CBSE की 3 लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, 6वीं के बच्चों को 2027 तक राहत मिलेगी?
CBSE की तीन भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा कि जब कक्षा 7 से 10 के छात्रों को छूट दी गई है, तो कक्षा 6 के बच्चों को राहत क्यों नहीं मिल सकती। जानिए क्या है CBSE की 3 लैंग्वेज पॉलिसी, विवाद की वजह और 2027 से जुड़े कोर्ट के सुझाव।
कक्षा 6 के बच्चों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य करने की CBSE की नीति पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। मामले में कोर्ट ने CBSE से इस बात पर विचार करने को कहा कि क्या कक्षा 6 के छात्रों के लिए थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को 2027 तक अनिवार्य करने से राहत दी जा सकती है। कोर्ट ने खास तौर पर यह सवाल उठाया कि जब कक्षा 7 से 10 तक के छात्रों को इस नीति से छूट दी जा चुकी है, तो कक्षा 6 के बच्चों को राहत क्यों नहीं दी जा सकती। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मुद्दे पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। कोर्ट के सुझाव के बाद CBSE ने इस पर विचार करने की बात कही है और मामले में नया नोट पेश करने को कहा गया है।
आखिर क्या है CBSE की तीन भाषा नीति?
यह पूरा विवाद नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के तहत लागू की जा रही भाषा नीति से जुड़ा है। CBSE ने कक्षा 6 से 9 तक के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ने की व्यवस्था की है। इसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होना जरूरी है। नीति के मुताबिक छात्रों को एक अतिरिक्त भाषा सीखनी होगी। विदेशी भाषा का विकल्प भी कुछ परिस्थितियों में उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए छात्रों को पहले दो भारतीय भाषाएं पढ़नी होंगी। सरकार और CBSE का उद्देश्य छात्रों को एक से अधिक भारतीय भाषाओं से जोड़ना और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना है। हालांकि, इसे लागू करने को लेकर स्कूलों और अभिभावकों की तरफ से कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आई हैं।
स्कूलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
तीसरी भाषा लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों और पढ़ाई की सामग्री उपलब्ध कराने को लेकर बताई जा रही है। कई स्कूलों में पहले से मौजूद व्यवस्था के बीच अतिरिक्त भाषा के लिए नए शिक्षक और संसाधन जुटाना आसान नहीं है। इसके अलावा छात्रों और अभिभावकों की चिंता यह भी है कि अगर अतिरिक्त भाषा की पढ़ाई बिना पर्याप्त तैयारी या बीच शैक्षणिक सत्र में शुरू होती है, तो बच्चों पर पढ़ाई का अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि कक्षा 6 से तीन भाषाओं की अनिवार्यता को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है।
7वीं से 10वीं के छात्रों को पहले ही मिल चुकी है छूट
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि तीन भाषा नीति से जुड़ी समस्याओं और इसके क्रियान्वयन पर विचार करने के लिए एक विशेष कमेटी बनाई गई है। सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि कक्षा 7 से 10 तक के छात्रों को फिलहाल इस नीति से छूट दी जा चुकी है। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था में मुख्य रूप से कक्षा 6 के छात्रों पर ही तीन भाषा पढ़ने की अनिवार्यता लागू होने का सवाल सामने आया। यहीं से सुप्रीम कोर्ट ने CBSE से कक्षा 6 के छात्रों को भी राहत देने की संभावना पर विचार करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- 7वीं से 10वीं को राहत तो 6वीं को क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सरकार से सीधा सवाल किया कि जब कक्षा 7 से 10 तक के छात्रों को छूट दी जा चुकी है, तो कक्षा 6 के बच्चों को भी राहत देने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह एक राष्ट्रीय नीति है, इसलिए इसके लिए एक संस्थागत ढांचा मौजूद है। ऐसे में नीति लागू करने की प्रक्रिया में अलग-अलग कक्षाओं के छात्रों के लिए राहत के प्रावधान पर भी विचार किया जा सकता है। सरकार की ओर से दलील दी गई कि कक्षा 6 के छात्र चार साल बाद बोर्ड परीक्षा में शामिल होंगे। इसलिए उन्हें अभी से तीन भाषाओं की पढ़ाई के लिए तैयार करना जरूरी है।
2027 से लागू करने पर विचार करेगा CBSE
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE से कहा कि वह 2027 से शुरू होने वाले अगले शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं की नीति लागू करने के विकल्प पर विचार करे। इस व्यवस्था में तीन भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होंगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि जो छात्र फिलहाल कक्षा 6 में हैं और इसी साल से तीन भाषाएं पढ़ना चाहते हैं, उन्हें इसकी अनुमति दी जा सकती है। CBSE की ओर से ASG ने कोर्ट को बताया कि बोर्ड इस सुझाव पर विचार करेगा और इस संबंध में नया नोट पेश करेगा।
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