यूपी में जल जीवन मिशन की गिरती टंकियों का मांगा जाएगा हिसाब, ED ने शुरू की जांच, सवालों के घेरे में कई कंपनियां
उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकियों और उनसे जुड़े ठेकों को लेकर ED ने जांच का दायरा बढ़ाया है। लखनऊ यूनिट ने जल निगम ग्रामीण से 13 कंपनियों और संस्थाओं के टेंडर, अनुबंध, भुगतान और बैंक खातों की जानकारी मांगी है। 2012 से अब तक के पुराने रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं। गिरी या असुरक्षित घोषित टंकियों की सूची के साथ Soil Test, स्ट्रक्चरल डिजाइन, सीमेंट-सरिया की जांच, थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन और जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी भी मांगी गई है। इसी कड़ी में जौहर यूनिवर्सिटी के VC से करीब 8 घंटे पूछताछ की गई है।
उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकियों को लेकर अब प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की जांच का दायरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। ED की लखनऊ यूनिट ने यूपी जल निगम ग्रामीण से 13 बड़ी कंपनियों और संस्थाओं से जुड़े ठेके, टेंडर, अनुबंध, भुगतान और बैंक खातों का पूरा ब्योरा मांगा है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन कंपनियों को किस प्रक्रिया के तहत काम मिला, प्रोजेक्ट के लिए कितना बजट तय किया गया और सरकारी खजाने से निकला पैसा आखिर किन-किन खातों तक पहुंचा। मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि जांच सिर्फ हाल के जल जीवन मिशन के कामों तक सीमित नहीं बताई जा रही है। ED पुराने रिकॉर्ड को भी खंगाल रही है। एजेंसी की जांच 2012 से अब तक के ठेकों और निर्माण कार्यों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। इसी वजह से जल निगम के पुराने काम और बाद के जल जीवन मिशन के प्रोजेक्ट भी जांच के दायरे में आ गए हैं।
13 कंपनियों के ठेके और भुगतान का मांगा पूरा हिसाब
ED ने जल निगम ग्रामीण से जिन 13 कंपनियों और संस्थाओं से जुड़े रिकॉर्ड मांगे हैं, उनमें टेंडर प्रक्रिया से लेकर भुगतान तक की जानकारी शामिल है। एजेंसी यह देखना चाहती है कि किस कंपनी को कौन सा काम दिया गया, उसके लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ और वास्तविक भुगतान कितना किया गया। इसके साथ ही बैंक खातों की जानकारी भी जांच का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सरकारी धन के प्रवाह को समझना है, यानी सरकारी विभाग से भुगतान निकलने के बाद पैसा किन खातों में गया और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन किस तरह हुए। जांच में टेंडर जारी करने से लेकर अनुबंध तैयार करने और भुगतान मंजूर करने तक की पूरी प्रक्रिया को देखा जा सकता है।
2012 से अब तक के रिकॉर्ड पर ED की नजर
जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 2012 से शुरू होने वाले पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा है। उस समय से जल निगम के जरिए कराए गए कामों, ठेकों और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों को भी खंगाला जा रहा है। 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और आजम खान नगर विकास मंत्री थे। जल निगम नगर विकास विभाग के अधीन आता था। आजम खान और उनसे जुड़े मामलों की ED की जांच पहले से चल रही है। ऐसे में एजेंसी पुराने जल निगम के कामों और बाद के प्रोजेक्टों के बीच किसी वित्तीय या ठेके से जुड़े संबंध की जांच कर रही है। हालांकि किसी पुराने ठेके या किसी कंपनी का जांच के दायरे में होना अपने आप में किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ अपराध साबित नहीं करता। जांच का उद्देश्य दस्तावेजों और वित्तीय लेनदेन की वास्तविक स्थिति सामने लाना है।
ED जानना चाहती है- ठेके आखिर किस आधार पर बांटे गए?
