जेब में अब नहीं फटेंगे नोट… RBI लाने जा रहा प्लास्टिक करेंसी, जल्द शुरू होगा बड़ा ट्रायल
RBI: आरबीआई देश में प्लास्टिक यानी पॉलिमर नोट लाने की तैयारी कर रहा है। बढ़ती छपाई लागत, जल्दी खराब होने वाले नोट और नकदी की बढ़ती मांग को देखते हुए जल्द पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है। दुनिया के 60 देशों में पहले से प्लास्टिक नोट चल रहे हैं।
देश में जल्द ही प्लास्टिक यानी पॉलिमर के नोट देखने को मिल सकते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। हाल ही में पटना और मुंबई में हुई केंद्रीय बैंक की बोर्ड बैठकों में प्लास्टिक नोटों को लेकर गंभीर चर्चा की गई। लगातार बढ़ती नकदी की मांग, कागज के नोटों की छपाई पर बढ़ता खर्च और नोटों के जल्दी खराब होने जैसी समस्याओं को देखते हुए आरबीआई अब नए विकल्प तलाश रहा है। माना जा रहा है कि जल्द ही आम लोगों के लिए प्लास्टिक नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है। अगर यह सफल रहा, तो आने वाले समय में देश में बड़े स्तर पर पॉलिमर नोट चलन में आ सकते हैं।
कागज के नोटों पर बढ़ रहा भारी खर्च
आरबीआई की वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में कागज के नोट छापने पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। पिछले वित्त वर्ष में यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। यानी एक साल में नोट छापने की लागत में बड़ा इजाफा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि लंबे समय में प्लास्टिक के नोट ज्यादा किफायती साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनकी उम्र कागज के नोटों से कहीं ज्यादा होती है। साथ ही अब देश के एटीएम इतने आधुनिक हो चुके हैं कि वे आसानी से पॉलिमर नोटों को पहचान सकते हैं।
फटे-पुराने नोट बन रहे बड़ी परेशानी
देश में बड़ी संख्या में नोट जल्दी खराब हो जाते हैं। वित्त वर्ष 2025 में आरबीआई ने 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया। यह पिछले साल की तुलना में 12.3 फीसदी ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये और उसके बाद 100 रुपये के नोट शामिल थे। डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद देश में नकदी का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। 15 मई तक देश में चलन में मौजूद कुल मुद्रा 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। ऐसे में बार-बार नए नोट छापने का दबाव भी बढ़ रहा है। प्लास्टिक नोट ज्यादा टिकाऊ होने के कारण इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
छोटे नोटों के लिए भी बन सकता है समाधान
देश में 10 और 20 रुपये जैसे छोटे नोटों की मांग हमेशा बनी रहती है। हालांकि कुल मुद्रा में इनकी हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम है। पहले सरकार ने सिक्कों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन लोगों ने उसे ज्यादा पसंद नहीं किया। साल 2012 में पांच शहरों में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का ट्रायल भी हुआ था, लेकिन तकनीकी कारणों से वह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब तकनीक पहले से काफी बेहतर हो चुकी है, इसलिए पुरानी दिक्कतें दूर होने की उम्मीद है।
दुनिया के कई देशों में पहले से चल रहे प्लास्टिक नोट
प्लास्टिक नोट कोई नई व्यवस्था नहीं है। दुनिया के करीब 60 देशों में पॉलिमर नोट इस्तेमाल हो रहे हैं। इसकी शुरुआत ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में की थी। इसके बाद सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों ने भी इसे अपनाया। कनाडा और रोमानिया जैसे देशों में भी यह व्यवस्था सफल रही है। अब भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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