बसोड़ा पूजा 11 मार्च 2026: जानिए माता शीतला की पूजा का महत्व और बसोड़ा की पूरी कथा
बसौदा पूजा 11 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। शीतला माता की कथा, बसौदा पर्व का महत्व और भक्त इस दिन ठंडा भोजन और पानी क्यों चढ़ाते हैं, इसके बारे में जानें।
हिंदू धर्म में बसोड़ा पूजा एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है, जो हर साल होली के आठवें दिन मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की विशेष पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बसोड़ा के दिन व्रत रखकर और विधि-विधान से माता शीतला की पूजा करने से चेचक, खसरा जैसी बीमारियों से बचाव होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यह पर्व खासतौर पर उत्तर भारत के कई राज्यों में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। वर्ष 2026 में बसोड़ा पूजा 11 मार्च को मनाई जाएगी, जबकि शीतला सप्तमी 10 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन लोग माता को ठंडा जल, दही और बासी भोजन का भोग लगाते हैं।
बसोड़ा पर्व की कथा क्या कहती है
धार्मिक कथा के अनुसार एक बार माता शीतला ने सोचा कि धरती पर कौन उनकी पूजा करता है। यह जानने के लिए वह राजस्थान के डुंगरी गांव पहुंचीं। वहां उन्होंने देखा कि गांव में उनका कोई मंदिर नहीं है और कोई उनकी पूजा भी नहीं करता। माता गांव की गलियों में घूम ही रही थीं कि अचानक किसी ने गलती से उन पर चावल का उबला हुआ पानी फेंक दिया। इससे उनके शरीर पर फफोले पड़ गए और शरीर में तेज जलन होने लगी।
कुम्हारन महिला ने की माता की सेवा
जलन से परेशान होकर माता गांव में इधर-उधर मदद के लिए पुकारने लगीं, लेकिन किसी ने उनकी सहायता नहीं की। उसी समय एक कुम्हारन महिला अपने घर के बाहर बैठी थी। उसने बूढ़ी माई के रूप में आई माता को देखा और उन्हें अपने पास बैठने के लिए कहा। कुम्हारन ने उनके शरीर पर ठंडा पानी डाला और उन्हें रात की बनी हुई ज्वार के आटे की ठंडी राबड़ी और दही खाने को दिया। यह खाने से माता के शरीर को ठंडक मिली और उन्हें आराम महसूस हुआ।
माता ने दिया कुम्हारन को वरदान
इसके बाद कुम्हारन ने माता के बिखरे हुए बालों को संवारने के लिए कंघी की। तभी उसे माता के सिर के पीछे छुपी हुई एक और आंख दिखाई दी और वह डर गई। तब बूढ़ी माई ने कहा कि वह कोई भूत-प्रेत नहीं बल्कि शीतला देवी हैं और धरती पर यह देखने आई थीं कि कौन उनकी पूजा करता है। इसके बाद माता अपने असली रूप में प्रकट हो गईं। कुम्हारन ने हाथ जोड़कर कहा कि उसके घर में बैठने के लिए कोई जगह नहीं है। तब माता एक गधे पर बैठ गईं और हाथ में झाड़ू और डलिया लेकर उसके घर की दरिद्रता को झाड़कर बाहर फेंक दिया।
डुंगरी गांव में हुई माता शीतला की स्थापना
माता कुम्हारन की सेवा और भक्ति से प्रसन्न हुईं और उससे वरदान मांगने को कहा। कुम्हारन ने प्रार्थना की कि माता डुंगरी गांव में ही निवास करें। साथ ही उसने यह भी कहा कि जो भी भक्त चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी को माता की पूजा करे और अष्टमी के दिन ठंडा जल, दही और बासी भोजन का भोग लगाए, उसके घर में कभी दरिद्रता न आए और महिलाओं का अखंड सुहाग बना रहे। माता ने “तथास्तु” कहकर यह वरदान दे दिया और कहा कि उनकी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार जाति को होगा। तभी से डुंगरी गांव में माता शीतला की स्थापना हुई और इस स्थान को “शील की डुंगरी” कहा जाने लगा।
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