यूपी में पहले पंचायत चुनाव या विधानसभा चुनाव? हाईकोर्ट ने 6 महीने में चुनाव कराने को कहा, नवंबर में खत्म हो रही डेडलाइन, जानिए सरकार के सामने अब क्या विकल्प
यूपी में पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होंगे। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो चुका है। हाईकोर्ट ने 6 महीने में चुनाव कराने की बात कही है, जबकि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट 2027 में आने की संभावना है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होंगे या नहीं, इस सवाल ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो चुका है और फिलहाल कई पंचायतों में प्रशासकों के जरिए कामकाज चल रहा है। इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 5 अगस्त को कहा कि राज्य सरकार पंचायत चुनाव कराने के लिए 6 महीने की अवधि में बाध्य है। यह अवधि नवंबर 2026 में खत्म हो रही है। हाईकोर्ट ने सरकार से रिकॉर्ड भी मांगा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि चुनाव में देरी किसी ऐसी परिस्थिति की वजह से हुई जो सरकार के नियंत्रण से बाहर थी या फिर सरकार ने समय पर चुनाव कराने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचायत चुनाव नवंबर 2026 तक कराए जाएंगे या फिर 2027 विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव होंगे।
सवाल 1: पंचायत चुनाव समय पर क्यों नहीं हुए?
यूपी सरकार ने हाईकोर्ट में चुनाव में देरी के पीछे दो प्रशासनिक वजहें बताई हैं। पहली वजह मतदाता सूची है। राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित की। सरकार के मुताबिक इस वजह से 26 मई 2026 से पहले पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं था। दूसरी वजह पंचायत चुनाव में आरक्षण है। चुनाव में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट जरूरी है। सरकार का कहना है कि आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगेगा और इसके बाद ही आरक्षण की व्यवस्था तय हो सकेगी। हालांकि राजनीतिक जानकार चुनाव में देरी के पीछे कुछ राजनीतिक वजहों को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
राजनीतिक वजह 1: भाजपा को पंचायत चुनाव के नतीजों का डर?
2021 के पंचायत चुनाव के नतीजों को देखते हुए इस बार पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ सकती है। आमतौर पर जिस पार्टी की सरकार होती है, पंचायत चुनाव में उसका संगठन और स्थानीय प्रभाव उसे फायदा पहुंचाता है। लेकिन 2021 में भाजपा के साथ ऐसा नहीं हुआ था। 2021 में जिला पंचायत सदस्य की कुल 3050 सीटों में सपा ने 759, भाजपा ने 768, बसपा ने 319 और कांग्रेस ने 125 सीटें जीती थीं। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 944 सीटों पर जीत दर्ज की थी। भाजपा को अयोध्या, मथुरा, वाराणसी और लखनऊ जैसे इलाकों में भी उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली थी। यह चुनाव कोरोना महामारी के दौर में हुआ था। उस समय सरकारी व्यवस्था को लेकर नाराजगी को भाजपा के खराब प्रदर्शन की एक वजह माना गया।
इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की सीटें 2017 के मुकाबले कम हुईं। 2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में उसकी सीटें घटकर 255 रह गईं। वहीं सपा की सीटें 47 से बढ़कर 111 हो गईं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भी सरकार के सामने UGC, पेपर लीक और ब्राह्मण विवाद जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक दबाव की चर्चा रही है। ऐसे में पंचायत चुनाव के नतीजों का असर विधानसभा चुनाव के माहौल पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
राजनीतिक वजह 2: NDA के सहयोगी दलों के अलग लड़ने का असर
पंचायत चुनाव में भाजपा के सामने दूसरी चुनौती अपने ही गठबंधन को लेकर हो सकती है। सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल एस के पंचायत चुनाव में अपने दम पर लड़ने की बात सामने आई है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक पूर्वांचल में भाजपा के लिए अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा का स्थानीय प्रभाव महत्वपूर्ण है। वहीं पश्चिमी यूपी के ग्रामीण इलाकों में RLD का प्रभाव माना जाता है। यदि सहयोगी दल पंचायत चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं और उन्हें अच्छी सफलता मिलती है तो 2027 विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर उनकी मांग बढ़ सकती है। खासतौर पर कुर्मी, राजभर, बिंद, निषाद, कश्यप और जाट जैसे सामाजिक समीकरणों में गठबंधन के भीतर खींचतान बढ़ने की आशंका जताई जाती है। इसका असर विधानसभा चुनाव से पहले NDA के सीट बंटवारे और गठबंधन की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
राजनीतिक वजह 3: पंचायत चुनाव से बढ़ सकती है स्थानीय गुटबाजी
पंचायत चुनाव पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते। ऐसे में कई बार एक ही राजनीतिक दल से जुड़े स्थानीय नेता और कार्यकर्ता अलग-अलग उम्मीदवारों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं। इससे गांव और ब्लॉक स्तर पर गुटबाजी बढ़ने की स्थिति बन सकती है। चुनाव के दौरान आमने-सामने आए स्थानीय नेताओं को विधानसभा चुनाव में दोबारा एक साथ लाना राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकता है। 2027 विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च में प्रस्तावित हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पंचायत चुनाव कराने पर संगठन के भीतर स्थानीय स्तर पर खींचतान बढ़ने का खतरा भी राजनीतिक दलों के सामने रहेगा।
सवाल 2: अभी पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति क्या है?
