बिजली कटौती या फिर तारों पर कपड़े... यूपी में छिड़ी अखिलेश यादव बनाम सीएम योगी की जंग, जानिए किस सरकार में बेहतर थी व्यवस्था
यूपी में बिजली कटौती को लेकर सियासी पारा चढ़ा है। एक तरफ अखिलेश यादव बिजली संकट पर योगी सरकार को घेर रहे हैं, दूसरी तरफ भाजपा पुरानी सरकारों के दौर को याद दिला रही है। ऐसे में आइए जानते है कि यूपी की बिजली व्यवस्था किसके दौर में बेहतर है...
उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। तापमान लगातार 45 डिग्री के आसपास बना हुआ है। कई जिलों से बिजली कटौती की शिकायतें सामने आ रही हैं। कहीं लोग सड़क पर उतर रहे हैं तो कहीं बिजली घरों के बाहर प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने बिजली संकट को लेकर योगी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि भाजपा सरकार में बिजली सब-स्टेशनों पर पीएसी तैनात करनी पड़ रही है। विधायक और सांसद अपनी ही सरकार के खिलाफ चिट्ठियां लिख रहे हैं। जनता परेशान है और सरकार व्यवस्था संभालने में नाकाम साबित हो रही है।
वहीं अखिलेश यादव के हमले के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि बिजली व्यवस्था पर सवाल वही लोग उठा रहे हैं, जिनके शासनकाल में प्रदेश की स्थिति बेहद खराब थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक समय ऐसा भी था, जब प्रदेश के कई इलाकों में सप्ताह के हिसाब से बिजली मिलती थी। गांवों में लोग बिजली आने का इंतजार करते थे। जहां आज के समय में बिजली कटौती खबर बनती है तो वहीं सपा सरकार के समय में गांवों में बिजली आना खबर बनती थी। सीएम योगी ने आगे तंज कसते हुए कहा कि सपा सरकार के समय में लोग बिजली के तारों पर कपड़े सुखाते थे। ऐसे में आइए जानते हैं कि किसके समय बिजली व्यवस्था अच्छी हुई...
जब यूपी में इनवर्टर और जनरेटर मजबूरी हुआ करते थे
कुछ साल पहले तक उत्तर प्रदेश की गर्मियां सिर्फ मौसम की चुनौती नहीं होती थीं, बल्कि बिजली संकट की परीक्षा भी होती थीं। घरों में इनवर्टर होना मजबूरी माना जाता था। जनरेटर की आवाज मोहल्लों का हिस्सा थी। गांवों में लोग बिजली आने का इंतजार करते थे और शहरों में कटौती का समय लगभग तय माना जाता था। रातें अक्सर छतों पर गुजरती थीं। बच्चों को यह तक याद रहता था कि बिजली कब आएगी और कब जाएगी। कई घरों में हाथ वाले पंखे गर्मियों की जरूरत थे। बिजली सिर्फ सुविधा नहीं थी, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा भी थी।
बिजली वितरण को लेकर क्यों उठते रहे सवाल?
समाजवादी पार्टी सरकार के दौर में विपक्ष लगातार बिजली वितरण को लेकर सवाल उठाता था। भाजपा समेत कई विपक्षी दल आरोप लगाते थे कि कुछ जिलों को ज्यादा प्राथमिकता मिलती है, जबकि कई इलाके लंबी कटौती झेलते थे। त्योहारों के दौरान भी बिजली सप्लाई को लेकर बहस होती थी। गांव-कस्बों में यह धारणा मजबूत होती चली गई थी कि बिजली वितरण में राजनीतिक प्रभाव काम करता है। हालांकि समाजवादी पार्टी हमेशा इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती रही।
16 हजार मेगावाट से 34 हजार मेगावाट तक कैसे पहुंचा यूपी?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 2016-17 के आसपास उत्तर प्रदेश की पीक बिजली मांग लगभग 16 से 17 हजार मेगावाट के आसपास थी। मौजूदा समय में प्रदेश 32 से 34 हजार मेगावाट तक की बिजली मांग संभाल रहा है। यानी लगभग दोगुनी क्षमता वाला सिस्टम आज काम कर रहा है। सरकार का दावा है कि यह बदलाव सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से नहीं आया, बल्कि पूरे सिस्टम को मजबूत करने से संभव हुआ है।
लोड मैनेजमेंट से क्षमता निर्माण तक बदल गया मॉडल
पहले बिजली व्यवस्था का बड़ा हिस्सा लोड मैनेजमेंट पर आधारित माना जाता था। जहां सिस्टम संभाल सके, वहां सप्लाई दी जाती थी। लेकिन बाद के वर्षों में ट्रांसमिशन क्षमता बढ़ाने, ग्रिड मजबूत करने, वितरण व्यवस्था सुधारने और नए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर ज्यादा फोकस किया गया। बड़े स्तर पर सब-स्टेशन बढ़ाए गए। हाई कैपेसिटी लाइनें तैयार की गईं। ग्रामीण और शहरी फीडर अलग किए गए। डिजिटल मॉनिटरिंग और स्मार्ट तकनीक को सिस्टम में जोड़ा गया।
बिजली सुधरी तो उद्योग और निवेश को भी मिला फायदा
सरकार का दावा है कि बिजली व्यवस्था को कटौती आधारित मॉडल से क्षमता आधारित मॉडल में बदलने की कोशिश की गई है। इसका असर औद्योगिक क्षेत्रों पर भी दिखाई दिया। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, लखनऊ, कानपुर और पूर्वांचल के औद्योगिक इलाकों में स्थिर बिजली सप्लाई निवेश के लिए एक बड़ा कारण बनी। डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और बड़े उद्योगों को लगातार बिजली उपलब्ध होना विकास मॉडल का हिस्सा बताया जा रहा है।
सरकार के दावे बनाम विपक्ष के सवाल
हालांकि विपक्ष अभी भी सवाल उठा रहा है। हाल के दिनों में कई जिलों में बिजली कटौती को लेकर लोगों ने प्रदर्शन किए हैं। समाजवादी पार्टी का कहना है कि अगर व्यवस्था बेहतर हुई है तो लोग सड़क पर क्यों उतर रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार का दावा है कि रिकॉर्ड बिजली मांग के बावजूद सप्लाई बनाए रखने का लगातार प्रयास किया जा रहा है और सिस्टम पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुआ है।
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