IAS बनने के लिए बहनों ने लगाई चाय की दुकान, पिता को पैरालिसिस के बाद संभाला घर, DM ने कहा- हर संभव मदद करूंगा

गोरखपुर में तीन बहनें दिनभर चाय की दुकान चलाकर परिवार का खर्च और पैरालाइज पिता के इलाज की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद बड़ी बहन IAS और बाकी दोनों बहनें IAS-IPS बनने की तैयारी कर रही हैं। पिता की बीमारी के बाद परिवार की हालत बिगड़ी तो बहनों ने 8 हजार रुपये से DDU गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू किया। रात में दुकान बंद करने के बाद वे देर रात तक पढ़ाई करती हैं। उनकी संघर्ष की कहानी सामने आने के बाद गोरखपुर DM दीपक मीणा ने परिवार से फोन पर बात की और हर संभव मदद का भरोसा देते हुए बहनों को अपने आवास पर बुलाया है।

Oct 5, 2026 - 15:46
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IAS बनने के लिए बहनों ने लगाई चाय की दुकान, पिता को पैरालिसिस के बाद संभाला घर, DM ने कहा- हर संभव मदद करूंगा

गोरखपुर में चाय की दुकान चलाकर अपने पिता का इलाज कराने और अफसर बनने का सपना देख रहीं तीन बहनों की कहानी अब प्रशासन तक पहुंच गई है। आर्थिक तंगी के बीच दिनभर चाय बेचने वाली इन बहनों से गोरखपुर के डीएम दीपक मीणा ने फोन पर बात की। उन्होंने परिवार का हाल जाना, पिता के स्वास्थ्य के बारे में पूछा और बहनों को भरोसा दिया कि प्रशासन की ओर से हर संभव मदद की जाएगी। डीएम ने तीनों बहनों को सोमवार सुबह अपने आवास पर भी बुलाया है। तीनों बहनों की जिंदगी की कहानी संघर्ष, जिम्मेदारी और सपनों के बीच आगे बढ़ने की कहानी है। दिनभर वे डीडीयू के गेट के सामने अपनी चाय की दुकान संभालती हैं और रात में घर लौटकर पढ़ाई करती हैं। समय कम मिलता है, लेकिन अफसर बनने का सपना उन्होंने छोड़ा नहीं है। कुछ समय पहले उनकी कहानी दैनिक भास्कर में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी, जिसके बाद प्रशासन की नजर भी इस परिवार पर पड़ी।

डीएम के कार्यालय से आया फोन, बहनों को मिलने बुलाया
बड़ी बहन वर्तिका उपाध्याय ने बताया कि रविवार रात करीब 9 बजे उनके पास डीएम कार्यालय से फोन आया। फोन करने वाले व्यक्ति ने बताया कि डीएम उनसे बात करना चाहते हैं। इसके बाद डीएम दीपक मीणा ने खुद परिवार के बारे में जानकारी ली और पिता का हालचाल पूछा। बातचीत के दौरान डीएम ने बहनों को भरोसा दिया कि उनकी हर संभव मदद की जाएगी। इसके बाद उन्हें सोमवार सुबह 10 बजे अपने आवास पर मिलने के लिए बुलाया गया। प्रशासन की ओर से मदद का आश्वासन मिलने के बाद परिवार को उम्मीद है कि पिता के इलाज और बेटियों की पढ़ाई में कुछ राहत मिल सकेगी।

पिता को 2017 में हुआ पैरालिसिस, परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ी
महराजगंज की रहने वाली वंदिता उपाध्याय अपने परिवार के साथ फिलहाल गोरखपुर के बरगदवां में किराए के मकान में रहती हैं। उनके पिता रामसकल उपाध्याय पहले महराजगंज में रिलायंस लाइफ एंड इंश्योरेंस कंपनी में ब्रांच मैनेजर के पद पर काम करते थे। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक थी और घर का खर्च आसानी से चल रहा था। लेकिन 2017 में रामसकल पैरालिसिस की चपेट में आ गए। बीमारी के बाद उनकी नौकरी चली गई और परिवार की आय का मुख्य जरिया खत्म हो गया। मां माधुरी गृहिणी हैं। ऐसे में घर चलाने, पिता की दवाइयों और बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी धीरे-धीरे परिवार की तीनों बेटियों के कंधों पर आ गई। 

