एक तरफ भगवान की मार दूसरी तरफ विश्वयुद्ध की ललकार, 1965 के दौर से उबरा किसान, अब कैसे झेलेगा ये प्रहार..
आज के समय में भारत का किसान कई नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और बदलते मौसम ने खेती को जोखिम भरा बना दिया है। गेहूं की तैयार फसल खराब होने से किसानों की मेहनत और आमदनी दोनों पर असर पड़ रहा है। वहीं, वैश्विक तनाव और युद्ध के कारण महंगाई भी बढ़ रही है, जिसका सीधा असर आम लोगों की थाली पर दिख रहा है। ऐसे हालात हमें 1965 के उस दौर की याद दिलाते हैं, जब देश ने खाद्यान्न संकट झेला था। उस समय एक अपील ने पूरे देश को एकजुट कर दिया था, लेकिन आज फिर समाधान की जरूरत महसूस हो रही है।
किसान का जीवन हमेशा संघर्षपूर्ण रहा है। दिन-रात मेहनत करने के बावजूद अगर फसल खराब हो जाए, तो उसका दर्द केवल वही समझ सकता है जिसने यह अनुभव किया हो। पंजाब और अन्य राज्यों में गेहूं की फसल पकने के अंतिम चरण में है, लेकिन इस समय अचानक बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। यह स्थिति खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए चिंताजनक है, जिनकी आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर है। वहीं देश में अधिकतर किसानों के पास सीमित संसाधन होते हैं। ऐसे में फसल खराब होने पर उनका आर्थिक संतुलन तुरंत बिगड़ जाता है। सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन इनका लाभ हर जरूरतमंद किसान तक पहुंचाना अभी भी चुनौती बना हुआ है। बैसाखी नजदीक है, जो गेहूं की कटाई का समय माना जाता है। अगर मौसम की अनिश्चितता बनी रहती है, तो उत्पादन में कमी आएगी। इसका असर न केवल किसानों की आय पर होगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर भी साफ तौर पर दिखाई देगा। इस स्थिति में कृषि विशेषज्ञों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी तकनीक विकसित करें जो बदलते मौसम के अनुसार फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। साथ ही सरकार को चाहिए कि प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दे और उन्हें अगली फसल के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराए। संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश देने की आवश्यकता है कि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। इसके अलावा अनाज मंडियों और भंडारण की उचित व्यवस्था भी जरूरी है ताकि किसानों की उपज सुरक्षित रह सके।
स्थानीय बाजारों पर वैश्विक घटनाओं का असर
कृषि संकट के साथ ही वैश्विक घटनाएं आम लोगों की थाली और जेब पर भी असर डाल रही हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनिया के तेल और गैस की कीमतों को प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की कमी और गैस सिलेंडरों की बढ़ती लागत ने भारत के स्थानीय बाजारों में खाने-पीने की चीजों को महंगा कर दिया है। इसका सबसे सीधा असर स्ट्रीट फूड पर पड़ा है। चाट, समोसे और पानी पूरी जैसी चीजों के दाम अचानक बढ़ गए हैं। अब पानी पूरी का आनंद लेने वालों को 20 रुपये में केवल चार पानी पूरी मिल पा रही हैं। वहीं, समोसा जो कभी 10 रुपये में मिलता था, अब 25 रुपये में बिकता है। घर की रसोई भी इससे अछूती नहीं रही। रसोई गैस और खाद्य तेल की कीमतों में वृद्धि ने गृहिणियों की चिंता बढ़ा दी है। वर्तमान स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक घटनाएं सीधे स्थानीय जीवन को प्रभावित कर रही हैं। आम लोगों के लिए यह समय आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। यदि हालात जल्दी नहीं सुधरे, तो युद्ध की आंच सचमुच हर घर की रसोई तक महसूस की जाएगी।
विश्व युद्ध और उसके असर
