सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने जमानत सुनवाई से खुद को किया अलग
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने अपने पूर्व आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के मानसिक प्रभाव का हवाला देते हुए जमानत सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। हाई कोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया ने एक जमानत याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने अपने आदेश में कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों का उन पर मानसिक रूप से निराशाजनक और ठंडा प्रभाव पड़ा है। इसी कारण उन्होंने यह फैसला लिया। साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि भविष्य में उन्हें जमानत मामलों की रोस्टर जिम्मेदारी न दी जाए। इस फैसले से न्यायिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से हुए आहत
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया ने अपने आदेश में लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में उनके एक पुराने जमानत आदेश पर की गई टिप्पणियों ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि कोई भी न्यायाधीश यह दावा नहीं कर सकता कि उसके आदेश कभी रद्द नहीं होंगे, लेकिन इस बार की टिप्पणियों ने उन पर भारी निराशाजनक प्रभाव डाला है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था
भारत का सर्वोच्च न्यायालय की बेंच, जिसमें जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल थे, ने चेतराम वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में जस्टिस भाटिया के एक जमानत आदेश को रद्द कर दिया था। यह मामला दहेज मृत्यु, धारा 304-बी आईपीसी से जुड़ा था। आरोप था कि आरोपी ने शादी के तीन महीने के भीतर अपनी पत्नी की हत्या की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने जमानत देने के आधार स्पष्ट नहीं किए और सिर्फ यह दर्ज किया कि आरोपी 27 जुलाई 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
मौजूदा याचिका से नहीं था संबंध
जस्टिस भाटिया ने स्पष्ट किया कि जिस जमानत याचिका (राकेश तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) से उन्होंने खुद को अलग किया, उसका सुप्रीम कोर्ट वाले मामले से कोई संबंध नहीं है। फिर भी उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों में इसे उचित नहीं समझा और याचिका को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का आदेश दिया।
जमानत रोस्टर से हटाने का अनुरोध
अपने आदेश में जस्टिस भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि भविष्य में उन्हें जमानत मामलों की जिम्मेदारी न दी जाए। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामले बहुत कम होते हैं, जब कोई जज खुलकर यह स्वीकार करे कि वह उच्च अदालत की टिप्पणियों से प्रभावित हुआ है। यह घटनाक्रम न्यायिक स्वतंत्रता और उच्च अदालतों की निगरानी को लेकर नई बहस को जन्म दे सकता है।
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