वीरेंद्र पाल यादव की अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, वित्तमंत्री सुरेश खन्ना ने दिया कांधा, 37 साल से गांव की राजनीति में कायम था परिवार का असर

शाहजहांपुर में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष वीरेंद्र पाल यादव की अंतिम विदाई में जनसैलाब उमड़ पड़ा। वित्तमंत्री सुरेश खन्ना ने करीबी दोस्त को कांधा दिया। जानिए 1988 से शुरू हुए उनके राजनीतिक सफर, परिवार के 37 साल पुराने राजनीतिक प्रभाव और अंतिम यात्रा से जुड़ी पूरी कहानी।

Aug 12, 2026 - 14:31
Aug 12, 2026 - 14:32
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वीरेंद्र पाल यादव की अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, वित्तमंत्री सुरेश खन्ना ने दिया कांधा, 37 साल से गांव की राजनीति में कायम था परिवार का असर

शाहजहांपुर। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष वीरेंद्र पाल यादव की अंतिम विदाई का दृश्य बुधवार को भावुक कर देने वाला रहा। दिल्ली के एम्स अस्पताल में मंगलवार दोपहर निधन के बाद बुधवार को उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार किया गया। दोपहर करीब एक बजे जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े। भीड़ में गांव के लोग, समर्थक, भाजपा कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे। वीरेंद्र पाल यादव को अपना करीबी मित्र और भाई मानने वाले वित्तमंत्री सुरेश खन्ना भी अंतिम संस्कार में पहुंचे। उन्होंने अपने दोस्त की अर्थी को कांधा दिया। इस दौरान सुरेश खन्ना भावुक नजर आए। उन्होंने कहा, वीरेंद्र मेरे लिए सच्चे दोस्त, भाई और सबकुछ थे। उनका जाना मेरे जीवन में अपूरणीय क्षति है।

दोस्ती का रिश्ता ऐसा कि एक-दूसरे को मानते थे परिवार का हिस्सा
वीरेंद्र पाल यादव और सुरेश खन्ना के बीच सिर्फ राजनीतिक संबंध नहीं थे, बल्कि दोनों की दोस्ती लंबे समय से चली आ रही थी। सुरेश खन्ना वीरेंद्र पाल यादव को अपना करीबी दोस्त और भाई मानते थे। वहीं वीरेंद्र पाल यादव भी सुरेश खन्ना को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। वीरेंद्र पाल यादव कई सार्वजनिक मंचों से सुरेश खन्ना को अपना राजनीतिक गुरु बता चुके थे। दोनों के बीच लंबे समय से राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध बने हुए थे। यही वजह रही कि अंतिम विदाई के समय सुरेश खन्ना की मौजूदगी और उनका भावुक होना वहां मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा।

अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़, पुलिस को करनी पड़ी मशक्कत
बुधवार को वीरेंद्र पाल यादव की अंतिम यात्रा में दूर-दूर से लोग पहुंचे। देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए जुट गए। भीड़ इतनी बढ़ गई कि मौके पर पुलिस को व्यवस्था संभालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों ने लोगों को व्यवस्थित रखने के लिए घेरा बनाया। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग अपने पुराने परिचित और नेता को अंतिम विदाई देने के लिए मौजूद रहे। अंतिम संस्कार में सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर, सांसद अरुण सागर, भाजपा जिलाध्यक्ष केसी मिश्र, स्थानीय विधायक, जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह और पुलिस अधीक्षक सौरभ दीक्षित समेत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, भाजपा कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी पहुंचे।

1988 में निर्दलीय प्रधान से शुरू हुआ था सफर
वीरेंद्र पाल यादव का राजनीतिक सफर वर्ष 1988 में शुरू हुआ था। उन्होंने निर्दलीय प्रधान के तौर पर राजनीति में कदम रखा। इसके बाद वह लगातार सक्रिय राजनीति में बने रहे और आगे चलकर जिला पंचायत अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। स्थानीय लोगों के मुताबिक, लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद वीरेंद्र पाल यादव का लोगों से जुड़ाव बना रहा। उनका सरल स्वभाव और लोगों से सहजता से मिलने का अंदाज उनकी पहचान माना जाता था। क्षेत्र के अलग-अलग वर्गों के लोगों के साथ उनके संबंध रहे और वह विवादों से दूर रहने के लिए भी जाने जाते थे।

परिवार की राजनीति का गांव में 37 साल से दबदबा
वीरेंद्र पाल यादव का राजनीतिक प्रभाव केवल उनके अपने कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा। उनके परिवार की गांव की राजनीति में भी लंबे समय से मजबूत पकड़ रही है। पिछले 37 साल से गांव की प्रधानी इसी परिवार के पास है। उनकी बहू ममता यादव वर्तमान में जिला पंचायत अध्यक्ष हैं, जबकि उनके बेटे अजय प्रताप यादव भी जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। ऐसे में वीरेंद्र पाल यादव के निधन के साथ सिर्फ एक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष का निधन नहीं हुआ, बल्कि क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय एक प्रभावशाली परिवार के प्रमुख चेहरे का भी अंत हुआ है।

लोगों को याद आया उनका अपनापन
अंतिम विदाई में पहुंचे लोगों के बीच वीरेंद्र पाल यादव के राजनीतिक जीवन से ज्यादा उनके व्यक्तिगत व्यवहार की चर्चा सुनाई दी। लोगों ने बताया कि वह किसी परिचित को कहीं भी देखते थे तो नाम लेकर बुलाते थे। किसी काम से उनके पास पहुंचने वाला व्यक्ति खाली हाथ वापस नहीं लौटता था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, उन्होंने हमेशा लोगों के साथ न्याय करने की कोशिश की और किसी के साथ भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपनाया। यही अपनापन उनकी अंतिम यात्रा में भी दिखाई दिया, जब बड़ी संख्या में लोग उन्हें आखिरी बार देखने और विदाई देने पहुंचे।

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