राम मंदिर ट्रस्ट से चंपत राय ने दिया इस्तीफा, कहा जाता था रामलला का पटवारी, इमरजेंसी में गए थे जेल, जानें राम मंदिर के एनसाइक्लोपीडिया की पूरी कहानी
राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने पद छोड़ दिया है। चढ़ावा विवाद के बीच हुए इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर कौन हैं चंपत राय, जिन्हें रामलला का पटवारी कहा जाता था? इमरजेंसी में जेल से लेकर राम मंदिर आंदोलन और ट्रस्ट तक का पूरा सफर...
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में शुक्रवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला। चढ़ावा चोरी के आरोपों को लेकर पिछले तीन सप्ताह से चल रही चर्चाओं के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके साथ ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा और मंदिर निर्माण प्रभारी गोपाल राव ने भी अपने पद छोड़ दिए। ट्रस्ट की बैठक महंत नृत्य गोपाल दास के आवास पर हुई, जिसके बाद तीनों के इस्तीफे सामने आए। हालांकि ट्रस्ट की ओर से इस्तीफे की आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की गई।
चढ़ावा विवाद के बाद तेज हुई थीं अटकलें
राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित गड़बड़ी का मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद 13 जून को उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की। एसआईटी ने 23 जून को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंप दी थी। इसी बीच 19 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंचे, लेकिन उस दौरान चंपत राय मुख्यमंत्री के आधिकारिक कार्यक्रम से दूर दिखाई दिए। तभी से उनके भविष्य को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया था। शुक्रवार को हुई ट्रस्ट की बैठक के बाद इन अटकलों पर विराम लग गया।
कौन हैं चंपत राय, जिन्हें कहा जाता था रामलला का पटवारी?
चंपत राय का जन्म 18 नवंबर 1946 को बिजनौर जिले के नगीना कस्बे में हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और बचपन से ही संघ के विचारों का प्रभाव उन पर पड़ा। विज्ञान से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने धामपुर के आरएसएम डिग्री कॉलेज में रसायन विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की, लेकिन उनका झुकाव सामाजिक और संगठनात्मक कार्यों की ओर लगातार बढ़ता गया।
इमरजेंसी में गिरफ्तारी के बाद बदली जिंदगी की दिशा
26 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू होने के बाद संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई। पुलिस जब उन्हें कॉलेज से गिरफ्तार करने पहुंची तो उन्होंने पहले अपनी कक्षा पूरी करने की अनुमति मांगी। पढ़ाई खत्म करने के बाद घर जाकर माता-पिता का आशीर्वाद लिया और स्वयं कोतवाली पहुंचकर गिरफ्तारी दी। करीब 18 महीने जेल में रहने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए।
राम मंदिर के एनसाइक्लोपीडिया कैसे बने चंपत राय ?
संघ के प्रचारक बनने के बाद चंपत राय को अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन की जिम्मेदारियां सौंपी गईं। उन्होंने वर्षों तक गांव-गांव जाकर आंदोलन के लिए समर्थन जुटाया और राम जन्मभूमि से जुड़े ऐतिहासिक व कानूनी दस्तावेजों का बड़ा संग्रह तैयार किया। आंदोलन से जुड़े लोग उन्हें राम मंदिर का एनसाइक्लोपीडिया कहते थे, क्योंकि राम जन्मभूमि विवाद से जुड़ी लगभग हर जानकारी और दस्तावेज उनके पास मौजूद रहते थे। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवा के दौरान जब विवादित ढांचा गिराया गया, उससे पहले चंपत राय का एक बयान काफी चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा था कि यह भगवान राम की वानर सेना है, जो करने आई है, करके जाएगी। इसके बाद हुए घटनाक्रम ने देश की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया दोनों को लंबे समय तक प्रभावित किया। बाद में इस प्रकरण से जुड़े मुकदमों में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी भूमिका स्वीकार की थी।
ट्रस्ट के सबसे प्रभावशाली चेहरों में थे शामिल
विश्व हिंदू परिषद में क्षेत्रीय संगठन मंत्री से लेकर अंतरराष्ट्रीय महामंत्री तक की जिम्मेदारी निभाने वाले चंपत राय को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनने के बाद महासचिव बनाया गया। मंदिर निर्माण की निगरानी, ट्रस्ट का प्रशासनिक संचालन और रामलला से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों के समन्वय की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी। समर्थकों के बीच इसी वजह से उन्हें रामलला का पटवारी कहा जाता था। 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से लेकर 25 नवंबर 2025 के ध्वजारोहण समारोह तक, हर बड़े आयोजन की रूपरेखा तैयार करने और उसके संचालन में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। देश-विदेश से आने वाले अतिथियों के समन्वय से लेकर आयोजन की व्यवस्थाओं तक, ट्रस्ट के सबसे सक्रिय चेहरों में चंपत राय शामिल रहे।
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