UP में विधानसभा चुनाव से पहले UCC लागू नहीं होगा? BJP के लिए क्यों बढ़ा जोखिम, 2029 तक टल सकता है बड़ा फैसला
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने को लेकर अटकलें तेज हैं, लेकिन सूत्रों के मुताबिक चुनाव से पहले इसे लागू करने की तैयारी फिलहाल नजर नहीं आ रही है। कानूनी प्रक्रिया, सीमित समय, संभावित राजनीतिक प्रतिक्रिया, दूसरे राज्यों के अनुभव और 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति को लेकर भाजपा के भीतर मंथन की बात सामने आ रही है। सरकार के विभागों में अभी UCC की ड्राफ्टिंग शुरू नहीं होने का भी दावा है। वहीं चुनाव से पहले ड्राफ्टिंग कमेटी के गठन की संभावना पर भी चर्चा है।
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू किए जाने को लेकर चल रही अटकलों के बीच अब तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। सूत्रों के हवाले से सामने आ रही जानकारी के मुताबिक, चुनाव से कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में UCC लागू करने का फैसला फिलहाल आसान नहीं दिख रहा है। इसके पीछे सिर्फ कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि चुनावी समय, सामाजिक प्रतिक्रिया और राजनीतिक असर जैसे कई पहलुओं पर मंथन की बात कही जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि चुनाव से ठीक पहले UCC लागू करने से मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर और मजबूती से ध्रुवीकृत हो सकता है। हालांकि, यह एक राजनीतिक आकलन है और मतदाताओं के वास्तविक व्यवहार का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसी वजह से चर्चा यह है कि उत्तर प्रदेश में UCC को चुनाव से पहले लागू करने के बजाय इसे भविष्य के लिए बड़े राजनीतिक और नीतिगत मुद्दे के तौर पर रखा जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का जोर सरकार के कामकाज, कानून-व्यवस्था, विकास, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर रहने की संभावना बताई जा रही है।
चुनाव से पहले UCC लागू करना क्यों मुश्किल?
UCC किसी सामान्य सरकारी आदेश की तरह लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए कानूनी और विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। सूत्रों के मुताबिक, पहले ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कमेटी का गठन, इसके बाद सुझाव और आपत्तियां लेना, रिपोर्ट तैयार करना और फिर विधेयक की प्रक्रिया आगे बढ़ाना जरूरी होगा। यूपी में विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है। ऐसे में चुनाव से पहले बचा सीमित समय इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है। यही वजह है कि सरकार के स्तर पर अभी तक कोई ठोस तैयारी शुरू नहीं होने की बात सामने आ रही है। हालांकि, चुनाव की तारीख और विधायी प्रक्रिया की वास्तविक समयसीमा अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। इसलिए यह कहना कि चुनाव से पहले UCC किसी भी स्थिति में लागू नहीं हो सकता, एक निश्चित निष्कर्ष नहीं होगा।
UCC के राजनीतिक असर का सटीक आकलन नहीं
दूसरा बड़ा सवाल इसके संभावित राजनीतिक असर को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक, संघ, भाजपा और सरकार के स्तर पर अभी ऐसा कोई व्यापक सर्वे सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो कि चुनाव से ठीक पहले UCC लागू करने का मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा। किसी बड़े कानून को चुनाव के बिल्कुल करीब लागू करने पर उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग वर्गों में अलग हो सकता है। इसलिए भाजपा के भीतर कथित तौर पर यह भी विचार किया जा रहा है कि क्या चुनाव से कुछ महीने पहले इस मुद्दे को आगे बढ़ाना जरूरी है या फिर इसे बाद के लिए रखा जाए।
मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण का जोखिम
UCC को लेकर सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा मुस्लिम मतदाताओं के रुख को लेकर है। भाजपा के रणनीतिकारों से जुड़े सूत्रों का दावा है कि चुनाव से पहले UCC लागू करने पर मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा सपा की ओर जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो बसपा और AIMIM जैसी पार्टियों के लिए मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह भी केवल राजनीतिक आकलन है। किसी समुदाय के सभी मतदाताओं के एक ही दिशा में मतदान करने का अनुमान निश्चित रूप से नहीं लगाया जा सकता। यूपी की चुनावी राजनीति में मुस्लिम मतदाता कई सीटों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में UCC को लेकर भाजपा के सामने सवाल सिर्फ कानून लागू करने का नहीं, बल्कि चुनाव के ठीक पहले इसके संभावित राजनीतिक असर का भी है।
