अपराधियों के मन में मौत का डर जरूरी, तभी रुकेंगे ऐसे अपराध, दिल्ली-NCR में नाबालिगों से रेप पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस से मांगा जवाब
दिल्ली-NCR में नाबालिगों से जुड़ी रेप की तीन घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस और प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि अपराध रोकने के लिए प्रभावी पुलिसिंग जरूरी है और अपराधियों के मन में कानून का डर होना चाहिए। कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों की रोशनी, निगरानी, सीसीटीवी और पेट्रोलिंग की कमियों पर भी चिंता जताई है। मामले में दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है।
दिल्ली-NCR में नाबालिगों के साथ रेप की तीन घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर कहा कि अपराधियों के मन में कानून का डर होना जरूरी है। अदालत ने पुलिस से साफ कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा, जमीन पर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे अपराध करने वालों में कानून का भय पैदा हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस को जरूरत पड़ने पर सख्त कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को दिल्ली जैसे शहर में दिन हो या रात, सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षित महसूस होना चाहिए। कोर्ट ने यह मामला केवल तीन अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं माना, बल्कि इसे कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल के तौर पर देखा।
तीन घटनाओं ने खींचा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में 4 अगस्त से 21 सितंबर के बीच सामने आई तीन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया। इनमें एक घटना चलती बस में नाबालिग से गैंगरेप की थी, दूसरी में नाबालिग के साथ गैंगरेप के बाद हत्या का मामला सामने आया और तीसरी घटना दिल्ली के आस्था कुंज पार्क से जुड़ी थी। 28 सितंबर को मामले की पहली सुनवाई के दौरान अदालत ने सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि खराब रोशनी, निगरानी की कमी और पर्याप्त पेट्रोलिंग न होने की वजह से सार्वजनिक स्थानों को हाई रिस्क जोन में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
चलती बस में 47 किलोमीटर तक नाबालिग से गैंगरेप
4 अगस्त को ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जा रही बस में 16 साल की नाबालिग के साथ गैंगरेप का आरोप सामने आया। पीड़िता परी चौक से बस में सवार हुई थी और आरोपियों ने उसे कश्मीरी गेट के पास उतारा। रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान बस करीब 47 किलोमीटर चली। मामले ने इसलिए भी गंभीर चिंता पैदा की क्योंकि बस के शीशों पर पर्दे लगे हुए थे और इतनी लंबी दूरी तक चलने के बावजूद घटना सामने नहीं आ सकी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी घटना को उन मामलों में शामिल किया जिनके आधार पर अदालत ने दिल्ली-NCR में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्वतः संज्ञान लिया।
स्वरूप नगर में गैंगरेप के बाद नाबालिग की हत्या
12 सितंबर को दिल्ली के स्वरूप नगर इलाके में 16 साल की नाबालिग के साथ गैंगरेप और हत्या का मामला सामने आया। अगले दिन उसका शव खेत के पास खुले मैदान में मिला। पुलिस ने मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें तीन नाबालिग बताए गए हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि नाबालिगों के खिलाफ गंभीर अपराधों को रोकने के लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
आस्था कुंज पार्क में फर्जी पुलिस बनकर वारदात
21 सितंबर को दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में 17 साल की नाबालिग अपने दोस्त के साथ बैठी थी। आरोप है कि तीन युवक वहां पहुंचे और खुद को पुलिसकर्मी बताकर छात्रा को डराया। इसके बाद उसके साथ रेप किया गया। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। इस घटना का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पिछली सुनवाई में इस बात को भी नोट किया था कि आसपास की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पहले शिकायतें सामने आई थीं।
कोर्ट बोला- सिर्फ कागज पर कार्रवाई से नहीं रुकेगा अपराध
सुप्रीम कोर्ट की चिंता सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रही। अदालत ने पुलिस से कहा कि अपराध होने के बाद कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी अपराध को होने से रोकना है। अदालत ने पुलिस व्यवस्था में निगरानी, पेट्रोलिंग और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल घटना के बाद जांच तक सीमित नहीं हो सकती। अगर किसी इलाके में सुरक्षा व्यवस्था की कमियां पहले से सामने आ रही हैं तो उन्हें दूर करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अनुच्छेद 21 का हवाला देने वालों पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ लोग सख्त पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सवाल उठा सकते हैं। लेकिन अदालत ने पुलिस के कर्तव्य पर जोर देते हुए कहा कि कानून के दायरे में रहते हुए अपराध रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस और प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार केवल कागजी निर्देशों या घटना के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता।
पहले ही कहा था- सार्वजनिक जगहों को हाई रिस्क जोन न बनने दें
28 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा को लेकर कई अहम टिप्पणियां की थीं। कोर्ट ने कहा था कि खराब रोशनी, निगरानी की कमी और पेट्रोलिंग की कमी की वजह से कोई सार्वजनिक जगह हाई रिस्क जोन नहीं बननी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि केवल संवेदना जताना पर्याप्त नहीं है। जिन अधिकारियों पर अपराध रोकने की जिम्मेदारी है, उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आस्था कुंज पार्क की घटना का जिक्र करते हुए सुरक्षा व्यवस्था में पहले सामने आई शिकायतों पर भी ध्यान दिया।
दिल्ली में बच्चों के खिलाफ यौन अपराध का बड़ा आंकड़ा
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में दिल्ली में POCSO के तहत 1,553 मामले दर्ज हुए। यानी औसतन हर दिन चार से ज्यादा मामले दर्ज हुए। हालांकि 2025 की NCRB रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस आंकड़े के आधार पर मौजूदा साल की स्थिति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। लेकिन 2024 का आंकड़ा यह दिखाता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध दिल्ली में लंबे समय से गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस की रोकथाम वाली व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही पर जोर दिए जाने का महत्व और बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय से जवाब मांगा है। अदालत ने दोनों से चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट और उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा है। अब अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली-NCR में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन ने कौन-कौन से ठोस कदम उठाए हैं। अदालत की नजर केवल दर्ज मामलों और गिरफ्तारियों पर नहीं, बल्कि अपराध को रोकने के लिए बनाई गई व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता पर भी है।
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