'धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाना अपराध नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी, केंद्र सरकार से मांगा जवाब
वंदे मातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। टीएम कृष्णा की याचिका पर कोर्ट ने कहा कि धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाने वाले व्यक्ति पर आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा और 1986 के बिजो एमैनुअल फैसले का भी जिक्र किया। जानिए नए कानून में क्या अपराध है और सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल क्या है।
वंदे मातरम गाने को लेकर बना नया कानून अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। मंगलवार को टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और यह जांचने पर सहमति जताई है कि क्या वंदे मातरम न गाना अपने आप में दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद ने जुलाई 2026 में कानून में संशोधन कर वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों के दायरे में शामिल किया था। 6 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह संशोधन कानून बन गया। नए प्रावधान के तहत राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में जुटी सभा में बाधा डालना अपराध है और इसके लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह है कि किसी व्यक्ति का खुद वंदे मातरम न गाना और किसी दूसरे व्यक्ति या समूह को उसे गाने से रोकना क्या एक ही बात मानी जा सकती है। इसी बिंदु पर 1986 का बिजो एमैनुअल फैसला भी अहम हो गया है।
टीएम कृष्णा की याचिका से शुरू हुआ पूरा विवाद
कर्नाटक संगीत के गायक टीएम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार के वंदे मातरम से जुड़े निर्देशों और 2026 के संशोधन को चुनौती दी है। याचिका में वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरों को लेकर धार्मिक आपत्ति का तर्क रखा गया है और कहा गया है कि इन अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति भक्ति का संदर्भ आता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इसे गाना अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्षता और मौलिक अधिकारों के सवाल खड़े करता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह तय नहीं किया है कि वंदे मातरम के कितने अंतरे आधिकारिक तौर पर गाए जाने चाहिए। अदालत ने दो अंतरों या छह अंतरों के विवाद पर फैसला देने से इनकार किया है, लेकिन धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति पर आपराधिक कार्रवाई के सवाल की जांच करने पर सहमति जताई है।
कानून में असल में अपराध क्या है?
वंदे मातरम को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम इसी बात पर है कि क्या अब इसे न गाने पर जेल हो सकती है। मौजूदा संशोधित कानून की भाषा इससे अलग है। Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 ने 1971 के कानून की धारा 3 में बदलाव करते हुए राष्ट्रीय गीत को भी उसके दायरे में शामिल किया है। इसके तहत कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकता है या गायन कर रही सभा में बाधा डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
1986 का बिजो एमैनुअल केस फिर चर्चा में क्यों आया?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के बिजो एमैनुअल मामले में तय किए गए सिद्धांतों की ओर इशारा किया। यह मामला तीन स्कूली बच्चों से जुड़ा था, जिन्होंने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को केवल राष्ट्रगान न गाने के कारण दंडित नहीं किया जा सकता, अगर वह सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है और राष्ट्रगान के गायन में बाधा नहीं डालता। यही पुराना फैसला अब वंदे मातरम मामले में महत्वपूर्ण हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई में संकेत दिया कि बिजो एमैनुअल का सिद्धांत अभी भी लागू है और नए कानून की व्याख्या करते समय उसे ध्यान में रखा जाएगा।
सुनवाई में नक्सली शब्द पर भी हुआ विवाद
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में एक अलग मुद्दे को लेकर भी बहस हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और टीएम कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस हुई। संवैधानिक व्यवस्था के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील का जवाब देते हुए तुषार मेहता ने नक्सली शब्द का इस्तेमाल किया। इस पर मुरलीधर ने आपत्ति जताई और इसे वापस लेने की मांग की। मुरलीधर ने कहा कि वह इस टिप्पणी का कड़ा विरोध करते हैं क्योंकि कार्यवाही लाइव चल रही है। इसके जवाब में मेहता ने कहा कि उन्होंने संवैधानिक तरीके की तुलना उस तरीके से की थी जिसे नक्सली चाहता है और उन्हें अपनी टिप्पणी पर अफसोस नहीं है। इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक अधिकारों की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।
जुलाई में संसद ने कानून में क्या बदला था?
वंदे मातरम विवाद को समझने के लिए जुलाई 2026 का घटनाक्रम भी अहम है। Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 को 24 जुलाई को राज्यसभा में पेश किया गया था। राज्यसभा ने इसे 29 जुलाई और लोकसभा ने 30 जुलाई को पारित किया। इसके बाद 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और यह Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 बन गया। संशोधन के जरिए वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े उस कानूनी प्रावधान में शामिल किया गया, जिसमें पहले राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें बाधा डालने पर सजा का प्रावधान था। इस कानून में अधिकतम तीन साल की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।
छह अंतरों को लेकर क्यों है विवाद?
वंदे मातरम के कितने अंतरे गाए जाएं, यह सवाल भी इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा है। केंद्र सरकार के निर्देशों में वंदे मातरम के आधिकारिक पूर्ण संस्करण को लेकर प्रोटोकॉल जारी किया गया है। दूसरी तरफ, कुछ जगहों पर केवल शुरुआती दो अंतरे गाए जाने को लेकर विवाद सामने आया है। हाल में कर्नाटक में राज्य सरकार के कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे गाए जाने के निर्देश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में केंद्र के निर्देशों का हवाला देते हुए इसे चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई में फिलहाल यह तय नहीं किया कि राष्ट्रीय गीत दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों वाला पूर्ण संस्करण ही मान्य होगा। अदालत का तत्काल फोकस इस बात पर है कि धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का कानूनी आधार क्या हो सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल क्या है?
पूरे मामले में दो स्थितियों के बीच अंतर सबसे अहम हो गया है। पहली स्थिति है किसी व्यक्ति का धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़े विश्वास के कारण खुद वंदे मातरम न गाना। दूसरी स्थिति है किसी दूसरे व्यक्ति या समूह को वंदे मातरम गाने से जानबूझकर रोकना या गायन में बाधा डालना। 2026 का कानून दूसरी स्थिति को स्पष्ट रूप से दंडनीय बनाता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट अब यह जांच रहा है कि पहली स्थिति को किस तरह संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और 1986 के बिजो एमैनुअल फैसले की रोशनी में देखा जाए। केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। इसके बाद इस मामले में आगे की सुनवाई होगी। फिलहाल अदालत ने यह फैसला नहीं दिया है कि वंदे मातरम न गाना अपराध है या नहीं, बल्कि इसी कानूनी सवाल की जांच शुरू की है।
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