भाजपा के साथ कई सहयोगी दल
उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी और अपना दल जैसे सहयोगी दल हैं। इन दलों का अलग-अलग पिछड़े, अति-पिछड़े और सामाजिक समूहों में प्रभाव है। भाजपा के रणनीतिक आकलन में यह माना जा रहा है कि सामाजिक समीकरणों के स्तर पर पार्टी के पास पहले से सहयोगी दलों का समर्थन मौजूद है। ऐसे में चुनाव से पहले UCC जैसा संवेदनशील मुद्दा उठाने से मिलने वाले संभावित लाभ और संभावित नुकसान दोनों का आकलन करना जरूरी होगा। वहीं विपक्षी खेमे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन प्रमुख है। ऐसे में 2027 का चुनाव जातीय समीकरण, सामाजिक गठबंधन, सरकार के कामकाज और वैचारिक मुद्दों के बीच किस दिशा में जाता है, यह चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
उत्तराखंड के बाद दूसरे राज्यों का अनुभव भी देखा जाएगा
UCC को लेकर भाजपा और सरकार के स्तर पर दूसरे राज्यों के अनुभव को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तराखंड में UCC लागू किया जा चुका है और वहां इसके प्रशासनिक तथा कानूनी प्रभावों को देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, बड़े राज्यों में UCC लागू करने से पहले यह देखना उपयोगी होगा कि दूसरे राज्यों में इसे लागू करने के बाद किस तरह की सामाजिक प्रतिक्रिया सामने आती है, अदालतों में किस तरह की चुनौतियां आती हैं और प्रशासनिक स्तर पर किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहां किसी भी बड़े सामाजिक-कानूनी बदलाव का असर व्यापक हो सकता है। इसलिए उत्तराखंड और दूसरे राज्यों के अनुभवों को देखते हुए आगे बढ़ने की रणनीति पर विचार किए जाने की बात कही जा रही है।
2029 के लोकसभा चुनाव के लिए बचाया जा सकता है बड़ा मुद्दा
राजनीतिक रणनीति के स्तर पर एक और चर्चा यह है कि UCC को 2027 के बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बड़े राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर केंद्र सरकार भविष्य में संसद के स्तर पर UCC को लेकर कोई बड़ा कदम उठाती है तो उसका असर पूरे देश की राजनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में भाजपा के लिए यह मुद्दा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उठाने के बजाय राष्ट्रीय चुनाव के समय अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, यह रणनीति होने की बात फिलहाल सूत्रों के हवाले से सामने आ रही है। भाजपा की ओर से 2029 के लिए UCC को बचाकर रखने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
पहले केंद्र की पहल, फिर राज्यों में कानून?
सूत्रों के मुताबिक, एक विचार यह भी है कि UCC को लेकर पहले केंद्र सरकार संसद में राष्ट्रीय स्तर पर कानून की पहल करे। इसके बाद राज्यों में उसी दिशा में कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए। यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े कई विषय संविधान, केंद्रीय कानूनों और राज्यों के अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल खड़े करते हैं। ऐसे में केंद्र और राज्य के बीच कानूनी तालमेल भी जरूरी होगा। अगर केंद्र स्तर पर कोई व्यापक कानून या ढांचा तैयार होता है तो उत्तर प्रदेश के लिए भी उसी के अनुरूप अपनी विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ाना आसान हो सकता है।
2027 में योगी के चेहरे और सरकार के काम पर फोकस?
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे के साथ सरकार के कामकाज को प्रमुखता देने की तैयारी में है। कानून-व्यवस्था, रोजगार, औद्योगिक निवेश, बुनियादी ढांचा, धार्मिक स्थलों का विकास, विरासत और सांस्कृतिक मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा रह सकते हैं। इसके साथ ही हिंदुत्व और राष्ट्रवाद भाजपा की राजनीति के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में बने रहने की संभावना है। इस रणनीति का मतलब यह होगा कि पार्टी चुनाव से ठीक पहले कोई नया और अत्यधिक संवेदनशील मुद्दा जोड़ने के बजाय उन मुद्दों पर जोर दे, जिन्हें वह पहले से अपनी सरकार के कामकाज और राजनीतिक पहचान से जोड़ती रही है।
सरकारी विभागों में अभी UCC की तैयारी नहीं?
