SIR पर 2 चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियां, चुनाव आयोग के अंदर ही उठे सवाल; राहुल बोले- वक्त आने पर छोड़ेंगे नहीं

SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने इन टिप्पणियों और सुझावों को सामान्य आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। राहुल गांधी, अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेताओं ने SIR और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। विवाद के बीच SIR के अलग-अलग चरण, करोड़ों मतदाताओं के सत्यापन और चुनाव आयोग के आधिकारिक कार्यक्रम को लेकर पूरी तस्वीर सामने आई है।

Sep 23, 2026 - 14:07
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SIR पर 2 चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियां, चुनाव आयोग के अंदर ही उठे सवाल; राहुल बोले- वक्त आने पर छोड़ेंगे नहीं

मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर शुरू हुआ विवाद अब चुनाव आयोग के अंदर तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए और कई मामलों में लिखित तौर पर अपनी असहमति दर्ज कराई। मामला सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने भी अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच लिखित टिप्पणियां, सुझाव और फैसलों की आंतरिक जांच कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। आयोग के मुताबिक इसका मकसद पारदर्शिता बनाए रखना और कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना है। यानी जिस विवाद को लेकर विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है, आयोग उसे अपनी आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रहा है। इसी बीच राहुल गांधी ने एक वीडियो जारी कर SIR और मतदाता सूची को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों को पता होना चाहिए कि जो किया जा रहा है वह गलत है और समय आने पर कार्रवाई की जाएगी। विपक्ष के दूसरे नेताओं ने भी इस मुद्दे को लोकतंत्र और मताधिकार से जोड़ते हुए चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

14 बार लिखित आपत्ति, दो आयुक्तों ने CEC को भी भेजीं प्रतियां
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें से चार आपत्तियां 16 अप्रैल को ही दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गईं। कुछ मामलों में संबंधित काम की निगरानी कर रहे उप चुनाव आयुक्तों को भी इन पत्रों की प्रतियां भेजी गईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियां केवल SIR के सामान्य संचालन तक सीमित नहीं थीं। मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने, मतदाताओं की बहाली, अपील की प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दे भी उनके सवालों के दायरे में रहे। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े Form 6 में किए गए बदलाव पर भी सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में उनके द्वारा इस बदलाव को अधिकार क्षेत्र से जुड़ा और अनधिकृत बताए जाने का उल्लेख है।

आखिर SIR को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों है?
SIR यानी Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची की गहन समीक्षा करना है। चुनाव आयोग के अनुसार इस प्रक्रिया में मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने के साथ-साथ अपात्र, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान की जाती है। बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए या हटाने के लिए चिन्हित किए गए। यहीं से विवाद का सबसे बड़ा सवाल सामने आया। विपक्ष का आरोप है कि प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हो सकते हैं। वहीं चुनाव आयोग लगातार यह कहता रहा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण तय कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है और मतदाताओं को दावे और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है।

चुनाव आयोग ने कहा- आंतरिक असहमति सामान्य प्रक्रिया
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने इसे संस्थागत संकट के तौर पर पेश किए जाने पर अपना पक्ष रखा। आयोग का कहना है कि किसी भी संवैधानिक संस्था में अधिकारियों और आयुक्तों के बीच किसी प्रस्ताव या निर्णय पर टिप्पणियां, सुझाव और असहमति दर्ज होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार ऐसी लिखित टिप्पणियों से फैसलों की जांच होती है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि निर्णय कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप हों। इसलिए आयोग के बयान और सामने आई रिपोर्ट के बीच मूल अंतर यही है कि रिपोर्ट में दो आयुक्तों की बार-बार दर्ज आपत्तियों को गंभीर मतभेद के संकेत के तौर पर पेश किया गया है, जबकि आयोग इसे आंतरिक जांच और प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बता रहा है।

राहुल गांधी ने कहा- समय आएगा तो कार्रवाई होगी
राहुल गांधी ने इस पूरे विवाद को वोट के अधिकार और संविधान से जोड़ते हुए चुनाव आयोग पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि उनके मुताबिक जो किया जा रहा है वह गलत है। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि समय आने पर कार्रवाई होगी और किसी को बख्शा नहीं जाएगा। राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से SIR को लेकर पहले भी मतदाता सूची में वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने का आरोप लगाया जाता रहा है। चुनाव आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताता है।

अखिलेश यादव ने भी उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि अगर एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्यों को न्यायपूर्ण तरीके से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जा रही है तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर स्थिति है। उन्होंने चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले पर स्वतः संज्ञान लेने की मांग की। अखिलेश ने यह आरोप भी लगाया कि अगर संवैधानिक संस्था के सदस्य सत्ता के दबाव में काम करने को मजबूर हों तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। इन आरोपों के उलट चुनाव आयोग का कहना है कि आयुक्तों की लिखित टिप्पणियां और आंतरिक असहमति संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

केजरीवाल ने पूछा- वोटर लिस्ट बदलने का अधिकार किसके पास?
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की जिम्मेदारी जब Electoral Registration Officer यानी ERO के स्तर पर निर्धारित है, तो केंद्रीय स्तर पर बैठे अधिकारी मतदाता सूची में बदलाव कैसे कर सकते हैं। SIR की प्रक्रिया में ERO और दूसरे स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी बहस चल रही है। चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर मतदाताओं के लिए नाम खोजने, नया नाम जोड़ने और मतदाता सूची में सुधार जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं।

