140 रुपये के केस में 33 साल तक कोर्ट के चक्कर, आखिरकार सिपाही को मिली बड़ी राहत
140 रुपये के गबन के आरोप में फंसे सिपाही राम अवतार ने 33 साल तक अदालत में लड़ाई लड़ी। सबूतों के अभाव में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। यह मामला ईमानदारी और न्याय की लंबी लड़ाई की मिसाल बन गया है।
Uttar Pradesh News: आगरा कैंट से जुड़े 33 साल पुराने एक मामले में सिपाही राम अवतार को आखिरकार अदालत से राहत मिल गई है। उन पर मात्र 140 रुपये के गबन का आरोप लगा था, लेकिन इस छोटे से आरोप ने उनकी ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था। अपने ऊपर लगे इस दाग को साफ करने के लिए उन्होंने करीब तीन दशक तक अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ी। अब अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया है।
1991 में दर्ज हुआ था मामला
यह मामला 8 सितंबर 1991 का है, जब जीआरपी आगरा कैंट थाने में तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक व्यास देव श्रोत्रिय ने राम अवतार के खिलाफ केस दर्ज कराया था। आरोप था कि उन्होंने होमगार्ड वीरेंद्र सिंह और अनिल कुमार त्यागी के साथ झांसी पैसेंजर ट्रेन में एस्कॉर्ट ड्यूटी का गलत विवरण देकर ज्यादा यात्रा भत्ता लिया था। शिकायत के अनुसार, उन्होंने सात दिन की ड्यूटी दिखाकर 6 फरवरी 1992 को 140 रुपये का भत्ता लिया।
जांच में सामने आई गड़बड़ी
विभागीय जांच में पाया गया कि राम अवतार ने केवल तीन दिन ही ड्यूटी की थी, जबकि सात दिन का भत्ता लिया गया। इसे नियमों के खिलाफ मानते हुए उन पर सरकारी धन के गबन का आरोप लगाया गया। 27 मई 1993 को उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर जमानत ली और मुकदमे का सामना करना शुरू किया।
गवाही और दस्तावेज बने कमजोर कड़ी
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कई गवाह पेश किए, लेकिन मुख्य गवाह की जिरह पूरी नहीं हो सकी, जिससे मामला कमजोर पड़ गया। इसके अलावा, महत्वपूर्ण दस्तावेज जनरल डायरी भी अदालत में प्रस्तुत नहीं की जा सकी। पुलिस ने बताया कि पांच साल बाद रिकॉर्ड नष्ट कर दिए जाते हैं, जिससे जरूरी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो सके।
अदालत ने दिया संदेह का लाभ
लंबे समय तक चले इस मुकदमे में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ दिया। विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अचल प्रताप सिंह ने अपने फैसले में कहा कि ठोस सबूतों के अभाव में आरोप साबित नहीं होते हैं। इसी आधार पर सिपाही राम अवतार को बरी कर दिया गया। यह मामला न केवल न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि एक व्यक्ति अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए कितनी लंबी लड़ाई लड़ सकता है।
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