उत्तर प्रदेश में किसी बड़े कानून को आगे बढ़ाने से पहले संबंधित विभागों और कानूनी संस्थाओं के स्तर पर प्रक्रिया शुरू होती है। इस मामले में सूत्रों के मुताबिक, विधि एवं न्याय विभाग, संसदीय कार्य विभाग और राज्य विधि आयोग के स्तर पर अभी UCC को लेकर कोई औपचारिक ड्राफ्टिंग प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। इन विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से मुख्यमंत्री स्तर पर UCC को लेकर किसी औपचारिक चर्चा की जानकारी नहीं होने की बात कही जा रही है। अगर यह स्थिति बनी रहती है तो चुनाव से पहले UCC का पूरा विधायी ढांचा तैयार करना और उसे विधानसभा से पारित कराने की प्रक्रिया काफी चुनौतीपूर्ण होगी।
क्या चुनाव के समय सिर्फ ड्राफ्टिंग कमेटी का ऐलान हो सकता है?
इसके बावजूद चुनाव से पहले UCC पूरी तरह चर्चा से बाहर हो जाए, ऐसा भी जरूरी नहीं है। भाजपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, अगर चुनावी माहौल में जातीय राजनीति का प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई देता है तो सरकार अंतिम चरण में UCC के लिए ड्राफ्टिंग कमेटी बनाने की घोषणा कर सकती है। इसका मतलब यह होगा कि तत्काल कानून लागू करने के बजाय UCC को भविष्य की प्रक्रिया के रूप में सामने रखा जाए। इससे पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़े अपने मुद्दे को चुनावी बहस में बनाए रख सकती है। हालांकि, कमेटी गठन की ऐसी संभावना भी अभी आधिकारिक घोषणा नहीं है और इसे सूत्रों के राजनीतिक आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
यूपी में UCC का नंबर गेम क्या कहता है?
उत्तर प्रदेश में भाजपा 2017 से पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है। इसके अलावा विधानसभा और विधान परिषद में पार्टी के पास महत्वपूर्ण संख्या बल है। इसलिए अगर सरकार UCC पर विधेयक लाने का निर्णय करती है तो सदन में संख्या के लिहाज से उसके सामने वैसी चुनौती नहीं होगी जैसी किसी अल्पमत सरकार के सामने होती है। लेकिन किसी कानून को विधानसभा से पारित कराना और उसे लागू करने की पूरी कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग चरण हैं। इसलिए सिर्फ संख्या बल के आधार पर UCC के तत्काल लागू होने की संभावना तय नहीं की जा सकती।
अमित शाह के बयान के बाद तेज हुई थीं अटकलें
13 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के UCC से जुड़े बयान के बाद उत्तर प्रदेश में भी इसे लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हुई थीं। इसके बाद यह चर्चा शुरू हुई कि भाजपा 2027 विधानसभा चुनाव से पहले UCC को बड़ा मुद्दा बना सकती है। राजनीतिक विश्लेषण में यह भी कहा गया कि UCC के जरिए चुनावी बहस को जातीय समीकरणों से हटाकर धर्म और राष्ट्रवाद के मुद्दों की ओर ले जाने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, यह विश्लेषकों और राजनीतिक सूत्रों का आकलन है, भाजपा की घोषित चुनावी रणनीति नहीं। अब सामने आ रही जानकारी इसके उलट संकेत देती है। अगर पार्टी चुनाव से पहले UCC लागू करने से दूरी बनाए रखती है तो 2027 में उसका फोकस सरकार के कामकाज, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व और पहले से स्थापित राजनीतिक मुद्दों पर अधिक रह सकता है।
2027 के चुनाव में UCC से ज्यादा क्या रहेगा केंद्र में?
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव कई स्तरों पर लड़ा जाना है। एक तरफ भाजपा अपने सरकार के कामकाज और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर मैदान में होगी, तो दूसरी तरफ विपक्ष सामाजिक समीकरणों, जातीय प्रतिनिधित्व और सरकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दे सकता है। ऐसे में UCC को चुनाव से पहले लागू करना या इसे भविष्य के लिए रखना भाजपा की रणनीति का महत्वपूर्ण फैसला हो सकता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चुनाव से कुछ महीने पहले इसे लागू करने की दिशा में कोई स्पष्ट सरकारी तैयारी दिखाई नहीं दे रही है। यानी उत्तर प्रदेश की राजनीति में UCC का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इसे कानून का रूप दिया जाएगा या सिर्फ चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया जाएगा, यह आगे होने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।
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