, दरोगा और CO से जवाब मांगा, उनके तर्क सुने और फिर जो टिप्पणी की, उसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जानिए पूरा मामला और कोर्ट ने क्या-क्या कहा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका की सुनवाई में हुई देरी को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मामले में लापरवाही मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस समय पर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा देती, तो मामले का निस्तारण 3 जुलाई को ही हो सकता था, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण जमानत याचिका 10 दिनों से अधिक समय तक लंबित रही।
दहेज मृत्यु केस से जुड़ा है पूरा मामला
यह मामला बिजनौर जिले के चांदपुर थाना क्षेत्र में दर्ज दहेज मृत्यु के एक मुकदमे से जुड़ा है। मामले में मृतका के सास-ससुर को आरोपी बनाया गया था। दोनों ने जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिस पर न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह स्पष्ट रूप से साबित हो सके कि महिला को दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। गवाहों के बयान भी सामान्य पारिवारिक विवाद की ओर संकेत करते हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने दोनों आरोपियों को जमानत प्रदान कर दी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी अधूरे दस्तावेज भेजे गए
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 17 जून को संयुक्त निदेशक (अभियोजन) कार्यालय ने जमानत याचिका की प्रति पुलिस पैरोकार को उपलब्ध करा दी थी। इसके बाद 19 जून को पुलिस अधीक्षक को सूचना भेजी गई और 29 जून को रिमाइंडर भी जारी किया गया। इसके बावजूद पुलिस की ओर से अदालत को आवश्यक निर्देश और केस डायरी उपलब्ध नहीं कराई गई। अदालत ने कहा कि 3 जुलाई को सीसीटीएनएस पोर्टल से केस डायरी का पीडीएफ उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद पुलिस ने केवल आरोपियों का आपराधिक इतिहास भेजा, जबकि सुनवाई के लिए जरूरी केस डायरी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसी कारण जमानत याचिका पर फैसला टलता रहा।
SHO ने कांवड़ ड्यूटी का दिया हवाला
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी, उपनिरीक्षक और सर्किल अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया। जब देरी का कारण पूछा गया तो थाना प्रभारी ने अवकाश और कांवड़ यात्रा की ड्यूटी में व्यस्त रहने का हवाला दिया। वहीं उपनिरीक्षक ने इसे 'कम्युनिकेशन गैप' बताया, जबकि सर्किल अधिकारी ने कहा कि उनके साथ तैनात हेड कांस्टेबल ने हाईकोर्ट से प्राप्त संदेशों की जानकारी उन्हें नहीं दी। अधिकारियों के अलग-अलग जवाबों पर अदालत ने असंतोष जताते हुए कहा कि सभी अधिकारी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रहे हैं। कोर्ट ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना और टिप्पणी की कि यदि पुलिस समय पर अपना दायित्व निभाती तो जमानत याचिका का फैसला 3 जुलाई को ही हो सकता था।
यूपी सरकार पर ₹50 हजार का जुर्माना
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ताओं को भुगतान की जाए। साथ ही बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने तथा जरूरत पड़ने पर जुर्माने की राशि उनसे वसूलने के निर्देश भी दिए गए हैं। अदालत ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को भी भेजने का आदेश दिया है, ताकि मामले में आवश्यक विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
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