यूपी में पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म हो चुका है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हुआ। जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 19 जुलाई को खत्म हो गया। इसके बाद राज्य सरकार ने अगले 6 महीने के लिए प्रधानों और अध्यक्षों की जगह प्रशासकों की व्यवस्था की है। पंचायत चुनाव में देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ खंडपीठ में कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। इन मामलों में संविधान के अनुच्छेद 243-E और उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12(3-A) का हवाला दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 243-E के मुताबिक ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से 5 साल का होता है। कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव कराना जरूरी है। उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-A) के मुताबिक निर्धारित समय पर चुनाव नहीं होने की स्थिति में राज्य सरकार को अधिकतम 6 महीने के भीतर चुनाव कराने होते हैं। यही 6 महीने की अवधि नवंबर 2026 में खत्म हो रही है।
हाईकोर्ट ने 5 अगस्त को क्या कहा?
लखनऊ खंडपीठ ने 5 अगस्त को कहा कि विशेष परिस्थितियों में चुनाव टालने या प्रशासकों जैसी वैकल्पिक व्यवस्था की अवधि 6 महीने से आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। यानी नवंबर 2026 के बाद पंचायतों में प्रशासकों की व्यवस्था जारी रखने को लेकर सरकार के सामने कानूनी चुनौती बनी रहेगी। हाईकोर्ट ने सरकार से रिकॉर्ड भी मांगा है, ताकि चुनाव में देरी के कारणों की जांच की जा सके।
सवाल 3: क्या नवंबर 2026 में पंचायत चुनाव हो सकते हैं?
कानूनी तौर पर नवंबर 2026 की समय-सीमा महत्वपूर्ण है। लेकिन चुनाव की पूरी प्रक्रिया के सामने आरक्षण का मुद्दा सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। राज्य सरकार ने 20 मई 2026 को पंचायत चुनाव में पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग को 6 महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस रिटायर्ड राम औतार सिंह ने 21 जुलाई को कहा था कि आयोग सभी 75 जिलों का दौरा करेगा। डेटा जुटाने और उसके अध्ययन की प्रक्रिया दिसंबर 2026 तक चलेगी। इसके बाद रिपोर्ट तैयार करने में करीब 2 महीने और लग सकते हैं। ऐसे में अंतिम रिपोर्ट फरवरी 2027 तक तैयार होने की संभावना जताई गई है। यही स्थिति पंचायत चुनाव की टाइमिंग को सबसे ज्यादा पेचीदा बना रही है।
फिर पंचायत चुनाव कब होंगे?
अगर पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट फरवरी 2027 तक आती है तो पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले कराना मुश्किल होगा। यूपी में विधानसभा चुनाव भी फरवरी-मार्च 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों में पंचायत चुनाव के विधानसभा चुनाव से पहले होने की संभावना कम दिखाई देती है। हालांकि अंतिम फैसला हाईकोर्ट और आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली कानूनी कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
सरकार के पास क्या विकल्प हैं?
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक राज्य सरकार के सामने कानूनी रास्ते खुले हुए हैं। पंचायत चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए आयोग की सिफारिशों को लागू करने में समय लग रहा है तो सरकार समय-सीमा बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में नए सिरे से अपनी दलील रख सकती है।यदि हाईकोर्ट सरकार की दलीलों से संतुष्ट नहीं होता है तो वह चुनाव कराने के निर्देश दे सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प भी मौजूद रहेगा।
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