ममता बनर्जी की पार्टी ने भी जिम्मेदारी पर सवाल उठाए
तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने SIR की प्रक्रिया में कथित खामियों और अव्यवस्था को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि अगर किसी मतदाता का नाम सूची से प्रभावित होता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और किन निर्देशों के तहत यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। वहीं शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बैलेट पेपर से दोबारा चुनाव कराने की मांग की। आम आदमी पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने भी विपक्षी दलों से चुनाव आयोग से जुड़े इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की बात कही। इन नेताओं के बयान उनके राजनीतिक दलों की मांग और आरोप हैं। चुनाव आयोग की ओर से SIR को मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया बताया गया है।

ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग का मुद्दा पहले भी उठा
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष पहले भी सवाल उठा चुका है। अप्रैल 2026 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया था कि विपक्ष के 73 राज्यसभा सांसदों ने CEC को हटाने के लिए नोटिस दिया है। इसमें कथित कदाचार के आरोप लगाए जाने की बात कही गई थी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी SIR के दौरान वास्तविक मतदाताओं के प्रभावित होने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की थी। इससे पहले लोकसभा में भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि उस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया गया।

SIR के पहले दो चरणों के बाद अब तीसरे चरण की तैयारी
चुनाव आयोग ने SIR को चरणबद्ध तरीके से अलग-अलग राज्यों में लागू किया है। आयोग के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार 2026 में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया अलग-अलग तारीखों पर चल रही है। कुछ राज्यों में ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हो चुकी है, जबकि कई राज्यों में दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया चल रही है। आयोग के कार्यक्रम में ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम, मणिपुर, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, तेलंगाना और पंजाब समेत कई राज्यों को अलग-अलग चरणों में शामिल किया गया है। महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक, मेघालय, दिल्ली और नागालैंड के लिए भी SIR की समय-सारिणी जारी की गई है।

36 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के सत्यापन की प्रक्रिया
आयोग के कार्यक्रम के अनुसार अलग-अलग राज्यों में घर-घर जाकर मतदाता विवरण के सत्यापन, ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने, दावे और आपत्तियां लेने तथा अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की प्रक्रिया तय की गई है। इस पूरी कवायद का असर करोड़ों मतदाताओं पर पड़ना है। इसलिए SIR को लेकर विवाद सिर्फ चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध मतदाता सूची में दर्ज नाम और चुनाव में मतदान के अधिकार से है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर SIR 2026 के लिए मतदाताओं को अपना नाम खोजने और पुराने SIR रिकॉर्ड में नाम देखने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

चुनावी नतीजों से जोड़कर भी उठ रहे सवाल
SIR की प्रक्रिया के बीच 2026 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुए। चुनाव आयोग के आधिकारिक नतीजों के अनुसार असम विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 126 में से 82 सीटें जीतीं। पुडुचेरी के चुनाव परिणाम भी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। हालांकि किसी चुनाव में किसी दल की जीत या हार को सीधे SIR से जोड़ने के लिए अलग से प्रमाण और विश्लेषण की जरूरत होगी। इसलिए सिर्फ चुनाव के नतीजों और SIR की प्रक्रिया के एक साथ होने के आधार पर दोनों के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।

अब विवाद का केंद्र चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया
पूरे विवाद में सबसे अहम बात यह है कि पहली बार नहीं, बल्कि पिछले कई महीनों में चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की ओर से बार-बार लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, मतदाता बहाली और डिजिटल सिस्टम से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग इन लिखित टिप्पणियों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बता रहा है। ऐसे में SIR को लेकर राजनीतिक आरोपों से अलग एक बड़ा संस्थागत सवाल यह बन गया है कि चुनाव आयोग के भीतर फैसले किस प्रक्रिया से लिए जाते हैं, अलग-अलग आयुक्तों की आपत्तियों का क्या रिकॉर्ड रहता है और मतदाता सूची में किसी बदलाव की अंतिम जवाबदेही किस स्तर पर तय होती है। SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ यह बहस भी जारी रहने वाली है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने और किसी योग्य मतदाता का नाम प्रभावित न होने देने के बीच संतुलन किस तरह कायम किया जाता है। यही वजह है कि दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

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Sushant Pratap Singh Sushant Pratap Singh is an Indian content creator, video producer, and media professional known for creating political explainer videos, digital journalism content, and social media campaigns. He has worked with UP News Network and specializes in video production, content writing, and social media management. Sushant Pratap Singh began his media career as a content creator and video producer associated with UP News Network. During his professional journey, he worked on political and social explainer content, digital journalism, and social media engagement. He has experience in producing and editing news videos, writing articles for digital platforms, and managing online audience engagement through social media strategies. His work also includes anchoring, on-camera presentation, and graphic design for digital media content. Skills-: Content Writing and Article Writing | Social Media Management | Anchoring and Presentation | Video Editing using Adobe Premiere Pro | Video Production | Graphic Design using Canva | Political and Social Explainer Content