ट्यूशन पढ़ाई, नौकरी की, लेकिन खर्च पूरा नहीं हुआ
वंदिता ने बताया कि पिता की बीमारी के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई। पिता की दवाइयों के साथ घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई जारी रखना बड़ी चुनौती थी। ऐसे में उन्होंने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने कुछ छोटी-मोटी नौकरियां भी कीं, लेकिन इन कामों से होने वाली आमदनी इतनी नहीं थी कि परिवार की सभी जरूरतें पूरी हो सकें। पिता के इलाज का खर्च लगातार बढ़ रहा था और दूसरी तरफ घर के दूसरे खर्च भी कम नहीं हो रहे थे।

रिश्तेदार क्या कहेंगे, इसी वजह से पहले नहीं खोल पाईं दुकान
करीब चार साल पहले तीनों बहनों ने कम बजट में चाय का स्टॉल शुरू करने का विचार बनाया था। उनका मानना था कि कम पैसे में ऐसा काम शुरू किया जा सकता है जिससे रोज की आमदनी हो और परिवार के खर्च में मदद मिले। लेकिन उस समय उनकी मां ने यह कहते हुए मना कर दिया कि रिश्तेदार संपन्न हैं और अगर बेटियों को सड़क किनारे चाय बेचते देखेंगे तो पता नहीं क्या सोचेंगे। परिवार और समाज क्या कहेगा, इस चिंता के कारण उस समय बहनों ने अपना यह विचार छोड़ दिया। लेकिन आर्थिक हालात नहीं बदले। धीरे-धीरे परिवार की मुश्किलें बढ़ती गईं और उन्हें समझ आया कि लोगों की सोच से ज्यादा जरूरी परिवार को संभालना है।

8 हजार रुपये जुटाए और शुरू कर दिया चाय का स्टॉल
करीब चार महीने पहले तीनों बहनों ने फिर से अपने पुराने आइडिया को जमीन पर उतारने का फैसला किया। उन्होंने करीब 8 हजार रुपये जमा किए और गोरखपुर के डीडीयू के गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू कर दिया। स्टॉल का नाम उन्होंने बिलीवर बिस्ट्रो रखा। शुरुआत में उनके लिए यह अनुभव थोड़ा अजीब था, क्योंकि जिस जगह वे पढ़ने आती थीं, वहीं अब वे चाय बेच रही थीं। लेकिन कुछ समय बाद झिझक खत्म हो गई और लोगों ने भी उनके काम को स्वीकार करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ने लगे। लोगों को उनकी चाय पसंद आने लगी और बिक्री से कुछ मुनाफा होने लगा। इसके बाद उन्होंने चाय के साथ मैगी भी अपने मेन्यू में शामिल कर ली।

दिनभर दुकान, रात में पढ़ाई, आंखों में अफसर बनने का सपना
तीनों बहनों के लिए चाय की दुकान सिर्फ परिवार चलाने का जरिया नहीं है। इसके साथ उनका सबसे बड़ा लक्ष्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना भी है। बड़ी बहन वर्तिका उपाध्याय आईएएस बनने की तैयारी कर रही हैं और आगे चलकर डीएम बनना चाहती हैं। वंदिता का सपना आईपीएस अधिकारी बनने का है, जबकि अवंतिका आईएएस बनना चाहती हैं। दिनभर दुकान संभालने के कारण पढ़ाई के लिए उन्हें ज्यादा समय नहीं मिल पाता। इसके बावजूद वे रात में घर लौटने के बाद पढ़ाई करती हैं। बहनों के मुताबिक रात करीब 12 बजे से 2 बजे तक वे अपनी पढ़ाई के लिए समय निकालती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए वे यूट्यूब और दूसरे उपलब्ध संसाधनों का भी सहारा लेती हैं।

