रामायणकालीन इतिहास सहेजेगा आजमगढ़, नदियों से अस्त्र-शस्त्रों तक का बनेगा रिकॉर्ड, श्रीराम संग्रहालय की योजना पर भी मंथन

रामायणकालीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में आजमगढ़ को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है। रामायणकालीन नदियों और अस्त्र-शस्त्रों के अभिलेखीकरण का काम यहां शोधकर्ताओं की मदद से किया जा रहा है। रामायण सर्किट के चेयरमैन डॉ. राम अवतार शर्मा के दौरे में अंतरराष्ट्रीय श्रीराम संग्रहालय, मूल सरयू के संरक्षण और महराजगंज के भैरव बाबा क्षेत्र में संग्रहालय विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

Aug 9, 2026 - 17:47
Aug 9, 2026 - 17:48
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रामायणकालीन इतिहास सहेजेगा आजमगढ़, नदियों से अस्त्र-शस्त्रों तक का बनेगा रिकॉर्ड, श्रीराम संग्रहालय की योजना पर भी मंथन

रामायणकालीन विरासत को दस्तावेजों और आधुनिक तकनीक के जरिए संरक्षित करने की दिशा में आजमगढ़ की भूमिका बढ़ती दिखाई दे रही है। रामायण सर्किट के चेयरमैन और संस्कृति विभाग, भारत सरकार से जुड़े डॉ. राम अवतार शर्मा के आजमगढ़ दौरे के दौरान रामायणकालीन नदियों और अस्त्र-शस्त्रों के अभिलेखीकरण को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। महराजगंज क्षेत्र के हूंसेपुर ग्राम में श्रीराम आगमन स्थल समितियों और मूल सरयू बचाओ अभियान की संयुक्त बैठक में डॉ. शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय श्रीराम संग्रहालय की प्रस्तावित योजना पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि श्रीराम से जुड़े स्थलों, नदियों, परंपराओं, संस्कृति और ऐतिहासिक सामग्री को केवल आस्था तक सीमित रखने के बजाय प्रामाणिक अभिलेखीकरण और शोध के जरिए संरक्षित किए जाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि आजमगढ़ को रामायणकालीन नदियों के अभिलेखीकरण और रामायणकालीन अस्त्र-शस्त्रों के अभिलेखीकरण की जिम्मेदारी दी गई है। इन दोनों विषयों पर डॉ. पवन कुमार के नेतृत्व में काम किया जा रहा है। इसमें जिले के शोधकर्ताओं के साथ स्थानीय लोग भी भाग ले रहे हैं।

रामायणकालीन नदियों की पहचान और इतिहास जुटाने पर जोर
बैठक में मूल सरयू के संरक्षण और पुनर्जीवन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। चर्चा के दौरान कहा गया कि नदियां भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। ऐसे में रामायणकालीन नदियों के प्राचीन प्रवाह, उद्गम, संगम, तटवर्ती स्थलों और वर्तमान स्थिति का वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकरण किया जाना जरूरी है। इस दौरान महराजगंज स्थित भैरव बाबा क्षेत्र में प्रस्तावित विकास कार्यों पर भी चर्चा हुई। क्षेत्र में संग्रहालय विकसित करने की संभावनाओं पर विचार किया गया। इसमें स्थानीय इतिहास, धार्मिक परंपराओं और रामायणकालीन सांस्कृतिक संदर्भों को शामिल किए जाने की संभावनाओं पर मंथन हुआ।

आजमगढ़ शहर में भी हुईं दो बैठकें
डॉ. राम अवतार शर्मा के आजमगढ़ प्रवास के दौरान शहर में दो अलग-अलग बैठकें भी आयोजित की गईं। पहली बैठक आलोक कुमार के संयोजन में ACCI परिसर में हुई। इसके बाद दूसरी बैठक सिधारी स्थित दीनानाथ जी के आवास पर आयोजित की गई। इन बैठकों में रामायणकालीन नदियों, संस्कृति, प्राचीन भूगोल, अस्त्र-शस्त्र और श्रीराम से जुड़े स्थलों के अभिलेखीकरण एवं संरक्षण पर चर्चा हुई। स्थानीय स्तर पर मौजूद ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सामग्री को एकत्र कर उसे शोध के लिए व्यवस्थित करने पर भी जोर दिया गया। बैठकों में सदानंद सिंह, सुरेंद्र सिंह, अजय श्रीवास्तव, सीताराम प्रजापति, सुभाष चंद्र जायसवाल, डॉ. पवन कुमार, अरविंद जी, शशि प्रकाश राय, अशोक अग्रवाल, गौरव रघुवंशी, संतोष, अंकुर और राघवेंद्र मिश्रा समेत कई लोग मौजूद रहे।

नदियों और अस्त्र-शस्त्र के अभिलेखीकरण से बढ़ेगी आजमगढ़ की भूमिका
रामायणकालीन नदियों और अस्त्र-शस्त्रों के अभिलेखीकरण की जिम्मेदारी मिलने के बाद आजमगढ़ में शोध और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े काम को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। बैठकों में इस बात पर जोर दिया गया कि श्रीराम से संबंधित विरासत का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व, भूगोल, पर्यावरण और लोकस्मृति के आधार पर भी किया जाना चाहिए। डॉ. शर्मा के दौरे को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री और परंपराओं को व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर आजमगढ़ की पहचान रामायणकालीन सांस्कृतिक विरासत के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में मजबूत हो सकती है। बैठकों के बाद डॉ. राम अवतार शर्मा कैफियत एक्सप्रेस से अयोध्या के लिए रवाना हो गए। उनके दौरे के बाद जिले में श्रीराम से जुड़े शोध, अभिलेखीकरण और संभावित सांस्कृतिक परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद है।

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