E20 पेट्रोल से गाड़ियों के पार्ट्स हो सकते हैं खराब, सरकार ने पहली बार माना, सदन में बोले गडकरी - इंजन बदलने की जरूरत नहीं
अगर आपकी कार या बाइक 2016 से पहले की है, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने पहली बार संसद में स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ पुरानी BS-3 गाड़ियों के रबर पार्ट्स और गैस्केट प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इंजन बदलने की आवश्यकता नहीं होगी। आखिर किन वाहनों पर असर पड़ सकता है, कितना खर्च आएगा और किन बातों का ध्यान रखना होगा?
देशभर में E20 पेट्रोल को बढ़ावा देने के बीच केंद्र सरकार ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि इस ईंधन का असर कुछ पुरानी गाड़ियों के रबर से बने पार्ट्स पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने साफ किया है कि इससे वाहन के इंजन को बदलने की जरूरत नहीं होगी और सामान्य सर्विसिंग के दौरान आवश्यक पार्ट्स बदलकर वाहन को पहले की तरह चलाया जा सकता है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को राज्यसभा में लिखित जवाब में कहा कि BS-3 मानक वाली कुछ पुरानी गाड़ियों में E20 पेट्रोल के कारण रबर पार्ट्स और गैस्केट बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। ये वाहन मुख्य रूप से 2005 से 2016 के बीच निर्मित दोपहिया और चारपहिया हैं। गडकरी ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध स्टडीज में E20 पेट्रोल से वाहनों की कुल परफॉर्मेंस, विश्वसनीयता या टिकाऊपन पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इन वाहनों के इंजन में किसी प्रकार का संशोधन या बदलाव कराने की आवश्यकता नहीं है।
किन गाड़ियों पर पड़ सकता है असर?
सरकार के जवाब के अनुसार, यूरो-4 से नीचे या BS-3 श्रेणी के वाहन इस दायरे में आते हैं। यानी 2016 से पहले बने कई दोपहिया और चारपहिया वाहनों में समय के साथ कुछ रबर कंपोनेंट प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि गाड़ी तुरंत खराब हो जाएगी। सरकार का कहना है कि वाहन सामान्य रूप से चलते रहेंगे, लेकिन नियमित सर्विसिंग के दौरान यदि किसी पार्ट में घिसावट या रिसाव दिखाई देता है, तो उसे बदलना होगा।
किन पार्ट्स को बदलने की जरूरत पड़ सकती है?
E20 पेट्रोल का असर मुख्य रूप से फ्यूल सिस्टम में लगे रबर कंपोनेंट्स पर देखा गया है। इनमें शामिल हैं-
- फ्यूल पाइप
- ओ-रिंग
- रबर सील
- फ्यूल होज
- गैस्केट
- फ्यूल पंप के रबर कंपोनेंट
- इंजेक्टर सील
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये अधिकांश पार्ट्स इंजन के अंदर नहीं बल्कि फ्यूल सिस्टम का हिस्सा होते हैं।
आखिर रबर पार्ट्स पर असर क्यों पड़ता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल पुराने प्रकार के रबर के लंबे संपर्क में आने पर उसे सख्त, मुलायम या फुला सकता है। पुराने वाहनों में इस्तेमाल किए गए कुछ रबर कंपोनेंट्स को लंबे समय तक अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन को ध्यान में रखकर डिजाइन नहीं किया गया था। इसी वजह से समय के साथ उनके बदलने की जरूरत पड़ सकती है।
कितना आ सकता है खर्च?
रबर पार्ट्स बदलने का खर्च वाहन के मॉडल और कंपनी पर निर्भर करेगा।
- दोपहिया वाहन: लगभग 500 से 1,500 रुपए
- चारपहिया वाहन: करीब 2,000 से 8,000 रुपए
लक्जरी वाहनों में यह खर्च सामान्य कारों की तुलना में अधिक हो सकता है।
कितने समय बाद बदलने पड़ेंगे पार्ट्स?
सरकार ने किसी निश्चित समय सीमा या किलोमीटर का उल्लेख नहीं किया है। रूटीन सर्विसिंग के दौरान यदि घिसावट, रिसाव या खराबी मिलती है, तभी संबंधित पार्ट्स बदले जाएंगे।
क्या माइलेज पर भी असर पड़ेगा?
राज्यसभा में दिए जवाब में नितिन गडकरी ने कहा कि वाहन का माइलेज केवल ईंधन पर निर्भर नहीं करता। ड्राइविंग स्टाइल, सड़क की स्थिति, वाहन का रखरखाव और अन्य तकनीकी पहलू भी माइलेज को प्रभावित करते हैं। उन्होंने बताया कि इंडियन ऑयल, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरर्स और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने दोपहिया और चारपहिया वाहनों पर E20 ईंधन को लेकर अध्ययन किया है। सरकार के अनुसार, दुनिया के कई देशों में एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग एक सदी से भी अधिक समय से किया जा रहा है।
E20 पेट्रोल आखिर है क्या?
E20 एक ऐसा ईंधन है जिसमें 80% पेट्रोल और 20% एथेनॉल मिलाया जाता है। एथेनॉल एक जैव-ईंधन है, जिसे गन्ने, मक्का और कृषि अपशिष्ट से तैयार किया जाता है। सरकार का उद्देश्य इसके जरिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और वायु प्रदूषण घटाना है।
भारत में एथेनॉल आधारित ईंधन के तीन प्रमुख मॉडल
- E20: 80% पेट्रोल + 20% एथेनॉल, वर्तमान में अधिकांश पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध।
- फ्लेक्स फ्यूल (E85): 85% तक एथेनॉल और 15% पेट्रोल का मिश्रण, फिलहाल सीमित स्तर पर फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए उपलब्ध।
- E100: लगभग 100% शुद्ध एथेनॉल आधारित ईंधन, जिसके उपयोग के लिए आवश्यक नियामकीय मंजूरी सरकार दे चुकी है।
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