नरसिंह द्वादशी 2026: कब रखें व्रत, जानें सही तिथि, पारण समय और पूजा की संपूर्ण विधि
जानें नरसिम्हा द्वादशी 2026 तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और संपूर्ण पूजा विधि सरल हिंदी में।
हिंदू धर्म में कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं जो आस्था, श्रद्धा और धर्म की विजय का प्रतीक होते हैं। इन्हीं पावन तिथियों में से एक है नरसिंह द्वादशी। यह दिन भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने पर जीवन के भय, कष्ट और नकारात्मकता दूर होती है। साथ ही व्यक्ति के भीतर साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साल 2026 में नरसिंह द्वादशी कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और पूजा कैसे करनी चाहिए, आइए विस्तार से जानते हैं।
धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को नरसिंह द्वादशी मनाई जाती है। यह तिथि भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिम्हा से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान नरसिंह ने अपने परम भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए असुर राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था। उनका स्वरूप आधा मनुष्य और आधा सिंह का था। यह अवतार इस बात का प्रतीक है कि जब भी धर्म पर संकट आता है, तब विष्णु स्वयं अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। इसलिए यह दिन धर्म की जीत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
नरसिंह द्वादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 27 फरवरी 2026 को रात 10 बजकर 32 मिनट पर शुरू होगी। यह तिथि 28 फरवरी 2026 को रात 8 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार मुख्य व्रत 28 फरवरी 2026 को रखा जाएगा। व्रत का पारण 1 मार्च 2026 को किया जाएगा। द्वादशी पारण का शुभ समय 1 मार्च 2026 को सुबह 6 बजकर 21 मिनट से 8 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।
पूजा विधि कैसे करें
इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ, विशेष रूप से पीले रंग के वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर की सफाई करके भगवान नरसिंह की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। यदि उनकी प्रतिमा उपलब्ध न हो तो भगवान विष्णु की तस्वीर रखकर भी पूजा की जा सकती है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद पीले फूल, अक्षत, फल, मिष्ठान, धूप और दीप अर्पित करें। पूजा के समय विष्णु सहस्त्रनाम या नरसिंह स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। अंत में सात्विक भोग लगाकर आरती करें और प्रसाद का वितरण करें।
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