आज लगभग पूरा विश्व युद्ध और संघर्ष की परेशानी झेल रहा है। चाहे यह अमेरिका-ईरान और इज़राइल के बीच संघर्ष हो, रूस-यूक्रेन युद्ध या पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनातनी, हर जगह बारूद और डर का माहौल है। शुरुआत में ईरानी मिसाइलों को इज़राइल रोक रहा था, लेकिन अब ईरान ऐसे मिसाइल दाग रहा है जिन्हें इज़राइल भी रोक नहीं पा रहा। इसका असर वहां की इमारतों और जीवन पर साफ दिखाई दे रहा है। इस युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है। तेल और गैस की कमी के कारण महंगाई बढ़ रही है और लोगों की जीवनशैली प्रभावित हो रही है। सभी विश्व शक्तियां अपने-अपने हित के लिए युद्ध में लगी हैं। अमेरिका और इज़राइल इस युद्ध को हर हाल में जीतना चाहते हैं, वहीं ईरान भी पलटवार करने में पीछे नहीं है। ऐसे में युद्ध का अंजाम क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। युद्ध का असर सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। युद्ध से किसी का भला नहीं होने वाला है, इसे जल्द रुकना चाहिए।
जब एक वक्त का भोजन छोड़कर देश ने दिखाई थी एकजुटता
बता दें कि भारत में पहले भी ऐसी स्थिति पैदा हो चुकी थी, जब 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति थी और खाद्यान्न संकट गहरा गया था। गेहूं और अन्य अनाज की कमी से देश की जनता को परेशानी हो रही थी। इस बीच, अमेरिका और कुछ पश्चिमी देश भारत पर दबाव डाल रहे थे कि युद्ध जल्द खत्म किया जाए। अमेरिका ने धमकी भी दी कि अगर भारत तुरंत संघर्षविराम नहीं करेगा तो वह अपनी गेहूं की आपूर्ति रोक देगा। उस समय भारत गेहूं के लिए अमेरिका पर बहुत हद तक निर्भर था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपने कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की आवश्यकता महसूस की। उस समय देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन अनाज उत्पादन बहुत कम था। अधिकांश लोग खेती पर निर्भर थे और बढ़ती जनसंख्या की वजह से लोगों का पेट भरना भी बड़ी चुनौती बन गया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के समय देशवासियों से अपील की कि वे एक समय का भोजन त्यागें। उन्होंने खुद अपने घर से इस पहल की शुरुआत की।
हरित क्रांति और भारत की कृषि आत्मनिर्भरता
शास्त्री जी ने समझा कि अमेरिकी दबाव से उबरने के लिए भारत को कृषि और खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा।। उन्होंने किसानों और सैनिकों के लिए प्रसिद्ध जय जवान, जय किसान नारा दिया और हरित तथा श्वेत क्रांति को बढ़ावा दिया। इसका फायदा यह हुआ कि देश में दूध और अनाज का उत्पादन बढ़ा और अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए 1966 में भारत में हरित क्रांति की नींव डाली गई। हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में तेज बदलाव लाना और देश को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था। इस क्रांति को लागू करने में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन का योगदान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मार्गदर्शन में यह क्रांति शुरू हुई। हरित क्रांति के दो मुख्य चरण थे। पहले चरण में संकर बीजों और रासायनिक खाद का इस्तेमाल बढ़ाया गया। दूसरे चरण में नई कृषि तकनीक और भारी मशीनों का उपयोग शुरू हुआ। सबसे पहले इसे प्रगतिशील किसानों ने अपनाया और इसके बाद पूरे देश में इसका प्रभाव फैल गया। इस क्रांति की सफलता से भारत अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया। संकर और बौने बीजों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ा। कृषि में नई तकनीक का उपयोग और रासायनिक खाद का भरपूर इस्तेमाल किया गया। उदाहरण के लिए, 1960 में रासायनिक उर्वरक प्रति हेक्टेयर केवल 2 किलो इस्तेमाल होता था, जो अब बढ़कर 128 किलो प्रति हेक्टेयर हो चुका है।
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