भाई की पढ़ाई भी आर्थिक तंगी से प्रभावित हुई
परिवार की आर्थिक स्थिति का असर सिर्फ तीनों बहनों की पढ़ाई पर ही नहीं पड़ा। उनके 26 वर्षीय भाई शिवम उपाध्याय की पढ़ाई भी 12वीं के बाद छूट गई। फिलहाल शिवम घर से ही एक कंपनी के लिए टेलीकॉलर का काम करते हैं। परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए हर सदस्य अपनी क्षमता के मुताबिक कमाई में योगदान देने की कोशिश कर रहा है।

पिता के इलाज में 3 से 4 लाख रुपये खर्च
वंदिता के मुताबिक पिता के इलाज में अब तक करीब 3 से 4 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। इलाज का खर्च अभी भी जारी है और हर महीने उनकी दवाइयों पर करीब 5 से 6 हजार रुपये खर्च होते हैं। परिवार ने पिता के इलाज के लिए नेपाल तक जाकर इलाज कराया। इस दौरान जो थोड़ी-बहुत बचत थी, वह भी खत्म हो गई। गांव में परिवार की कुछ जमीन है, लेकिन उसकी देखभाल आसपास के लोग कर रहे हैं। ऐसे में नियमित आय का कोई मजबूत जरिया परिवार के पास नहीं है।

मां बोलीं- पहले लोगों के डर से रोका, अब बेटियों पर गर्व है
मां माधुरी ने बताया कि मुश्किल समय में उनकी बेटियां ही परिवार की सबसे बड़ी ताकत बनी हैं। उन्होंने माना कि शुरुआत में वह लोगों और रिश्तेदारों की सोच से डर गई थीं। इसी वजह से उन्होंने बेटियों को चाय का स्टॉल खोलने से मना किया था। लेकिन अब उनका नजरिया बदल गया है। उन्हें अपनी बेटियों पर गर्व है कि उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय खुद आगे बढ़ने का रास्ता चुना। मां का कहना है कि बेटियां जिस तरह मेहनत कर रही हैं, उससे उन्हें भरोसा है कि उनका सपना जरूर पूरा होगा।

पिता बोले- बेटियों ने बिना सहारे पूरा परिवार संभाला
रामसकल उपाध्याय अपनी बेटियों के संघर्ष को लेकर भावुक हैं। उनका कहना है कि बीमारी के बाद परिवार के लिए बहुत मुश्किल समय आया, लेकिन उनकी बेटियों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। पिता के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में बेटियों ने जिस तरह बिना किसी बड़े सहारे के घर को संभाला, वह आसान नहीं था। उन्हें इस बात का गर्व है कि जिन जिम्मेदारियों को वह बीमारी की वजह से पूरा नहीं कर पाए, उन्हें उनकी बेटियों ने अपने कंधों पर उठा लिया।

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Sushant Pratap Singh Sushant Pratap Singh is an Indian content creator, video producer, and media professional known for creating political explainer videos, digital journalism content, and social media campaigns. He has worked with UP News Network and specializes in video production, content writing, and social media management. Sushant Pratap Singh began his media career as a content creator and video producer associated with UP News Network. During his professional journey, he worked on political and social explainer content, digital journalism, and social media engagement. He has experience in producing and editing news videos, writing articles for digital platforms, and managing online audience engagement through social media strategies. His work also includes anchoring, on-camera presentation, and graphic design for digital media content. Skills-: Content Writing and Article Writing | Social Media Management | Anchoring and Presentation | Video Editing using Adobe Premiere Pro | Video Production | Graphic Design using Canva | Political and Social Explainer Content