यूपी में 10 फीसदी बढ़ने वाले फ्यूल सरचार्ज से लोगों को मिल सकती है राहत, आयोग का UPPCL से सवाल- किस आधार पर लगाया
उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। यूपी विद्युत नियामक आयोग ने 10% फ्यूल सरचार्ज पर सवाल उठाते हुए UPPCL से 7 दिन में जवाब मांगा है। अगर बिजली निगम 1400 करोड़ रुपये के पुराने बकाये को जोड़ने का आधार साबित नहीं कर पाया, तो उपभोक्ताओं का अतिरिक्त बोझ 10% से घटकर सिर्फ 2% रह सकता है। आखिर बिजली बिल बढ़ाने के पीछे क्या है पूरा गणित और कैसे बदल सकता है आपका बिल
उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी, बिजली कटौती और बढ़ते खर्चों के बीच आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर सामने आई है। बिजली बिल पर लगाए गए 10 फीसदी फ्यूल सरचार्ज को लेकर अब सवाल खड़े हो गए हैं। यूपी विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने इस अतिरिक्त शुल्क की वैधता पर गंभीर आपत्ति जताते हुए यूपी पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) से सात दिनों के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है। आयोग ने साफ पूछा है कि आखिर 10 फीसदी फ्यूल सरचार्ज की गणना किस आधार पर की गई और इसमें दो साल पुराने बकाये को क्यों जोड़ा गया? इस सवाल ने प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं को उम्मीद दी है कि आने वाले दिनों में उनके बिजली बिल का बोझ कम हो सकता है।
क्या घट सकता है बिजली बिल का अतिरिक्त बोझ?
पूरे विवाद की जड़ जून महीने के लिए लागू किया गया 10 फीसदी फ्यूल एंड पावर परचेज कॉस्ट एडजस्टमेंट (FPPCA) है। उपभोक्ता संगठनों का आरोप है कि बिजली निगम ने नियमों से हटकर करीब 1400 करोड़ रुपये की पुरानी देनदारियों को भी इसमें जोड़ दिया। नियमों के अनुसार फ्यूल सरचार्ज की गणना केवल हाल की बिजली खरीद लागत के अंतर के आधार पर की जानी चाहिए। यदि आयोग की जांच में यह आरोप सही पाया गया और UPPCL अपनी दलील साबित नहीं कर पाया, तो उपभोक्ताओं को 10 फीसदी के बजाय केवल करीब 2 फीसदी अतिरिक्त राशि ही देनी पड़ सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो 100 रुपये के बिल पर जहां अभी 10 रुपये अतिरिक्त देने पड़ रहे हैं, वहां यह राशि घटकर केवल 2 रुपये रह सकती है।
उपभोक्ता परिषद ने उठाया था मुद्दा
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस मामले को आयोग के सामने चुनौती दी थी। परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनहित याचिका के जरिए आरोप लगाया कि मार्च 2026 की बिजली खरीद लागत के साथ-साथ पुराने बकाये और एनटीपीसी के भुगतान जैसी देनदारियों को भी जोड़ दिया गया, जो नियमों के खिलाफ है। परिषद का दावा है कि यदि वास्तविक लागत के आधार पर गणना की जाती तो जून 2026 में उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय राहत मिल सकती थी।
आयोग ने क्यों जताई आपत्ति?
आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार ने प्रारंभिक सुनवाई में माना कि 10 फीसदी ईंधन अधिभार प्रथम दृष्टया नियमों के अनुरूप नहीं दिखता। यही वजह है कि UPPCL को पूरे गणित और आधार के साथ रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। आयोग अब यह जानना चाहता है कि बिजली खरीद लागत में जो अंतर दिखाया गया है, वह वास्तविक है या उसमें पुराने वित्तीय दावों को शामिल कर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाला गया है।
बिजली निगम का क्या है पक्ष?
UPPCL का कहना है कि प्रदेश में पिछले लगभग छह वर्षों से मूल बिजली दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। निगम के अनुसार फ्यूल सरचार्ज बिजली दरों में स्थायी वृद्धि नहीं, बल्कि वास्तविक बिजली खरीद लागत के आधार पर लगाया जाने वाला अस्थायी शुल्क है। बिजली निगम का तर्क है कि बिजली उत्पादन और खरीद की लागत बढ़ने के कारण यह अधिभार लागू किया गया है और यह हर महीने बदलता रहता है।
गर्मी के बीच बढ़ा था विरोध
30 मई को जैसे ही 10 फीसदी फ्यूल सरचार्ज का आदेश जारी हुआ, प्रदेशभर में इसका विरोध शुरू हो गया। पहले से ही महंगाई, बिजली संकट और गर्मी से परेशान उपभोक्ताओं ने इसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया। उपभोक्ता परिषद ने दावा किया कि मार्च महीने में बिजली खरीद की लागत को जरूरत से ज्यादा दिखाकर करीब 1610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार जनता पर डाल दिया गया।
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