शादीशुदा बेटी को हक से नहीं किया जा सकता वंचित… सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बदल जाएगी सालों पुरानी सोच
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी महिला को सिर्फ शादीशुदा होने के कारण सरकारी योजनाओं और अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। कुलसुम निशा मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद भी बेटी का मायके से रिश्ता और उसके अधिकार समाप्त नहीं होते।
देश की सर्वोच्च अदालत ने विवाहित महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी महिला को सिर्फ इसलिए किसी सरकारी योजना, लाभ या अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह शादीशुदा है। अदालत ने कहा कि ऐसी सोच संविधान में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है। यह फैसला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। माना जा रहा है कि यह निर्णय आने वाले समय में महिलाओं के अधिकारों और समाज की सोच पर बड़ा असर डालेगा।
शादी के बाद बेटी पराया धन नहीं
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि शादी के बाद बेटी अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा नहीं रहती। अदालत ने कहा कि विवाह होने से बेटी और उसके मायके के बीच का खून का रिश्ता समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने समाज में मौजूद उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसमें शादी के बाद बेटियों को परिवार से अलग मान लिया जाता है। अदालत ने कहा कि जब बेटा शादी के बाद भी परिवार का हिस्सा बना रहता है, तो केवल बेटी के मामले में अलग सोच रखना लैंगिक भेदभाव है। संविधान ऐसी किसी भी भेदभावपूर्ण सोच को स्वीकार नहीं करता।
क्या है कुलसुम निशा का मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा से जुड़ा है। उनकी मां गांव में उचित मूल्य की राशन दुकान चलाती थीं। मार्च 2024 में उनकी मां का अचानक निधन हो गया। कुलसुम निशा शादीशुदा होने के बावजूद अपनी मां और बहनों के साथ रहती थीं और दुकान के कामकाज में भी सहयोग करती थीं। मां की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट में आ गया। इसके बाद कुलसुम ने अनुकंपा के आधार पर राशन दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया। लेकिन उस समय उत्तर प्रदेश सरकार के नियमों में विवाहित बेटी को परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया था।
सरकार का तर्क भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया
इसी नियम के आधार पर उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) और बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुलसुम की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि विवाहित महिलाएं आमतौर पर पति के घर चली जाती हैं, इसलिए स्थानीय निवास संबंधी शर्तों का पालन नहीं हो पाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह मान लेना गलत है कि हर शादीशुदा बेटी अपने मायके से दूर ही रहेगी। ऐसी सामान्य धारणा के आधार पर सभी महिलाओं को किसी योजना से बाहर नहीं किया जा सकता। बता दें कि अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महिलाओं के साथ समान व्यवहार करना संविधान की मूल भावना है और केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर उनके अधिकार नहीं छीने जा सकते।
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