ASP अनुज चौधरी के ममेरे भाई को हुई फांसी की सजा, 16 साल पुराने चुनावी हत्याकांड में आया बड़ा फैसला, कोर्ट बोला- लोकतंत्र पर हमला बर्दाश्त नहीं
ASP अनुज चौधरी के ममेरे भाई को कोर्ट ने सुनाई फांसी की सजा। 16 साल पुराने इस चर्चित हत्याकांड में चुनावी रंजिश, दिनदहाड़े हत्या, गायब हुए सबूत और कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया। जानिए आखिर क्या है पूरा मामला और कैसे पहुंचा यह केस फांसी की सजा तक।
उत्तर प्रदेश के चर्चित पुलिस अधिकारी एडिशनल एसपी अनुज चौधरी एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी कोई कार्रवाई नहीं, बल्कि उनके परिवार से जुड़ा एक मामला है। मुजफ्फरनगर की अदालत ने सोमवार को उनके ममेरे भाई और पूर्व प्रधान प्रमोद चौधरी को 16 साल पुराने बहुचर्चित हत्याकांड में फांसी की सजा सुनाई है। प्रमोद के साथ सहदेव उर्फ पप्पू को भी मृत्युदंड दिया गया है। अदालत ने दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ग्राम पंचायत लोकतंत्र की पहली सीढ़ी होती है। चुनावी रंजिश में किसी की हत्या करना केवल एक व्यक्ति की जान लेना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन पर सीधा हमला है। इसी आधार पर कोर्ट ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी में रखते हुए फांसी की सजा सुनाई।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 24 अगस्त 2010 का है। तितावी थाना क्षेत्र के माड़ी गांव निवासी 60 वर्षीय राजवीर सिंह आगामी प्रधानी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। आरोप है कि तत्कालीन प्रधान प्रमोद चौधरी इसे अपनी राजनीतिक चुनौती मान रहा था और इसी रंजिश ने हत्या की साजिश को जन्म दिया। घटना वाले दिन सुबह करीब 7:15 बजे राजवीर सिंह खेत की ओर जा रहे थे। रास्ते में पहले से घात लगाए बैठे प्रमोद चौधरी, सहदेव उर्फ पप्पू और दो शूटरों ने उन्हें घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आरोपियों ने पहले धमकी भरे शब्द कहे कि बहुत बड़ा आदमी बनता है, आ तुझे गांव का अगला प्रधान बना देते हैं। इसके बाद राजवीर सिंह पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी गईं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
दो ग्रामीण बने सबसे बड़े गवाह
वारदात को गांव के दो ग्रामीण सुकेन्द्र और सत्यवीर ने अपनी आंखों से देखा। हमलावरों ने उन पर भी फायरिंग की, जिसके बाद दोनों जान बचाने के लिए गन्ने के खेत में छिप गए। बाद में इन्हीं दोनों की गवाही ने पूरे केस की दिशा बदल दी। शुरुआत में मृतक के बेटे ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के सामने आने के बाद आरोपियों के नाम सामने आए।
दो शूटर एनकाउंटर में मारे गए
जांच में सामने आया कि वारदात में शामिल दो शूटर अमित और विपिन शर्मा पेशेवर अपराधी थे। जनवरी 2011 में शाहपुर थाना क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ के दौरान दोनों मारे गए, जिसके बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई समाप्त हो गई।
पोस्टमार्टम और गवाहों ने मजबूत किया केस
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राजवीर सिंह के शरीर पर सात गोली लगने की पुष्टि हुई। चेहरे, गर्दन और सीने पर बेहद करीब से फायरिंग के निशान मिले। अदालत ने माना कि मेडिकल साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पूरी तरह एक-दूसरे की पुष्टि करती है। इसी आधार पर प्रमोद चौधरी और सहदेव को दोषी करार दिया गया। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि घटनास्थल से बरामद 32 बोर के चार खोखा कारतूस तितावी थाने के मालखाने से गायब हो गए। अभियोजन ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने पुलिस से मिलीभगत कर सबूत गायब कराए। विवेचक ने भी अदालत में स्वीकार किया कि कारतूस मालखाने से लापता हैं। इस पर अदालत ने मुजफ्फरनगर के एसएसपी को निर्देश दिया कि जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की पहचान कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए।
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