सड़कों पर जाम की बड़ी वजह बन रहे निजी वाहन, काम पर जाने वाले 43 फीयसदी कर्मचारी टू-व्हीलर पर निर्भर, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिर्फ 15 फीसदी
भारत सरकार के NSO के पहले नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे में कामकाजी लोगों के आने-जाने से जुड़े अहम आंकड़े सामने आए हैं। देश में 43% कर्मचारी टू-व्हीलर से काम पर जाते हैं, जबकि सिर्फ 15% कर्मचारी सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं। 28.3% लोग पैदल और 10.7% कर्मचारी साइकिल से काम पर पहुंचते हैं। शहरी इलाकों में टू-व्हीलर पर निर्भरता 53% है। सर्वे के मुताबिक कर्मचारी काम की जगह पहुंचने में औसतन 25 मिनट लेते हैं और हर महीने आने-जाने पर औसतन ₹785 खर्च करते हैं।
भारत में कामकाजी लोगों के रोजाना आने-जाने का तरीका देश के शहरी ट्रैफिक और परिवहन व्यवस्था की एक बड़ी तस्वीर सामने रखता है। भारत सरकार के नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) के पहले नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे (NHTS) के मुताबिक, देश में काम पर जाने वाले कर्मचारियों में सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी सिर्फ 15% है। वहीं, 43% कर्मचारी टू-व्हीलर से काम पर जाते हैं। कार से काम पर जाने वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी 3% है।
काम पर जाने के लिए टू-व्हीलर सबसे ज्यादा इस्तेमाल
सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, कर्मचारियों के आने-जाने के लिए टू-व्हीलर सबसे प्रमुख साधन है। देशभर में 43% कर्मचारी काम पर जाने के लिए मोटरसाइकिल या स्कूटर जैसे टू-व्हीलर का इस्तेमाल करते हैं। इसके मुकाबले कार से जाने वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी सिर्फ 3% है। टू-व्हीलर और कार को मिलाकर करीब 46% कर्मचारी निजी वाहनों पर निर्भर हैं। सार्वजनिक परिवहन की बात करें तो बस, ट्रेन, ट्राम और ऑटो-रिक्शा जैसे साधनों का इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी 15% है। आंकड़े बताते हैं कि काम पर आने-जाने के लिए बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक परिवहन के बजाय अपने निजी वाहन पर निर्भर हैं।
शहरों में टू-व्हीलर पर निर्भरता और ज्यादा
शहरी इलाकों में निजी वाहनों पर निर्भरता ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा दिखाई देती है। सर्वे के अनुसार, शहरों में 53% कर्मचारी टू-व्हीलर से काम पर जाते हैं। वहीं 5.7% कर्मचारी कार का इस्तेमाल करते हैं। इससे पता चलता है कि शहरों में भी रोजाना दफ्तर या काम की जगह तक पहुंचने के लिए कार की तुलना में टू-व्हीलर कहीं ज्यादा लोकप्रिय है। सीमित दूरी, ट्रैफिक में आसानी और पार्किंग जैसी वजहों से दोपहिया वाहन शहरी कामगारों के लिए प्रमुख आवागमन साधन बने हुए हैं।
28.3% कर्मचारी पैदल जाते हैं काम पर
काम पर जाने के लिए निजी वाहन और सार्वजनिक परिवहन के अलावा पैदल चलना भी बड़ी संख्या में लोगों का माध्यम है। NSO के अनुसार, देश में 28.3% कर्मचारी पैदल काम पर जाते हैं। यह काम पर पहुंचने का दूसरा सबसे आम तरीका है। ग्रामीण इलाकों में पैदल काम पर जाने वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी 36% है, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 14% है। यानी ग्रामीण क्षेत्रों में काम की जगह तक पहुंचने के लिए पैदल चलने की प्रवृत्ति शहरों के मुकाबले काफी अधिक है।
10.7% कर्मचारी साइकिल से पहुंचते हैं काम पर
सर्वे के अनुसार, देश में 10.7% कर्मचारी काम पर जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। पैदल चलने और साइकिल के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो बड़ी संख्या में कर्मचारी ऐसे हैं जो किसी मोटर वाहन या सार्वजनिक परिवहन के बजाय अपने स्तर पर यात्रा पूरी करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल जाने वालों की अधिक हिस्सेदारी और सार्वजनिक परिवहन की सीमित उपलब्धता को देखते हुए आने-जाने के साधनों में क्षेत्रीय अंतर भी साफ दिखाई देता है।
एक कर्मचारी को काम की जगह पहुंचने में औसतन 25 मिनट
NSO के इस सर्वे में काम पर जाने में लगने वाले समय को भी दर्ज किया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, एक कर्मचारी को घर से काम की जगह तक पहुंचने में औसतन 25 मिनट लगते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह समय औसतन 27 मिनट है, जबकि ग्रामीण इलाकों में कर्मचारी करीब 23 मिनट में काम की जगह पहुंच जाते हैं। यानी शहरों में काम पर जाने में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में औसतन चार मिनट ज्यादा समय लगता है।
सुबह 10 बजे से पहले निकल जाते हैं 95% कर्मचारी
सर्वे में कर्मचारियों के घर से निकलने के समय का भी आकलन किया गया है। इसके अनुसार, काम पर जाने वाले करीब 95% कर्मचारी सुबह 10 बजे से पहले घर से निकल जाते हैं। इस वजह से सुबह के समय सड़कों पर आने-जाने वाले लोगों और वाहनों का दबाव काफी बढ़ जाता है। खासकर शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों के एक ही समय के आसपास निकलने से यातायात व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
काम पर आने-जाने में हर महीने औसतन ₹785 खर्च
काम पर आने-जाने के लिए कर्मचारियों को हर महीने औसतन ₹785 खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि पुरुषों और महिलाओं के खर्च में बड़ा अंतर देखने को मिला है। पुरुष कर्मचारी औसतन ₹835 प्रति माह खर्च करते हैं, जबकि महिलाओं का औसत मासिक खर्च ₹533 है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर और भी ज्यादा है। वहां पुरुष कर्मचारियों का औसत मासिक यात्रा खर्च ₹674 है, जबकि महिलाओं का खर्च ₹307 है। यानी ग्रामीण इलाकों में पुरुषों का यात्रा खर्च महिलाओं के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है।
जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच हुआ सर्वे
NSO का यह नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किया गया। सर्वे में एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी की यात्राओं को शामिल किया गया। इसमें आने और जाने की यात्रा को दो अलग-अलग यात्राओं के रूप में माना गया। देश में कामकाजी लोगों के यात्रा साधन, दूरी, समय और खर्च से जुड़े ये आंकड़े रोजाना आवागमन की तस्वीर सामने रखते हैं। खास तौर पर टू-व्हीलर की बड़ी हिस्सेदारी और सार्वजनिक परिवहन के सीमित इस्तेमाल से यह पता चलता है कि कर्मचारियों की दैनिक यात्रा में निजी वाहनों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।
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