बाहुबली बृजभूषण सिंह के बरी होने से कितना बदलेगी यूपी की सियासत, 2027 के चुनाव में दिखाएंगे दबदबा, जानिए भाजपा के लिए ताकत बनेंगे या नई चुनौती
अदालत से बरी होने के बाद बृजभूषण शरण सिंह की राजनीतिक वापसी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। भाजपा के लिए वे कितने अहम हैं, 25 विधानसभा सीटों पर उनके प्रभाव के क्या मायने हैं, 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी उन्हें कितनी तवज्जो दे सकती है, क्षत्रिय वोट बैंक की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है और अगर भविष्य में उनके राजनीतिक फैसले बदलते हैं तो उत्तर प्रदेश का चुनावी समीकरण किस तरह प्रभावित हो सकता है।
यौन शोषण मामले में अदालत से बरी होने के बाद बृजभूषण शरण सिंह एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। पिछले दो वर्षों से आरोपों, टिकट कटने और राजनीतिक दूरी की वजह से जिस नेता को भाजपा के भीतर सीमित माना जा रहा था, अब वही फिर चर्चा के केंद्र में है। इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बृजभूषण की राजनीतिक वापसी होगी या नहीं। असली सवाल यह है कि भाजपा अब उनके साथ किस तरह का राजनीतिक व्यवहार करेगी। क्या पार्टी उन्हें फिर से पूरी ताकत के साथ मैदान में उतारेगी या संतुलन साधने की कोशिश करेगी? और अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या बृजभूषण कोई नया राजनीतिक दांव चल सकते हैं? यूपी की राजनीति में इस फैसले का असर सिर्फ एक नेता तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसकी गूंज 2027 विधानसभा चुनाव से लेकर 2029 लोकसभा चुनाव तक सुनाई दे सकती है।
लगभग 25 सीटों पर हैं बृजभूषण का दबदबा
पूर्वांचल और देवीपाटन मंडल की राजनीति में बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव लंबे समय से देखा जाता रहा है। गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच और आसपास के इलाकों में उन्होंने वर्षों के दौरान ऐसा संगठनात्मक नेटवर्क तैयार किया, जो केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गोंडा समेत करीब 25 विधानसभा सीटों पर उनका सीधा प्रभाव देखने को मिलता है। यही वजह है कि उनके राजनीतिक फैसलों का असर अक्सर चुनावी नतीजों में भी दिखाई देता रहा है।
क्या कहते हैं पिछले चार विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड ?
अगर पिछले चार विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। 2007 में भाजपा और बृजभूषण के रिश्ते अच्छे नहीं थे। टिकट वितरण को लेकर नाराजगी के बाद उन्होंने भाजपा उम्मीदवारों का खुलकर साथ नहीं दिया। नतीजा यह रहा कि देवीपाटन मंडल और तत्कालीन फैजाबाद जिले की 25 सीटों में भाजपा सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई, जबकि बसपा को 11 और समाजवादी पार्टी को 7 सीटें मिलीं। 2012 तक बृजभूषण समाजवादी पार्टी के साथ थे। उस चुनाव में सपा ने 18 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा केवल 4 सीटों पर सिमट गई। 2017 में उनकी भाजपा में वापसी हुई और यही इलाका भाजपा के लिए मजबूत गढ़ बन गया। पार्टी ने 23 सीटों पर जीत दर्ज की। 2022 में भी भाजपा ने यहां 18 सीटें अपने नाम कीं। यही आंकड़े बताते हैं कि बृजभूषण का प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि चुनावी समीकरणों पर भी पड़ता है।
अदालत के फैसले के बाद भाजपा में क्या बदलेगा ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले के बाद भाजपा के भीतर बृजभूषण की स्थिति पहले से मजबूत हो सकती है। सबसे पहला असर उनकी राजनीतिक साख पर दिखाई देगा। लोकसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद जिस तरह उनकी भूमिका सीमित हो गई थी, अदालत के फैसले के बाद वे अपने समर्थकों के बीच पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरे हैं। दूसरा बड़ा असर 2027 विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण पर पड़ सकता है। देवीपाटन मंडल और आसपास के जिलों में उनके समर्थकों की अच्छी संख्या मानी जाती है। ऐसे में टिकट बंटवारे के समय उनकी राय पहले की तुलना में अधिक अहम हो सकती है। तीसरा पहलू 2029 लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। बृजभूषण पहले भी सार्वजनिक मंचों से लोकसभा में वापसी की इच्छा जता चुके हैं। ऐसे में कैसरगंज या किसी दूसरी सीट से उनकी दावेदारी फिर मजबूत मानी जा सकती है।
बृजभूषण की वापसी से किसे नुकसान ?
बृजभूषण की वापसी जितनी राजनीतिक मजबूती दे सकती है, उतनी ही चुनौतियां भी साथ ला सकती है। महिला पहलवानों से जुड़ा मामला देशभर में चर्चा का विषय रहा था। यदि इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दी जाती है, तो चुनावी माहौल में विपक्ष इस मुद्दे को फिर से उठा सकता है। इसका असर महिला मतदाताओं के बीच भाजपा की छवि पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है। दूसरी तरफ पार्टी के भीतर पहले से मौजूद गुटबाजी भी एक चुनौती बन सकती है। राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि बृजभूषण और पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के संबंध हमेशा सहज नहीं रहे। ऐसे में उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत संगठन के भीतर नए समीकरण भी बना सकती है।
क्या भाजपा से नाराज हैं बृजभूषण?
पिछले कुछ महीनों में बृजभूषण के कई बयान राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बने। मई 2023 में उन्होंने कहा था कि मेरे खिलाफ कोई आरोप साबित होता है, तो खुद फांसी पर लटक जाऊंगा। दिसंबर 2025 में उन्होंने कहा था कि जिस लोकसभा से बेइज्जत करके निकाला गया हूं, एक बार वहां लौटूंगा जरूर। इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि मुलायम सिंह यादव से उनके अच्छे संबंध रहे हैं और अखिलेश यादव से भी उनके रिश्ते अच्छे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब उन पर हमला हुआ तो समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ कुछ नहीं कहा और इसे वे अहसान मानते हैं। इसके अलावा अप्रैल 2026 में बिहार के भागलपुर में उन्होंने कहा था कि अगर किसी को लगता है कि हम भार बन चुके हैं, तो एक बार कह दो कि मेरी जरूरत नहीं है। हम दिखा देंगे कि हमारी उपयोगिता है। इन बयानों के बाद लगातार यह चर्चा होती रही कि यदि भाजपा उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं करती तो वे भविष्य में कोई अलग फैसला भी ले सकते हैं। हालांकि फिलहाल उन्होंने ऐसा कोई औपचारिक संकेत नहीं दिया है।
आगामी विधानसभा चुनाव में बृजभूषण कितने असरदार ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बृजभूषण अकेले किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकते, लेकिन कई सीटों पर मुकाबले की दिशा जरूर बदल सकते हैं। पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में क्षत्रिय समाज के बीच उनकी पकड़ मानी जाती है। यूपी की लगभग 70 से 80 विधानसभा सीटों पर क्षत्रिय मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जबकि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव की वजह से करीब 100 सीटों तक उनका असर माना जाता है। ऐसे में यदि भविष्य में बृजभूषण भाजपा से अलग कोई राजनीतिक रास्ता चुनते हैं, तो इसका सीधा असर भाजपा के चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
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