इमरजेंसी में गए जेल, 9 बार बने विधायक, कई थानों की पुलिस ढूंढती थी भैंस, कहानी सियासत के आजम की अर्श से फर्श तक पहुंचने की
क्या जौहर यूनिवर्सिटी ही आजम खान के सियासी पतन की सबसे बड़ी वजह बनी? कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने वाले आजम खान का सफर संघर्ष, सत्ता, विवाद और कानूनी लड़ाइयों से भरा रहा है। छात्र राजनीति से लेकर समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे बनने तक, फिर जौहर यूनिवर्सिटी का सपना, जमीन विवाद, जेल, विधायकी जाना और आज 100 करोड़ रुपये तक के संभावित जुर्माने की चर्चा-इस वीडियो में जानिए आजम खान की पूरी राजनीतिक जीवनी और उनके उत्थान से पतन तक की पूरी कहानी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं का जिक्र होता है, तो मोहम्मद आजम खान का नाम सबसे पहले लिया जाता है। कभी रामपुर में उनका ऐसा दबदबा था कि विरोधी भी उनके राजनीतिक रसूख को स्वीकार करते थे। कहा जाता था कि प्रशासन से लेकर राजनीति तक, हर जगह उनकी पकड़ थी। लेकिन आज वही आजम खान लगातार कानूनी मामलों, जेल, चुनावी झटकों और सबसे बढ़कर अपनी ड्रीम प्रोजेक्ट मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर मुश्किलों में घिरे हुए हैं। विडंबना यह है कि जिस यूनिवर्सिटी को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत बनाया, वही आज उनकी सबसे बड़ी कानूनी चुनौती बन चुकी है।
कैसे बने सियासत के आजम ?
14 अगस्त 1948 को रामपुर में जन्मे आजम खान ने अपनी शुरुआती पढ़ाई के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में दाखिला लिया। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू हुई। उर्दू पर मजबूत पकड़ और बेबाक भाषण शैली ने उन्हें छात्र राजनीति में अलग पहचान दिलाई। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने तत्कालीन सरकार का विरोध किया, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जेल से बाहर निकलने के बाद उनकी पहचान एक युवा नेता के रूप में बन चुकी थी। 1977 में उन्होंने पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। हालांकि 1980 में जनता दल (सेक्युलर) के टिकट पर रामपुर से विधायक बने। इसके बाद लोकदल, जनता दल और जनता पार्टी के टिकट पर भी चुनाव जीतते रहे। 1992 में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई, तो आजम खान उसके संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। आने वाले वर्षों में वह सपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे बन गए और कई बार कैबिनेट मंत्री भी रहे।
मुलायम सिंह के हाथों कराया यूनिवर्सिटी का शिलान्यास
आजम खान का सबसे बड़ा सपना रामपुर में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाना था। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर ट्रस्ट बनाया और 2006 में मुलायम सिंह यादव से जौहर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास कराया। विश्वविद्यालय के लिए करीब 78 हेक्टेयर (लगभग 300 बीघा) जमीन जुटाई गई। लेकिन यहीं से विवाद भी शुरू हो गया। कई किसानों ने आरोप लगाया कि उनसे दबाव में जमीन ली गई। बाद में शिकायतें दर्ज हुईं कि जमीन अधिग्रहण में सरकारी जमीन, शत्रु संपत्ति और दलितों की जमीन भी शामिल की गई। 2019 में इन आरोपों के आधार पर प्रशासन ने जांच शुरू की और करीब 38 हेक्टेयर जमीन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उस समय रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी आन्जनेय सिंह ने कहा था कि शेष जमीन के अधिग्रहण में भी कई अनियमितताओं के आरोप हैं और सर्किल रेट में भी बदलाव किए गए थे।
खुद को बना लिया आजीवन वाइस चांसलर
2006 में विश्वविद्यालय के लिए एक विशेष कानून लाया गया, जिसमें आजम खान को आजीवन वीसी बनाने का प्रावधान रखा गया। उस समय तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने इस पर आपत्ति जताई। तत्कालीन राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने भी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे परियोजना कुछ समय के लिए अटक गई। 2007 में सत्ता बदलने के बाद परियोजना की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसके बाद आजम खान ने इसे निजी विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने की योजना बनाई।
2012 में सत्ता लौटी, तो यूनिवर्सिटी भी दौड़ पड़ी
2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद जौहर यूनिवर्सिटी को निजी विश्वविद्यालय का दर्जा मिल गया। निर्माण तेजी से हुआ और आजम खान आजीवन कुलाधिपति बने। विभिन्न स्रोतों के अनुसार विश्वविद्यालय पर करीब 550 करोड़ रुपये खर्च किए गए। परिसर में इंजीनियरिंग कॉलेज, अन्य शैक्षणिक संस्थान और दो मस्जिदें भी बनाई गईं। एक समय यहां 3,000 से अधिक छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे थे। उस दौर में यह विश्वविद्यालय सिर्फ एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि आजम खान के राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक बन चुका था।
2017 के बाद बदल गई पूरी तस्वीर
2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद जौहर यूनिवर्सिटी, जमीन और ट्रस्ट से जुड़े मामलों की जांच शुरू हुई। प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण, निर्माण और अन्य दस्तावेजों की जांच की। इसी दौरान रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी आन्जनेय सिंह और आजम खान के बीच टकराव भी सुर्खियों में रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान आजम खान ने एक जनसभा में जिलाधिकारी पर विवादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि चुनाव के बाद उनसे "जूते साफ करवाएंगे"। इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया। इसके बाद प्रशासन ने विश्वविद्यालय, स्कूलों और जमीन से जुड़े मामलों में कार्रवाई तेज कर दी। रामपुर पब्लिक स्कूल समेत कई संस्थानों की भी जांच हुई और कई परिसरों पर कार्रवाई की गई।
फेक सर्टिफिकेट मामले में आजम खान गए जेल
2020 में फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में आजम खान, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम को जेल जाना पड़ा। 2022 विधानसभा चुनाव में आजम खान और उनके बेटे दोनों चुनाव जीत गए, लेकिन बाद में अदालत के फैसले के बाद उनकी विधायकी चली गई। इसके बाद रामपुर उपचुनाव में पहली बार आजम खान समर्थित उम्मीदवार हार गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे उनके प्रभाव में बड़ी गिरावट माना। 2024 लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने उनकी पसंद के बजाय दूसरे उम्मीदवार को टिकट दिया। वह उम्मीदवार चुनाव जीत गया। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी के भीतर भी आजम खान का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
जौहर यूनिवर्सिटी को गिराने का RDA ने दिया था आदेश
15 जुलाई 2026 को रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने नक्शा स्वीकृत न होने के आधार पर जौहर यूनिवर्सिटी परिसर के 40 में से 38 भवनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश जारी किया। अधिकारियों के अनुसार यदि विश्वविद्यालय को नियमित कराना है, तो विकास शुल्क, कंपाउंडिंग फीस और अन्य शुल्क मिलाकर करीब 100 करोड़ रुपये तक का भुगतान करना पड़ सकता है। यही नहीं, जिस आन्जनेय सिंह से कभी आजम खान का टकराव हुआ था, वही अब मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर और RDA के अध्यक्ष हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय से जुड़े किसी भी प्रशासनिक फैसले में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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