यूपी में इस बार सूखे का आसार, धान के किसानों की बढ़ सकती है मुश्किलें, जानिए क्यों बन रहे ये हालात और मौसम वैज्ञानिकों ने दी क्या सलाह
उत्तर प्रदेश में इस बार मानसून राहत से ज्यादा चिंता लेकर आ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि राज्य में सामान्य से 8% कम बारिश होगी। पश्चिमी यूपी के कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका है, जबकि देर से आने वाला मानसून और लंबी चलने वाली लू किसानों की मुश्किलें बढ़ा सकती है। सबसे ज्यादा असर धान की खेती पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। आखिर क्यों कमजोर पड़ रहा है मानसून, किन जिलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा और किसानों के लिए कितना बड़ा संकट खड़ा हो सकता है?
उत्तर प्रदेश में हर साल जून का महीना बारिश की उम्मीद लेकर आता है, लेकिन इस बार मौसम का मिजाज कुछ अलग दिखाई दे रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के ताजा आकलन ने किसानों से लेकर आम लोगों तक की चिंता बढ़ा दी है। अनुमान है कि प्रदेश में इस बार मानसून कमजोर रह सकता है और सामान्य से कम बारिश दर्ज की जाएगी। इसका सबसे बड़ा असर खेती, जलस्रोतों और गर्मी से राहत की उम्मीदों पर पड़ सकता है।
मानसून की चाल सुस्त, यूपी में भी देर से दस्तक के संकेत
आमतौर पर मानसून जून की शुरुआत में केरल पहुंच जाता है और धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर बढ़ता है। इस बार उम्मीद थी कि मानसून समय से पहले आएगा, लेकिन उसकी रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई। मौसम विभाग के अनुसार मानसून अभी भी केरल तट के आसपास ही अटका हुआ है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी इसके 20 जून से पहले पहुंचने की संभावना काफी कम हो गई है। मानसून की इस देरी का मतलब सिर्फ कुछ दिनों का इंतजार नहीं है। इसका असर पूरे खरीफ सीजन की शुरुआत पर पड़ सकता है, क्योंकि धान जैसी फसलें शुरुआती बारिश पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं।
8 फीसदी कम बारिश का अनुमान, 60 जिलों पर असर की आशंका
मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक इस वर्ष उत्तर प्रदेश में मानसून सीजन के दौरान सामान्य से लगभग 8 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है। आमतौर पर प्रदेश में जून से सितंबर के बीच 820 से 840 मिलीमीटर तक वर्षा होती है, लेकिन इस बार यह आंकड़ा 754 से 773 मिलीमीटर के बीच रह सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमी पूरे प्रदेश में समान रूप से नहीं दिखेगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है, जहां वर्षा का स्तर सामान्य से काफी नीचे जाने का अनुमान है।
पश्चिमी यूपी के 10 जिलों में सूखे जैसे हालात बनने का खतरा
सबसे ज्यादा चिंता पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर जताई जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां के करीब 10 जिलों में बारिश की कमी गंभीर रूप ले सकती है। यदि जुलाई और अगस्त में भी पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो खेती और भूजल दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार सूखे जैसी स्थिति बनने पर सबसे पहले असर धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों पर दिखाई देगा। साथ ही तालाबों, नहरों और भूजल स्तर पर भी दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल आंधी-बारिश से राहत, लेकिन गर्मी फिर दिखाएगी तेवर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बने साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण अगले कुछ दिनों तक मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है। कई जिलों में तेज हवाएं चलने, आंधी आने और कुछ स्थानों पर बारिश होने की संभावना है। हालांकि मौसम विशेषज्ञ इसे स्थायी राहत नहीं मान रहे। उनका कहना है कि यह सिस्टम कमजोर पड़ते ही तापमान फिर तेजी से बढ़ेगा। जून में सामान्य से 1.5 से 3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान दर्ज हो सकता है, जिससे गर्मी और उमस दोनों बढ़ेंगी।
इस बार लू के थपेड़े भी ज्यादा दिन झेलने पड़ सकते हैं
कम बारिश का सीधा असर हीटवेव पर भी पड़ने वाला है। सामान्य वर्षों में जून महीने में दो से तीन दिन लू चलती है, लेकिन इस बार यह अवधि लगभग दोगुनी हो सकती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जून में पांच से छह दिन तक तीव्र हीटवेव की स्थिति बन सकती है। इससे बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होगी।
धान की खेती पर सबसे बड़ा खतरा
उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था आज भी काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। खरीफ सीजन में धान की रोपाई समय पर बारिश होने पर ही सुचारु रूप से हो पाती है। यदि जुलाई और अगस्त में वर्षा कम हुई, तो धान की पैदावार पर बड़ा असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे केवल मानसून पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक सिंचाई व्यवस्था सुनिश्चित करें। जिन क्षेत्रों में नहर और ट्यूबवेल की सुविधा सीमित है, वहां चुनौती और बढ़ सकती है।
आखिर कमजोर क्यों पड़ रहा है मानसून?
इस बार मानसून के कमजोर रहने के पीछे दो बड़े कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण प्रशांत महासागर में विकसित हो रही 'अल नीनो' जैसी परिस्थितियां हैं। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ने लगता है। दूसरा कारण पश्चिमी प्रशांत महासागर में विकसित शक्तिशाली चक्रवाती गतिविधियां हैं। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सिस्टम मानसूनी हवाओं की नमी को अपनी ओर खींच रहा है, जिससे भारत की ओर बढ़ने वाली मानसूनी धाराएं कमजोर पड़ रही हैं।
सिर्फ मौसम नहीं, अर्थव्यवस्था की भी परीक्षा होगी
कम बारिश का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। कृषि उत्पादन घटने पर खाद्यान्न बाजार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी असर पड़ता है। उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में मानसून की स्थिति सीधे करोड़ों लोगों की आय और आजीविका से जुड़ी होती है। यही वजह है कि इस बार मानसून की हर गतिविधि पर किसानों, प्रशासन और मौसम विभाग की नजर बनी हुई है।
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