CEC को मिली कानूनी सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, जजों को भी नहीं मिला ऐसा सुरक्षा कवच, जानिए पूरा मामला
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ी टिप्पणी सामने आई है। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने 2023 के कानून की धारा 16 के तहत मिली सुरक्षा को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा सुरक्षा कवच शायद केवल राष्ट्रपति को प्राप्त है और जजों को भी इस तरह की सुरक्षा नहीं मिलती। याचिकाकर्ता के वकील ने भी चुनाव आयुक्तों को मिली सुरक्षा को असाधारण बताते हुए प्रधानमंत्री तक का उदाहरण दिया। मामला SIR से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को चुनाव से जुड़े अपने आधिकारिक काम के दौरान मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ी टिप्पणी सामने आई है। सोमवार 5 अक्टूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने इस सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी सुरक्षा शायद केवल राष्ट्रपति को ही हासिल है और यहां तक कि संवैधानिक अदालतों के जजों को भी इस तरह का संरक्षण नहीं मिलता। मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों के खिलाफ दायर उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर कथित तौर पर मनमाने फैसले लिए जाने का आरोप लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है।
आखिर चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा पर सवाल क्यों उठा?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून का हवाला दिया। उनकी दलील थी कि इस कानून के जरिए चुनाव आयुक्तों को अपने आधिकारिक काम के लिए काफी व्यापक कानूनी सुरक्षा दी गई है। वकील ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया कि अगर चुनाव आयुक्त अपने आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान लिए गए किसी फैसले को लेकर जवाबदेही से लगभग सुरक्षित हो जाते हैं, तो ऐसी व्यवस्था की संवैधानिक सीमा क्या होगी और इसका न्यायिक परीक्षण किस तरह किया जा सकता है। इसी बिंदु पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ओर से कानूनी सुरक्षा के दायरे को लेकर सवाल सामने आया।
जस्टिस बागची ने कहा- ऐसी सुरक्षा शायद राष्ट्रपति के लिए है
eएक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के कानून की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए सिविल और क्रिमिनल कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान की गई है। यह सुरक्षा उनके पद से हटने के बाद भी लागू रहने का प्रावधान है। इसी प्रावधान पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि ऐसी कानूनी सुरक्षा शायद केवल राष्ट्रपति के लिए है और यहां तक कि जजों को भी इस तरह का संरक्षण हासिल नहीं है। अदालत की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके फैसलों का सीधा असर देश की चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों पर पड़ता है।
वकील ने कहा- प्रधानमंत्री को भी नहीं मिलती ऐसी सुरक्षा
जस्टिस बागची की टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने भी अदालत के सामने अपनी दलील को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि इस तरह की कानूनी सुरक्षा से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को असाधारण संरक्षण प्राप्त हो जाता है। वकील ने यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री के पास भी इस तरह की कानूनी सुरक्षा नहीं है। उनका तर्क था कि अगर किसी संवैधानिक संस्था के शीर्ष पदाधिकारियों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए इस स्तर की सुरक्षा दी जाती है, तो उनकी जवाबदेही को लेकर भी संवैधानिक सवाल खड़े होते हैं। हालांकि ये याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें हैं। इस मामले में अंतिम संवैधानिक स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आगे के आदेश और फैसले से ही स्पष्ट होगी।
याचिकाकर्ता ने कहा- ECI को सबसे शक्तिशाली संवैधानिक संस्था बनाया गया
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर भी गंभीर दावा किया गया। विकास सिंह ने दलील दी कि 2023 के कानून के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की स्थिति इतनी मजबूत हो गई है कि उनका पद सुप्रीम कोर्ट के जजों से भी ऊपर दिखाई देने लगा है। वकील ने यह भी दावा किया कि चुनाव आयोग आज अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तुलना में सबसे अधिक शक्तिशाली संस्थाओं में से एक बन गया है। इस दलील का मूल सवाल चुनाव आयोग की शक्तियों से ज्यादा उसकी जवाबदेही से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था के पदाधिकारियों को कानूनी सुरक्षा देने के साथ-साथ जवाबदेही का प्रभावी तंत्र भी होना चाहिए।
2023 के कानून की धारा 16 में क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 का कानून चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से जुड़े प्रावधान तय करता है। इसी कानून की धारा 16 आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों को लेकर कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा से संबंधित है। यही प्रावधान मौजूदा मामले में विवाद का प्रमुख हिस्सा बन गया है। याचिकाकर्ता पक्ष इस सुरक्षा को बहुत व्यापक बता रहा है, जबकि इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष भी अदालत के सामने आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी करके उनका जवाब मांगा है।
मामला SIR से जुड़ी याचिकाओं का है
यह पूरा विवाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। SIR के तहत मतदाता सूचियों की गहन समीक्षा और सत्यापन किया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया में लिए गए कुछ फैसलों को कथित रूप से मनमाना बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उनका आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में चुनाव आयोग की शक्तियों और उसके फैसलों की न्यायिक समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। इसी सुनवाई के दौरान चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा का मुद्दा भी अदालत के सामने आया और 2023 के कानून की धारा 16 पर बहस शुरू हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसका मतलब यह है कि अब संबंधित पक्षों को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा। फिलहाल अदालत ने चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी और किसी कानून पर अंतिम न्यायिक फैसला दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए इस मामले में आगे की सुनवाई और अदालत का आदेश बेहद महत्वपूर्ण होगा।
चुनाव आयोग की शक्तियों और जवाबदेही पर फिर बहस
इस मामले ने एक बार फिर चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका, उसके अधिकारों और उसके पदाधिकारियों की जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है। चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करने वाली संवैधानिक संस्था है और उसके फैसलों का असर सीधे मतदाता, राजनीतिक दलों और चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। ऐसे में एक तरफ चुनाव आयुक्तों को स्वतंत्र होकर काम करने के लिए सुरक्षा देने की जरूरत की बात सामने आती है, तो दूसरी तरफ यह सवाल भी उठता है कि अगर किसी आधिकारिक फैसले पर गंभीर कानूनी विवाद हो तो जवाबदेही और न्यायिक समीक्षा का रास्ता कितना प्रभावी होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में अब इसी व्यापक सवाल पर आगे की सुनवाई होगी। फिलहाल अदालत की टिप्पणी ने 2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर एक नई संवैधानिक बहस जरूर शुरू कर दी है।
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