आम आदमी के लिए नो एंट्री… 1.35 लाख करोड़ का चुनाव और 100 करोड़ी टिकट, क्या अब सिर्फ अरबपति ही चलाएंगे देश?
Indian Election Cost: भारतीय राजनीति में बढ़ता पैसा लोकतंत्र के लिए चुनौती बन रहा है। चुनाव लड़ना महंगा हो गया है, जिससे युवा और महिलाएं पीछे रह रही हैं। टिकट से लेकर वोट तक हर स्तर पर खर्च बढ़ा है। विशेषज्ञों ने पारदर्शिता और पब्लिक फंडिंग जैसे सुधारों की जरूरत बताई है।
Election Funding: भारतीय राजनीति में पैसों की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है और इसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है। हाल के वर्षों में चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि आम आदमी, खासकर युवा और महिलाएं, राजनीति से दूर होते जा रहे हैं। 2024 के आम चुनाव देश के सबसे महंगे चुनाव माने गए, जिसमें करीब 1.35 लाख करोड़ रुपए खर्च हुए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ता खर्च लोकतंत्र की पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए खतरा बन सकता है। अब राजनीति में वही लोग आगे बढ़ पा रहे हैं, जिनके पास मजबूत आर्थिक संसाधन हैं।
टिकट पाने से पहले ही करोड़ों का खर्च
रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी खर्च सिर्फ चुनाव के समय ही नहीं होता, बल्कि उससे पहले भी उम्मीदवारों को भारी खर्च करना पड़ता है। प्रोफेसर राजेश शर्मा जैसे विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में पहचान बनाने और पार्टी का टिकट पाने के लिए महीनों या सालों तक जनसंपर्क करना पड़ता है। इस दौरान हर महीने 3-4 लाख रुपए तक खर्च होता है, जिससे टिकट मिलने से पहले ही करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं।
पार्टी टिकट के लिए भी देना पड़ता है पैसा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि कई उम्मीदवारों को पार्टी का टिकट पाने के लिए अपनी आर्थिक ताकत दिखानी पड़ती है। कई मामलों में पार्टी फंड में बड़ा चंदा देना होता है। दक्षिण भारत के कुछ नेताओं ने बताया कि उन्हें टिकट के लिए 3 से 4 करोड़ रुपए तक खर्च करने पड़े। इसके अलावा कई बार उम्मीदवारों को दूसरे नेताओं के चुनाव अभियान में भी पैसा लगाना पड़ता है।
लोकसभा चुनाव में 10 करोड़ तक खर्च
आज के समय में लोकसभा चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, एक उम्मीदवार को औसतन 5 से 10 करोड़ रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में यह खर्च 100 करोड़ रुपए तक भी पहुंच जाता है, खासकर जब मुकाबला बड़े नेताओं के बीच हो।
कारोबारियों का बढ़ता प्रभाव
बढ़ते खर्च के कारण राजनीतिक दल अब उद्योगपतियों और कारोबारियों पर निर्भर हो गए हैं। इससे राजनीति में व्यावसायिक हितों का असर बढ़ रहा है। कई बार खनन, कोयला और रियल एस्टेट से जुड़े लोग खुद चुनाव लड़ने लगे हैं, जिससे सामान्य और ईमानदार नेताओं के लिए मौका कम हो रहा है।
वोट खरीदने का बढ़ता चलन
चुनाव के समय वोटरों को पैसे देने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। कई नेताओं ने माना कि अब उन्हें भी मजबूरी में पैसे बांटने पड़ते हैं। पहले जहां कम पैसे में काम चल जाता था, वहीं अब प्रति वोटर 2,000 से 3,000 रुपए तक दिए जाते हैं। कुछ राज्यों में यह रकम 5,000 से 7,000 रुपए तक पहुंच गई है।
सुधार के लिए जरूरी कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीति में खर्च को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाने होंगे। प्रोफेसर राजेश शर्मा के अनुसार, राजनीतिक दलों को अपने खर्च और फंडिंग को सार्वजनिक करना चाहिए। साथ ही, पब्लिक फंडिंग की व्यवस्था लागू करने से सभी उम्मीदवारों को बराबरी का मौका मिल सकता है।
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