शंकराचार्य के स्वागत को लेकर सपा में छिड़ी महाभारत, पूर्व और मौजूदा जिलाध्यक्ष के बीच हुई तीखी नोकझोंक, अलीगढ़ में दो खेमों में बंटी समाजवादी पार्टी
अलीगढ़ में शंकराचार्य के स्वागत कार्यक्रम के दौरान सपा के पूर्व और वर्तमान जिलाध्यक्ष आमने-सामने आ गए। कुछ मिनटों की यह बहस राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई, क्योंकि इसके पीछे विधानसभा चुनाव से चली आ रही अंदरूनी नाराजगी और संगठनात्मक खींचतान की कहानी जुड़ी बताई जा रही है।
अलीगढ़ में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के स्वागत कार्यक्रम के दौरान समाजवादी पार्टी के दो गुटों के बीच लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई। रामघाट रोड स्थित कलश फार्म हाउस में आयोजित कार्यक्रम में सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष गिरीश यादव और वर्तमान जिलाध्यक्ष लक्ष्मी धनगर के समर्थक आमने-सामने आ गए। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य के आगमन से ठीक पहले उनके स्वागत को लेकर दोनों नेताओं के बीच बहस शुरू हो गई।
पूर्व और मौजूदा जिलाध्यक्ष के बीच हुआ विवाद
दरअसल अलीगढ़ में जैसे ही शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपनी गाड़ी से उतरने वाले थे, तभी स्वागत के लिए खड़े नेताओं के बीच आगे रहने को लेकर विवाद शुरू हो गया। आरोप है कि पूर्व जिलाध्यक्ष गिरीश यादव ने वर्तमान जिलाध्यक्ष लक्ष्मी धनगर से वहां से हटने और दूरी बनाकर खड़े रहने को कहा। इस पर लक्ष्मी धनगर ने मौके पर मौजूद रहने की बात कही, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस होने लगी। दोनों नेताओं के बीच बढ़ती नोकझोंक का असर उनके समर्थकों पर भी दिखाई दिया और कुछ ही देर में दोनों गुटों के कार्यकर्ता भी आमने-सामने आ गए। हालांकि मौके पर मौजूद वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाल लिया, जिसके बाद मामला शांत हुआ और शंकराचार्य का स्वागत कार्यक्रम संपन्न कराया गया।
विधानसभा चुनाव से शुरू हुई थी खींचतान
सपा के इन दोनों नेताओं के बीच का विवाद नया नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान ही दोनों नेताओं के बीच मतभेद सामने आ गए थे। उस समय लक्ष्मी धनगर छर्रा विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी थीं, जबकि गिरीश यादव अलीगढ़ के जिलाध्यक्ष थे। बताया जाता है कि चुनाव के दौरान गिरीश यादव चाहते थे कि संगठन में यादव मतदाताओं को केंद्र में रखकर रणनीति बनाई जाए, जबकि लक्ष्मी धनगर सभी वर्गों और समाजों को साथ लेकर चुनाव लड़ने की पक्षधर थीं। इसी रणनीतिक मतभेद ने दोनों नेताओं के बीच दूरी बढ़ा दी। चुनाव में लक्ष्मी धनगर को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए वर्ष 2023 में उन्हें अलीगढ़ का जिलाध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
जिलाध्यक्ष बनने के बाद और बढ़ी कलह
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जिलाध्यक्ष बनने के बाद दोनों नेताओं के बीच की प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई। संगठन के भीतर वर्चस्व की इस लड़ाई का असर समय-समय पर सामने आता रहा है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के स्वागत कार्यक्रम में हुआ विवाद भी इसी अंदरूनी खींचतान का ताजा उदाहरण माना जा रहा है।
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