सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान: फैसलों की आलोचना करना अवमानना नहीं, लोगों को राय रखने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि फैसलों की आलोचना करना अवमानना नहीं है और लोगों को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के फैसलों की आलोचना करना न्यायपालिका का अपमान नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी जजमेंट पर अपनी राय रखना और उसकी आलोचना करना लोगों का अधिकार है, चाहे वह आलोचना कितनी भी तीखी क्यों न हो। यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें स्कूली किताबों में न्यायपालिका से जुड़े विवादित अंशों को लेकर सवाल उठाए गए थे।
याचिका में उठाया गया था पाठ्यपुस्तकों का मुद्दा
यह मामला याचिकाकर्ता पंकज पुष्कर द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पहले एक मामले में स्कूली किताबों से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे अंश हटाने का निर्देश दिया गया था, लेकिन अभी भी कुछ किताबों में ऐसे हिस्से मौजूद हैं, जो न्यायपालिका को नकारात्मक रूप में दिखाते हैं।
एनसीईआरटी की किताब का दिया गया उदाहरण
सुनवाई के दौरान एनसीईआरटी की एक किताब का उदाहरण सामने रखा गया। इसमें लिखा था कि कुछ लोग मानते हैं कि हाल के कुछ फैसले आम जनता के हित में नहीं रहे, खासकर झुग्गीवासियों के बेदखली से जुड़े मामलों में। इस पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह सिर्फ एक नजरिया है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।
सरकार ने बनाई समीक्षा समिति
इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने स्कूल की किताबों में न्यायपालिका से जुड़े विषयों की समीक्षा के लिए एक पैनल बनाया है। इस समिति में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज इंदु मल्होत्रा और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल शामिल हैं।
अलग-अलग नजरिए होना स्वाभाविक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी फैसले को अलग-अलग नजरिए से देखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, एक पक्ष किसी व्यक्ति को अतिक्रमणकारी मान सकता है, जबकि दूसरा उसे लंबे समय से वहां रहने वाला व्यक्ति समझ सकता है। यह सब लोगों की सोच और समझ पर निर्भर करता है।
आलोचना को बताया लोकतंत्र का हिस्सा
अदालत ने अंत में कहा कि किसी फैसले को गलत बताना या उससे असहमति जताना पूरी तरह स्वीकार्य है। इससे न्यायपालिका की गरिमा को कोई नुकसान नहीं होता। कोर्ट का यह बयान लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
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