एक खून माफ होता तो ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते, मुकेश सहनी का विवादित बयान, SIR पर चुनाव आयोग से टकराव के बीच बढ़ा विवाद
SIR को लेकर चुनाव आयोग पर चल रही सियासी बहस के बीच VIP प्रमुख मुकेश सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवादित बयान दिया है। सहनी ने कहा कि अगर उन्हें एक खून माफ होता तो वह ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते। उन्होंने लोकतंत्र, संविधान और मतदाता अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने और बिहार चुनाव को लेकर भी उन्होंने दावे किए। यह बयान उस समय सामने आया है जब चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की SIR से जुड़े मामलों पर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट को लेकर विवाद चल रहा है। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR समेत उसके सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से सर्वसम्मति में लिए गए।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक बहस अब विवादित बयानों तक पहुंच गई है। विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिस पर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। पत्रकारों से बातचीत में सहनी ने कहा कि अगर उन्हें एक खून माफ होता तो वह सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते। सहनी ने साथ ही कहा कि वह संविधान को मानने वाले लोग हैं, इसलिए ऐसा नहीं करेंगे। उनके इस बयान की रिपोर्ट 24 सितंबर 2026 को सामने आई। सहनी का यह बयान ऐसे समय आया है जब SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति जताई। हालांकि चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों को अंतिम फैसलों से अलग व्यक्तिगत टिप्पणियां बताते हुए कहा है कि SIR समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए।
सहनी बोले- लोकतंत्र और संविधान को कुचला जा रहा
मुकेश सहनी ने अपने बयान में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के साथ-साथ केंद्र सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि देश के कर्ताधर्ता प्रधानमंत्री यही करवा रहे हैं और लोकतंत्र को कुचला जा रहा है। सहनी ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि संविधान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव किसी नेता के लिए नहीं बल्कि देश की जनता के लिए होता है। उनके मुताबिक जनता के पास यह अधिकार होता है कि अगर कोई नेता सही तरीके से काम नहीं करता है तो उसे सत्ता से हटा दिया जाए। सहनी ने अपने बयान में मतदाताओं के अधिकार और जनादेश की भूमिका पर जोर दिया और चुनावी प्रक्रिया में जनता के भरोसे को महत्वपूर्ण बताया।
पश्चिम बंगाल और बिहार चुनाव को लेकर भी लगाए आरोप
मुकेश सहनी ने पश्चिम बंगाल और बिहार के चुनावों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में सेना को खड़ा करके और 27 लाख वोट काटकर सरकार बनाई गई। हालांकि 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने और उनके खिलाफ अपील की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग की ओर से अलग तथ्य सामने रखे गए हैं। हालिया जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे और इनमें से करीब 22 लाख लोगों ने बहाली के लिए अपील की है। चुनाव आयोग ने हटाए गए नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट मतदाताओं से जुड़ी प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। बिहार को लेकर सहनी ने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान लोगों के खातों में 10-10 हजार रुपये डालकर चुनाव को अपने पक्ष में किया गया। ये सहनी के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं रखा जा सकता। इसके बाद उन्होंने चुनाव आयोग पर भी सीधा हमला बोला और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भाजपा का आयोग बन चुका है।
ज्ञानेश कुमार को दी चेतावनी- समय हर दिन एक जैसा नहीं रहता
सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए कहा कि समय हर दिन एक जैसा नहीं रहता। उन्होंने आरोप लगाया कि संविधान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और ज्ञानेश कुमार को इस पर शर्म करनी चाहिए। इसी दौरान उन्होंने वह विवादित टिप्पणी की जिसमें कहा कि अगर उन्हें एक हत्या माफ होती तो वह सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते। हालांकि उसी बयान में उन्होंने कहा कि वे संविधान को मानने वाले लोग हैं और इसी वजह से ऐसा नहीं करेंगे। यह बयान सामने आने के बाद विवाद और बढ़ गया है, क्योंकि इसमें एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख के खिलाफ हिंसा की बात कही गई है।
2029 को लेकर भी सहनी ने किया बड़ा दावा
मुकेश सहनी ने आगे दावा किया कि आने वाले समय में ज्ञानेश कुमार नहीं बचेंगे। उन्होंने कहा कि 2029 में राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार बनेगी और ज्ञानेश कुमार जेल जाने वाले पहले व्यक्ति होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों ने उनका साथ दिया है, वे भी जेल जाएंगे। सहनी ने चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर जनादेश को इस तरह प्रभावित किया जा रहा है तो चुनाव कराने पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये का क्या मतलब है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि चुनाव आयोग में तीन चुनाव आयुक्त क्यों हैं और केवल एक ही क्यों नहीं रखा जाता। सहनी ने लोगों से इन मुद्दों को समझने की अपील की।
बयान की पृष्ठभूमि में SIR और 14 आपत्तियों की रिपोर्ट
मुकेश सहनी के इस बयान की पृष्ठभूमि में SIR को लेकर सामने आई वह रिपोर्ट है, जिसने चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और बहाल करने, अपील की प्रक्रिया, Form 6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटा के प्रबंधन से जुड़े मामलों पर थीं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए थे।
चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए
हालांकि इन आरोपों और रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपना पक्ष साफ किया है। आयोग के सूत्रों ने कहा कि SIR समेत चुनाव आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग के मुताबिक किसी विषय पर आयुक्तों की व्यक्तिगत राय, टिप्पणी या सुझाव को आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। आयोग ने कहा कि किसी संस्थान के भीतर अलग-अलग विचार और टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। यानी एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों का जिक्र है, वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि इन टिप्पणियों के बावजूद अंतिम फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए।
मतदाता सूची के डेटा को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डेटा के रखरखाव और तकनीकी व्यवस्था से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। कुछ आपत्तियों में मतदाता डेटा को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने और स्थानीय स्तर पर मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताए जाने की बात कही गई। Form 6 में नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े बदलाव को लेकर भी आपत्ति सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार विवेक जोशी ने प्रस्तावित बदलाव की वैधानिकता पर सवाल उठाया था, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में इसे लेकर आपत्ति दर्ज की। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि इन व्यक्तिगत टिप्पणियों को अंतिम निर्णय से अलग करके देखना चाहिए और आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
SIR पर पहले से ही आमने-सामने हैं आयोग और विपक्ष
SIR की शुरुआत बिहार से जून 2025 में हुई थी और इसके बाद यह प्रक्रिया कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए या हटाए जाने की प्रक्रिया में आए। विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को लेकर मतदाता अधिकारों और नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की समीक्षा करना और मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। पश्चिम बंगाल में भी यह मुद्दा काफी बड़ा रहा। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख नामों में से करीब 22 लाख मतदाताओं ने बहाली के लिए अपील की।
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