ED की जांच में सबसे अहम सवाल ठेका देने की प्रक्रिया को लेकर है। एजेंसी यह जानना चाहती है कि टेंडर कब जारी किए गए, उनमें कितनी कंपनियों ने हिस्सा लिया और अंतिम रूप से काम किस आधार पर आवंटित किया गया। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि किन कंपनियों और ठेकेदारों को सबसे ज्यादा काम मिले। किसी विशेष कंपनी को बार-बार काम मिला या अलग-अलग प्रोजेक्ट में अलग कंपनियों को जिम्मेदारी दी गई, इसकी जानकारी भी रिकॉर्ड से सामने आ सकती है। प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत और वास्तविक भुगतान के बीच अंतर, भुगतान की तारीख और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच का हिस्सा बताई जा रही है।
गिरी और लीकेज वाली टंकियां भी जांच के केंद्र में
जल जीवन मिशन के तहत गांवों तक पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाने के साथ पानी की टंकियों का निर्माण भी बड़े पैमाने पर किया गया। लेकिन अलग-अलग जिलों से समय-समय पर टंकियों में लीकेज, निर्माण में खामियों और कुछ मामलों में टंकियों के गिरने की शिकायतें सामने आती रही हैं। अब ED ने 2019 के बाद गिरी या असुरक्षित घोषित की गई पानी की टंकियों की जानकारी भी मांगी है। यानी जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि किस कंपनी को ठेका मिला, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि जिन संरचनाओं पर सरकारी पैसा खर्च हुआ, उनकी गुणवत्ता और निर्माण प्रक्रिया कैसी थी। एजेंसी ने संबंधित टंकियों के निर्माण से जुड़े तकनीकी दस्तावेजों पर भी जानकारी मांगी है।
मिट्टी की जांच से लेकर सीमेंट-सरिया तक का रिकॉर्ड
जिन टंकियों को लेकर सवाल उठे हैं, उनके निर्माण से जुड़े तकनीकी रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में हैं। इसमें Soil Test यानी मिट्टी की जांच की रिपोर्ट, स्ट्रक्चरल डिजाइन, निर्माण की ड्राइंग और इस्तेमाल किए गए सीमेंट तथा सरिया से जुड़ी जांच रिपोर्ट शामिल हैं। इसके अलावा थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन की रिपोर्ट और निर्माण की गुणवत्ता को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जानकारी भी मांगी गई है। इससे जांच का दायरा वित्तीय दस्तावेजों से आगे बढ़कर निर्माण की गुणवत्ता तक पहुंच जाता है। अगर किसी निर्माण में तकनीकी स्तर पर कमी पाई जाती है तो उससे जुड़े ठेके, भुगतान और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच का हिस्सा बन सकती है।
सवाल सिर्फ टंकी गिरने का नहीं, सरकारी पैसे के इस्तेमाल का भी
ED की जांच में एक अहम पहलू सरकारी धन के इस्तेमाल से जुड़ा है। किसी प्रोजेक्ट के लिए कितना पैसा स्वीकृत हुआ, ठेकेदार को कितना भुगतान किया गया और निर्माण के बाद उसकी स्थिति क्या रही, इन सभी पहलुओं को एक साथ देखा जा रहा है। यही वजह है कि टेंडर और अनुबंध के साथ बैंक खातों की जानकारी भी मांगी गई है। वित्तीय रिकॉर्ड के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि भुगतान की रकम किस तरह आगे बढ़ी और उससे जुड़े लेनदेन में कोई अनियमितता तो नहीं हुई। अभी जांच के इस चरण में इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।
जल जीवन मिशन से पुराने जल निगम तक पहुंची जांच
पूरे मामले में सबसे बड़ा पहलू यही है कि जांच का दायरा सिर्फ 2019 के बाद शुरू हुए जल जीवन मिशन के कामों तक सीमित नहीं दिख रहा। पुराने जल निगम के ठेकों, कंपनियों, अधिकारियों और भुगतान के रिकॉर्ड भी इसकी जद में हैं। एक तरफ 13 कंपनियों और संस्थाओं के ठेके और बैंक खातों की जानकारी मांगी गई है, दूसरी तरफ गिरी या असुरक्षित घोषित पानी की टंकियों से जुड़े तकनीकी दस्तावेज खंगाले जा रहे हैं। इसके साथ ही जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े निर्माण और वित्तीय लेनदेन पर पूछताछ हो रही है। अब जांच आगे बढ़ने के साथ यह साफ होना बाकी है कि ED को दस्तावेजों और बैंक लेनदेन की जांच में क्या जानकारी मिलती है और क्या पुराने ठेकों, निर्माण कार्यों और बाद के जल जीवन मिशन के प्रोजेक्टों के बीच कोई वित्तीय कड़ी सामने आती है। फिलहाल इन मामलों में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
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